Skip to Main Navigation
मुख्य कहानी 13 मार्च, 2020

ग्रामीण झारखंड में रानी मिस्त्रियाँ तोड़ रही हैं लैंगिक रूढ़ियाँ

Image

भारत में, चिनाई का काम एक विशेष कौशल है जो आमतौर पर पुरुषों का वर्चस्व है। लेकिन झारखंड की रानी मिस्त्रियाँ अब इस लिंग स्टीरियोटाइप को तोड़ चुकी हैं।


"हमने जो कौशल सीखा है वह हमें बहुत गर्व महसूस कराता है। हम अब और अधिक आश्वस्त हैं और आत्म-मूल्य की एक महान भावना महसूस करते हैं, - रानी मिस्त्रियाँ

दो बच्चों की माँ छत्तीस वर्षीय निशात जहाँ ईंटों की एक कतार पर झुकी हुई ध्यान से जाँच रही है कि ईंटें सीधी रेखा में हैं या नहीं। सुबह के 9:30 बजे हैं और वह अब तक एक शौचालय की आधी दीवार बना चुकी है। उसके काम करने की रफ्तार देखकर ग्रामीणों को आश्चर्य होता है।

उससे कुछ फुट दूर,उसकी सहेली और सहकर्मी 42 वर्षीया उषा रानी, 4 फुट गहरे गड्ढे के अंदर खड़ी है और ईंट और सीमेंट से बड़ी सफाई से उसे पक्का कर रही है। निशात और उषा झारखंड की राजधानी राँची से लगभग 70 किलोमीटर दूर हजारीबाग ब्लॉक के सिलबर खुर्द गाँव में एक घर में शौचालय का निर्माण कर रही हैं। निशात ने गर्व से दावा किया कि "मैं इस शौचालय की दीवारों का निर्माण एक दिन में कर लूँगी।" आमतौर पर 3 से 4 महिलाओं के समूह को दो गड्ढों वाले शौचालय का निर्माण करने में 3 से 4 दिन लगते हैं जिसे इन दो महिलाओं ने आधे समय में पूरा करने की योजना बनायी है।

यहाँ से लगभग 12 किलोमीटर दूर, बढ़िया ढंग से कपड़े पहने हुए महिलाओं का एक समूह सड़क किनारे के दुकानदारों के लिए एक शौचालय का निर्माण कर रहा है। इन महिलाओं में से एक, चालीस वर्षीया उर्मिला देवी, दो वर्षों से राजमिस्त्री हैं। वे बड़ी शान से बताती हैं कि ‘मैंने पूरे झारखंड राज्य में 1,000 से अधिक शौचालयों का निर्माण किया है। यहाँ तक कि मैं इनके निर्माण के लिए बिहार के चंपारण जिले में भी गयी थी।’ उनके साथ काम करने वाली पूनम देवी यह बता कर बात पूरी करती हैं कि उन्होंने पिछले एक साल में लगभग 900 शौचालय बनाये हैं।

भारत में, राजगीर का काम एक विशेष कौशल है जिस पर आमतौर पर पुरुषों का वर्चस्व है। इन लोगों को 'राजमिस्त्री' कहा जाता है –जिसमें 'राज' राजा या किंग का संक्षिप्त रूप है। परंपरागत रूप से, इस काम में महिलाओं ने ईंटें ढोने, सीमेंट का मिश्रण तैयार करने और पुरुषों के आदेशों का पालन करने जैसी सहायक भूमिकाएँ निभायी हैं।

झारखंड की रानी मिस्त्रियों के उत्साही समूह ने इस लैंगिक भेदभाव को अब तोड़ दिया। राज्य में स्वच्छ भारत मिशन के तहत बड़े पैमाने पर शौचालय निर्माण अभियान शुरू होने पर महिलाओं ने पहली बार राजगीर का काम किया। अधिकांश पुरुष शहरों में काम करने के लिए पलायन कर गये और जो कुछ पुरुष गाँवों में बचे रह गये, उन्हें लगता था कि ग्रामीण शौचालयों का निर्माण कर वे जो पैसा कमायेंगे, वह इस काम के लिए बहुत मामूली रकम है।

Image
छत्तीस वर्षीय निशात जहान, दो बच्चों की माँ, झारखंड में चिनाई के काम में प्रशिक्षित 50,000 रानी मिस्त्री में से एक हैं

आज झारखंड की 50,000 से अधिक की कुशल रानी मिस्त्रियों की कार्यशक्ति ने राज्य को नवंबर, 2018 में खुले में शौच से मुक्ति का दर्जा हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। जिस तरह इनके पुरुष समकक्षों को राजा कहा जाता है, उसी तरह इन महिलाओं को ‘’कहा जाता है।


"पारंपरिक सोच लोगों को घर के भीतर शौचालय बनाने से रोकती है। लेकिन हमें लगता है कि शौचालय परिसर के भीतर ही होना चाहिए ताकि रात में महिलाओं के लिए आसानी हो। हमें हमारे समुदाय की महिलाओं के लिए कुछ करने की जरूरत है और शौचालय पर जोर देना हमारे हित में है।"
उषा रानी

लैंगिक भेदभाव को तोड़ा

लेकिन यह इतना आसान नहीं था। शुरुआत में, ग्रामीण समुदाय, विशेष रूप से महिलाओं ने उन्हें खारिज करने की नजर से देखा। रानी मिस्त्रियों में से एक पूनम देवी याद करती हैं कि कैसे उनकी सास उनके राजगीर का काम सीखने के खिलाफ थीं। हालांकि, अपने पति के मजबूत समर्थन से वह शुरुआत करने में सक्षम हुईं। उन्होंने कहा कि ‘जब उन्होंने हमें आर्थिक रूप से स्वतंत्र होते देखा, तो हमें खारिज करने वाले बहुत से लोगों ने चोरी-छिपे पूछना शुरू किया कि वे भी यह काम कैसे सीख सकते हैं। महिलाएँ जब एक साथ खड़ी हो गयीं, तो समुदाय भी नरम पड़ गया।’

महिलाओं ने एक और वर्जना भी तोड़ी है। इससे पहले, वे काम करने के लिए अपने गाँवों से बाहर जाने के बारे में कभी सोच नहीं सकती थीं। महिलाओं ने या तो घर पर या खेत मजदूर के रूप मेंकाम किया था । लेकिन अब चीजें बदल गयी हैं। ‘शौचालय बनाने के लिए अनुरोध किये जाने पर हम अब अन्य गाँवों की यात्रा करते हैं। वास्तव में, हम लोग वहाँ के घर की महिलाओं से हमारी मदद करने के लिए कहते हैं। जब हम लौटने लगते हैं, तो उनमें से कुछ कहती हैं कि वे भी हमारी तरह बनना चाहते हैं।’

अन्य महिलाओं के साथनिशात ने शौचालय निर्माण की तकनीकी पर राँची शहर में प्रशिक्षण लिया था। सप्ताह भर चलने वाले मॉड्यूल में उन्हें सिखाया गया कि कैसे एक स्थल का निरीक्षण किया जाये और शौचालय निर्माण के लिए सबसे अच्छी जगह का आकलन किया जाये। उन्होंने सोख्ता गड्ढों और जुड़वाँ गड्ढों के पीछे की तकनीक भी जानी और उन्हें निर्माण तकनीक पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। एक हफ्ते के बाद, अपना खुद का काम शुरू करने से पहले, उन्होंने एक वरिष्ठ राजमिस्त्री के मातहत काम सीखा।

अब जब महिलाएँ काम करने बाहर जाती हैं, तो वे हमेशा परिवार को अपने घर के आंगन में शौचालय बनवाने की सलाह देती हैं। उषा रानी कहती हैं कि ‘पारंपरिक सोच लोगों को घर के भीतर शौचालय बनाने से रोकती है। लेकिन हमें लगता है कि शौचालय परिसर के भीतर ही होना चाहिए ताकि रात में महिलाओं के लिए आसानी हो। हमें हमारे समुदाय की महिलाओं के लिए कुछ करने की जरूरत है और शौचालय पर जोर देना हमारे हित में है।’

रानी मिस्त्री के रूप में उन्होंने निर्माण मजदूर के रूप में होने वाली अपनी कमाई से दोगुनी कमाई की। निशात, जिसका पति बेरोजगार है, अपनी नयी कमाई से उत्साहित है। ‘मैं अपनी कमाई अपने बच्चों की शिक्षा के लिए बचा लेती हूँ। यहाँ तक कि खुद पर खर्च करने के लिए भी अब मेरे पास नकदी बच जाती है।’

उषा रानी निशात में भरे नये विश्वास की पुष्टि करती हैं। ‘हमने जो कौशल सीखा है, उससे हमें बहुत गर्व होता है। मुझमें अब ज्य़ादा आत्मविश्वास है और अपने होने की सार्थकता महसूस होती है।’

Image
उषा रानी अपनी बेटी शीतल छैया के साथ हजारीबाग ब्लॉक, झारखंड में। उषा अब अपने कौशल में जोड़ने के लिए प्लंबिंग का काम सीखना चाहती हैं।
 


और अधिक करने के लिए उत्साहित और उत्सुक

अपने काम की सफलता को देखते हुए, रानी मिस्त्रियाँ अब दूसरे काम भी सीखना चाहती हैं, खासकर इसलिए क्योंकि राज्य में शौचालय निर्माण का काम अब काफी हद तक पूरा हो गया है। उषा ने कहा कि ‘हमने सभी घरों में पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए सरकार के जल जीवन कार्यक्रम के बारे में सुना है। अब हम प्लंबर के रूप में प्रशिक्षित होना चाहेंगे।’

महिलाओं की सक्रियता पर सरकारी अधिकारी चकित हैं। ‘सीखने के लिए उनका उत्साह हमें भी उत्साहित करता है। वे प्लंबर बनना चाहती हैं और ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन तकनीकों और वर्षा जलसंग्रह पर और अधिक सीखना चाहती हैं।’

महिलाओं की सफलता उनकी बेटियों को गौरवान्वित कर रही है और उनकी खुद की महत्वाकाँक्षाओं को उकसा रही है। उषा की बेटी शीतल छाया भारतीय पुलिस सेवा में शामिल होना चाहती हैं। वह पूरे विश्वास के साथ कहती है, ‘यह महत्वपूर्ण है कि महिलाएँ काम करें। अर्थव्यवस्था में सुधार का यही एकमात्र तरीका है।’



Api
Api