BRIEF 8 मार्च, 2026

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026: आगे बढ़कर नेतृत्व करतीं महिलाएं

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भारत की आबादी का आधा हिस्सा महिलाएं हैं और देश के विकास की कहानी को आगे बढ़ाने की क्षमता भी उन्हीं में है।

देश भर में महिलाएं कई रुकावटों को पार करके आगे बढ़ रही हैं, पारंपरिक भूमिकाओं को चुनौती दे रही हैं, और कार्यस्थलों, उद्यमों एवं समुदायों में नए रास्ते बना रही हैं। केरल में बांधों का संचालन करने वाली इंजीनियरों से लेकर तमिलनाडु में गांवों में उद्यम शुरू करने वाली उद्यमियों तक और बिहार में स्वास्थ्य व पोषण व्यवस्था को मजबूत बनाने वाली अग्रिम पंक्ति की कार्यकर्ताओं तक, भारत की महिलाएं अपने साहस, नेतृत्व और नवाचार का परिचय दे रही हैं।

अर्थव्यवस्था पर उनकी बढ़ती भागीदारी का असर भी साफ दिखाई दे रहा है। महिला श्रम भागीदारी दर बढ़ी है। यह 2018 में 22.9 प्रतिशत थी, जो 2025 में बढ़कर 35.3 प्रतिशत हो गई है। यदि महिलाओं की श्रम भागीदारी 50 प्रतिशत तक पहुंच जाए, तो भारत की वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर में लगभग 1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे भारत को 2047 तक उच्च आय वाला देश बनने के लिए आवश्यक 8 प्रतिशत विकास दर के करीब पहुंचने में मदद मिल सकती है।

इस क्षमता को पूरी तरह सामने लाने के लिए कई संरचनात्मक बाधाओं को दूर करना जरूरी है। इनमें कौशल और वित्त तक पहुंच, सुरक्षित और सस्ती आवास व्यवस्था, तथा सुरक्षित परिवहन जैसी सुविधाएं शामिल हैं, ताकि अधिक से अधिक महिलाएं देश की प्रगति में पूरी भागीदारी निभा सकें।

विश्व बैंक समूह महिलाओं के लिए आर्थिक अवसर बढ़ाने, उनके बुनियादी स्वास्थ्य और कल्याण में निवेश करने, नेतृत्व में उनकी भागीदारी को बढ़ावा देने और लैंगिक हिंसा को समाप्त करने के प्रयासों के माध्यम से लैंगिक समानता को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रहा है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में इन प्रयासों की झलक उन महिलाओं की कहानियों में दिखाई देती है, जिन्होंने बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाला, नए रास्ते बनाए और सफलता हासिल की। उनकी यात्राएं यह मजबूत संदेश देती हैं कि जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, तो परिवार, समाज और पूरी अर्थव्यवस्था भी आगे बढ़ती है।


कार्यस्थल पर महिलाएं

काम सिर्फ आय का स्रोत नहीं होता। यह सम्मान देता है, जीवन को उद्देश्य देता है और इंसान की स्थिति को बेहतर बनाने में मदद करता है। जब महिलाएं और लड़कियां अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचकर कामकाजी दुनिया से जुड़ती हैं, तो वे केवल अपने परिवार ही नहीं बल्कि पूरे समाज और समुदाय को बदल देती हैं और समावेशी आर्थिक विकास को आगे बढ़ाती हैं।

कौसर जहां की शादी 17 साल की उम्र में हो गई थी, जिसके कारण उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। भारत सरकार के नयी मंज़िल कार्यक्रम ने उन्हें जीवन में दूसरा मौका दिया। कुछ साल बाद प्रशिक्षण की बदौलत उन्हें हैदराबाद के एक सरकारी अस्पताल में नौकरी मिल गई, जहां वह मरीजों की देखभाल करती हैं। अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा चलाए जा रहे इस कार्यक्रम से अब तक 50,700 से अधिक अल्पसंख्यक महिलाएं लाभान्वित हो चुकी हैं। इस कार्यक्रम को विश्व बैंक का सहयोग भी मिला है।

ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत 2016-17 में शुरू की गई बैंक सखी योजना ग्रामीण इलाकों के लिए बड़ी मदद साबित हुई है। ये महिलाएं लोगों को बैंकिंग सेवाओं और सरकारी योजनाओं की राशि तक पहुंच बनाने में मदद करती हैं। बिहार के औरंगाबाद जिले में बंधिनी कुमारी हर दिन 50 से 80 लोगों तक पहुंचती हैं। वह कहती हैं,"जो लोग पहले शायद ही कभी अपने बैंक खाते का इस्तेमाल करते थे, अब वे भी आगे आकर सेवाओं का लाभ ले रहे हैं।"

केरल में महिला इंजीनियर बांधों का प्रबंधन करती हैं और नहरों का निर्माण व रखरखाव करती हैं, जिनसे सिंचाई और घरेलू जरूरतों के लिए पानी नीचे के इलाकों तक पहुंचता है। बांध सुरक्षा विभाग में काम करने वाली एस. मंजू निरीक्षण के लिए राज्य भर के बांध स्थलों पर जाती हैं। वह कहती हैं, "यह जानकर हमें संतोष मिलता है कि हमारे काम का असर लोगों के जीवन पर पड़ता है।"

कई महिलाओं के लिए कामकाजी दुनिया से जुड़ना इस बात पर भी निर्भर करता है कि उन्हें रहने के लिए सुरक्षित जगह मिलती है या नहीं। विश्व बैंक के सहयोग से बने थोझी हॉस्टल (जिसका तमिल भाषा में अर्थ होता है: दोस्त) कामकाजी महिलाओं को किफायती और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराते हैं। तमिलनाडु के 10 शहरों में बने इन हॉस्टलों में चौबीसों घंटे सुरक्षा, बच्चों के लिए क्रेच और ताजा भोजन की व्यवस्था है। इन 10 हॉस्टलों में इस समय करीब 2,000 महिलाएं रह रही हैं और इनकी क्षमता का लगभग 90 प्रतिशत उपयोग हो रहा है।

इसी पहल को आगे बढ़ाते हुए जून 2025 में 150 मिलियन डॉलर का तमिलनाडु वेसफे कार्यक्रम मंज़ूरी दी गई। इसके तहत 16 लाख महिलाओं को रोजगार तक बेहतर पहुंच मिलेगी, 6 लाख महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण दिया जाएगा और क्रेच, सुरक्षित परिवहन तथा शिकायत हेल्पलाइन जैसी सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा।

राष्ट्रीय स्तर पर फरवरी 2026 में 830 मिलियन डॉलर का पीएम सेतु कार्यक्रम को भी मंज़ूरी दी गई।। इसके तहत देश के औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों को आधुनिक बनाया जाएगा, ताकि हर साल 10 लाख से अधिक युवाओं को बेहतर कौशल प्रशिक्षण मिल सके। इसमें यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि कम से कम 25 प्रतिशत छात्र महिलाएं हों, ताकि महिलाएं उन बेहतर वेतन वाले कामों तक पहुंच सकें, जिन्हें लंबे समय से पुरुषों का क्षेत्र माना जाता रहा है।

महिला उद्यमिता

देश भर में महिलाएं अपने दम पर कारोबार खड़ा कर रही हैं। तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में, 25 वर्षीय नित्या ने एक सामुदायिक कौशल स्कूल में 20 दिवसीय राजमिस्त्री पाठ्यक्रम में दाखिला लिया, तीन अन्य महिलाओं के साथ साझेदारी की और अपना पहला ऑर्डर हासिल किया जो की था - 15 लाख रुपये (लगभग 16,000 डॉलर) मूल्य के 600 साइन बोर्ड। आज वह रोज लगभग 1,000 रुपये कमाती हैं और अपने गांव की तीन अन्य महिलाओं को भी काम दे रही हैं। वह कहती हैं, "मुझे कभी नहीं लगा था कि प्रशिक्षण के तुरंत बाद इतनी जल्दी कमाई शुरू हो जाएगी।"

उनकी कहानी एक बड़े बदलाव की झलक दिखाती है। तमिलनाडु ग्रामीण परिवर्तन परियोजना के तहत बने 2,500 सामुदायिक कौशल विद्यालयों ने 50,000 से अधिक युवाओं को प्रशिक्षण दिया है, जिनमें 65 प्रतिशत महिलाएं हैं। इस पहल से अब तक 1 लाख उद्यम शुरू हुए हैं और 53,000 रोजगार के अवसर बने हैं।

गुजरात के आनंद जिले में बुनाई का काम करने वाली मुस्कानबेन वोहारा को सेल्फ एम्प्लॉयड वूमेंस एसोसिएशन (सेवा) ने लीलावाटी परियोजना के तहत डिजिटल कौशल का प्रशिक्षण दिया। इस परियोजना को जापान सोशल डेवलपमेंट फंड का सहयोग मिला और इसका प्रबंधन विश्व बैंक ने किया। इस प्रशिक्षण के बाद उन्होंने और उनके साथियों ने अपने उत्पादों की तस्वीरें ऑनलाइन साझा करना शुरू किया, व्हाट्सएप पर ग्राहकों के समूह बनाए और डिजिटल भुगतान की सुविधा शुरू की। इससे उनका कारोबार लगातार चलता रहा और उनका पूरा सामान भी बिक गया। मुस्कानबेन गर्व से कहती हैं, "न केवल हमारा काम बिना रुके चलता रहा और हमने घरेलू सजावट के अपने सारे उत्पाद बेच दिए।" सेवा संगठन अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की मदद करता है, जैसे की दर्जी, कारीगर, छोटे विक्रेता और छोटे किसान।

हालांकि केवल कौशल ही पर्याप्त नहीं होता। महिला उद्यमियों को अक्सर पूंजी जुटाने में कठिनाई होती है। शिवगंगई जिले में हार्डवेयर की दुकान चलाने वाली जानकी के पास मेहनत और ग्राहक तो थे, लेकिन बैंक से ऋण लेने के लिए जरूरी गिरवी नहीं थी। विश्व बैंक के सहयोग से चल रहे एक कार्यक्रम, “मैचिंग ग्रांट्स प्रोग्राम” के तहत उन्हें 30 प्रतिशत की अनुदान राशि मिली, जो गिरवी के रूप में काम आई, और उन्हें पेशेवर सहायता भी मिली। वह बताती हैं, "मेरी आय में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और मैंने मदद के लिए एक और महिला को काम पर रखा है।" साल 2022 से अब तक इस कार्यक्रम के जरिए 8,400 महिला उद्यमों को 267 करोड़ रुपये के ऋण दिलाने में मदद मिली है।

इसके बावजूद लाखों महिलाओं के पास अब भी पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर एरोड में सड़क किनारे बिरयानी का स्टॉल चलाने वाली सुबिता बानू जैसी महिलाएं। उनका कारोबार स्वयं सहायता समूहों से मिलने वाले छोटे ऋणों की पात्रता के लिहाज़ से तो बड़ा है, लेकिन औपचारिक वित्तीय संस्थानों के लिए छोटा है है। विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के स्वामित्व वाले ऐसे उद्यम 2.2 करोड़ से 2.7 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं। इस वित्तीय कमी को दूर करना बेहद जरूरी है। फिलहाल महिला उद्यमिता में लैंगिक अंतर के मामले में भारत 77 देशों में 70वें स्थान पर है।

सामुदायिक भागीदारी करतीं महिलाएं

झारखंड के गिरिडीह जिले की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अनीता देवी उन लाखों अग्रिम पंक्ति की महिला कार्यकर्ताओं में शामिल हैं, जो लंबे समय से कुपोषण के खिलाफ काम कर रही हैं। जब कोविड महामारी आई, तो इन महिलाओं ने और भी बड़ी जिम्मेदारी निभाई। वे घर घर जाकर लोगों की यात्रा संबंधी जानकारी दर्ज करती थीं, लक्षणों पर नजर रखती थीं और संक्रमित लोगों के संपर्क में आए लोगों का पता लगाने में मदद करती थीं। अनीता देवी कहती हैं, "जब डॉक्टर और नर्स अपने परिवारों को छोड़कर दिन रात काम कर सकते हैं, तो हम भी अपने स्तर पर योगदान क्यों नहीं दे सकते।"

महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों ने भी इसी भावना के साथ काम किया। आज यह गरीबों का एक बड़ा संस्थागत मंच बन चुका है, जिसमें 90 लाख समूहों के जरिए 10 करोड़ से अधिक सदस्य जुड़े हैं। महामारी के दौरान इन समूहों की महिलाओं ने फेस मास्क बनाए, सामुदायिक रसोई चलाई, जरूरतमंदों तक खाद्य सामग्री पहुंचाई और अफवाहों के खिलाफ लोगों को जागरूक किया। इससे यह भी साबित हुआ कि वे सामूहिक रूप से बड़े स्तर पर काम करने की क्षमता रखती हैं।

बिहार में विश्व बैंक के सहयोग से चल रहे जीविका कार्यक्रम के तहत 7,500 पोषण सखियों को प्रशिक्षण दिया गया है। ये महिलाएं रोज घरों में जाकर गर्भवती महिलाओं और नई माताओं को सही आहार और बच्चों की देखभाल के बारे में सलाह देती हैं। मुजफ्फरनगर की 29 वर्ष की विनीता 2019 में इस कार्यक्रम से जुड़ी थीं। उस समय उनके गांव में महिलाएं पोषण की बात सुनते ही पीछे हट जाती थीं। आज हालात बदल गए हैं और लोग उनका स्वागत करते हैं। विनीता घरों में लाल और हरी बिंदी के सरल तरीके से बच्चों के पोषण की स्थिति पर नजर रखती हैं। इसी कार्यक्रम के तहत बिहार के अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में 135 स्वास्थ्य मित्र भी तैनात किए गए हैं। 27 वर्ष की शालिनी हर सुबह तीन ऑटो बदलकर भागलपुर मेडिकल कॉलेज में सुबह छह बजे की ड्यूटी पर पहुंचती हैं। वह गरीब मरीजों और उनके परिजनों को अस्पताल की प्रक्रियाओं को समझने और सही विभाग तक पहुंचने में मदद करती हैं। शालिनी कहती हैं, "मेरा काम उन्हें रास्ता दिखाना और सही विभाग से जोड़ना है।" उनकी आय से अब वे अपने बच्चों को बिना किसी पर निर्भर हुए स्कूल भेज पा रही हैं। समस्तीपुर जिले में जीविका से जुड़ी 40 महिलाएं अब बालाहर नाम का पौष्टिक शिशु आहार तैयार कर उसे पैक करती हैं। इस तरह पोषण से जुड़ी एक पहल को उन्होंने आजीविका के अवसर में भी बदल दिया है।


बाधाएं तोड़कर आगे बढ़तीं महिलाएं

झारखंड में महिलाओं ने उस समय एक बड़ी सामाजिक धारणा को तोड़ा, जब उन्होंने स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण अभियान में राजमिस्त्री का काम संभाला। इन महिलाओं को रानी मिस्त्री कहा जाता है। आज झारखंड में 50,000 से अधिक प्रशिक्षित महिला राजमिस्त्रियों की एक मजबूत टीम है, जिन्होंने राज्य को 2018 में खुले में शौच से मुक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसी राज्य में 1,000 से अधिक पशु सखियां भी काम कर रही हैं। विश्व बैंक के समर्थन से चल रही जोहार परियोजना के तहत इन पशु सखियों को पशुओं के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए प्रशिक्षित किया गया है। गुमला जिले की सोमाती पहले महीने में 3,000 से 5,000 रुपये कमाती थीं, लेकिन अब उनकी आय 10,000 से 20,000 रुपये तक पहुंच गई है और उनके बच्चे निजी स्कूल में पढ़ते हैं। वह मुस्कराते हुए कहती हैं, "जब गांव के लोग मुझे बकरियों की डॉक्टर कहकर बुलाते हैं तो बहुत संतोष मिलता है।" जोहार परियोजना करीब 57,000 किसानों की मदद कर रही है, जिनमें 90 प्रतिशत महिलाएं हैं। पशु सखी मॉडल को संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन ने किसानों तक सेवाएं पहुंचाने के लिए दुनिया के आठ सर्वश्रेष्ठ मॉडलों में शामिल किया है।

असम में 37 वर्ष की कमल कुमारी जयमति किसान उत्पादक कंपनी की अध्यक्ष हैं। यह पूरी तरह महिलाओं की भागीदारी वाली कंपनी है, जिसमें 25 गांवों की 435 महिलाएं इस कंपनी में शेयरधारक हैं। वर्ष 2022 में इस कंपनी ने अपने आलू की फसल के लिए एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के साथ खरीद की गारंटी वाला समझौता किया और 20 लाख रुपये का मुनाफा कमाया। कमल कुमारी कहती हैं, "हम हमेशा किसान रहे हैं, लेकिन अब हम कृषि उद्यमी बन गए हैं।" विश्व बैंक के सहयोग से चल रहे असम एग्रीबिजनेस एंड रूरल ट्रांसफॉर्मेशन प्रोजेक्ट (अपार्ट) के तहत राज्य में ऐसी 125 कंपनियां स्थापित की गई हैं, जिनमें 20,000 से अधिक महिला शेयरधारक हैं। कंपनी की सदस्य रंजू गोआला के लिए यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं बल्कि व्यक्तिगत भी है। वह बताती हैं, "पहले मैं लोगों के सामने खड़े होकर बोल भी नहीं पाती थी। आज मैं बाहरी लोगों से बातचीत कर सकती हूं, व्यापार से जुड़ी चर्चा में भाग ले सकती हूं और अपनी राय खुलकर रख सकती हूं। अब मेरी अपनी पहचान है और मुझे आत्मविश्वास महसूस होता है।”

आगे की राह

विश्व बैंक समूह की जेंडर (लैंगिक) रणनीति 2024-2030 का उद्देश्य सामूहिक प्रयास, पर्याप्त वित्तीय सहयोग और बड़े पैमाने पर कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं के बुनियादी कल्याण, आर्थिक भागीदारी और नेतृत्व को मजबूत करना है।

विश्व बैंक उन साहसी महिलाओं का सम्मान करता है जो पीढ़ियों से तय की गई पारंपरिक भूमिकाओं को तोड़कर आगे बढ़ रही हैं। रानी मिस्त्री उषा की बेटी शीतल छाया कहती हैं, "यह जरूरी है कि महिलाएं काम करें। तभी अर्थव्यवस्था में सुधार होगा।”

 



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भारत की महिला बांध इंजीनियर्स (अंग्रेजी में)


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जीविका नई आजीविका के माध्यम से ग्रामीण बिहार में महिलाओं को सशक्त बनाती है



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सड़कें भारतीय गांवों में महिलाओं को सशक्त बनाती हैं





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ग्रामीण तमिलनाडु में कौशल शिक्षा से प्रेरित महिला उद्यमी

‘द तमिनाडु रूरल ट्रांस्फॉर्मेशन प्रॉजेक्ट’ यानी तमिलनाडु ग्रामीण परिवर्तन प्रॉजेक्ट आगे बढ़ने की इच्छा रखने वाली महिला उद्यमियों के सामने वित्तीय चुनौतियों का समाधान निकालने में मदद कर रहा है। मैचिंग ग्रांट्स प्रोग्राम के ज़रिए जानकी जैसी महिलाओं को कर्ज़ लेने और व्यवसाय को बढ़ाने में ज़रूरी मदद मिल रही है। इस प्रोग्राम ने वर्ष 2022 से 8400 महिलाओं को 267 करोड़ रुपए का कर्ज़ दिलाने में मदद की है । इस प्रॉजेक्ट से एक लाख नए व्यवसाय खुले और 53 हज़ार लोगों को नौकरियाँ मिलीं।

स्वास्थ्य सेवा और पोषण के गुमनाम सिपाही

बिहार में लगभग 7,500 पोषण सखियों की एक समर्पित शक्ति है, जो गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार के जीविका कार्यक्रम के तहत काम करती हैं। आज बिहार में, 5 साल से कम उम्र के लगभग आधे बच्चे अधिक विविध आहार खा रहे हैं। अब प्रजनन आयु की 10 में से 6 महिलाएं भी बेहतर आहार खा रही हैं। जीविका कार्यक्रम के तहत पूरे बिहार में 35 जिला अस्पतालों और 10 मेडिकल कॉलेजों में 135 स्वास्थ्य मित्र कार्यरत हैं।

कृषि उद्यमों में सफ़लता - असम राज्य की कहानी

विश्व बैंक ने उत्पादकता, बाजार तक पहुंच और कृषि व्यवसाय को बढ़ावा देने वाली परियोजनाओं के माध्यम से दो दशकों से अधिक समय से असम की कृषि का समर्थन किया है, जिससे 5.5 लाख से अधिक किसानों को लाभ हुआ है और हजारों उद्यमों का रूपांतरण हुआ है।

महिला उद्यमी ऐसे बढ़ रही हैं आगे

ग्रामीण महिला उद्यम 2.2–2.7 करोड़ लोगों को रोज़गार देते हैं, लेकिन इन्हें कर्ज़, नीतिगत समर्थन और व्यावसायिक सेवाओं की कमी का सामना करना पड़ता है। इन विकास उन्मुख महिला उद्यमों (GOWEs) को सही वित्तीय उत्पाद, क्षेत्र-विशेष कार्यक्रम और एकीकृत सहायता मिले, तो ग्रामीण रोज़गार बढ़ेगा, लैंगिक असमानता घटेगी और दीर्घकालिक आर्थिक विकास होगा।

भारत के तमिलनाडु राज्य में 16 लाख महिलाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण नौकरियों तक पहु...

विश्व बैंक ने भारत के तमिलनाडु राज्य को सहयोग देने के लिए एक नए कार्यक्रम को मंजूरी दी, जिससे 16 लाख महिलाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण नौकरियों को पाने में मदद मिलेगी और राज्य में महिला श्रम बल की भागीदारी बढ़ेगी।

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