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भारत संक्षिप्त विवरण

  • 1.2 अरब की जनसंख्या और विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले भारत की हाल की संवृद्धि तथा इसका विकास हमारे समय की अत्यंत उल्लेखनीय सफलताओं में से है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद से बीते 65 वर्षों से भी अधिक समय के दौरान भारत के कृषि-क्षेत्र में अभूतपूर्व क्रांति आई है, जिसकी वजह से काफी समय से अनाज के निर्यात पर निर्भर यह देश कृषि के वैश्विक पॉवर हाउस में बदल गया है और आज अनाज का शुद्ध निर्यातकर्ता है। औसत आयु बढ़कर दोगुने से भी अधिक हो गई है, साक्षरता की दर में चौगुनी बढ़ोतरी हुई है, स्वास्थ्य-संबंधी परिस्थितियों में सुधार हुआ है और अच्छे ख़ासे मध्य वर्ग का आविर्भाव हुआ है। आज भारत औषधियों, इस्पात, सूचना तथा अंतरिक्ष-संबंधी प्रौद्योगिकियों के क्षेत्रों में विश्व-स्तर की जानी-मानी कंपनियों का घर बन चुका है तथा इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी आवाज़ माना जाता है, जो इसके विशाल आकार और संभावनाओं के अनुरूप है।

    ऐतिहासिक बदलाव आ रहे हैं, जिनसे इसे 21वीं सदी का मजबूत देश बनाने के लिए नए-नए अवसर पैदा हो रहे हैं। जल्दी ही भारत विश्व का सबसे विशाल और अत्यंत युवा श्रमशक्ति वाला देश बन जाएगा। साथ ही देश में शहरीकरण की व्यापक लहर उठ रही है और प्रति वर्ष लगभग 1 करोड़ लोग रोज़गार तथा अवसरों की तलाश में कस्बों और शहरों की ओर रुख कर रहे हैं। यह इस सदी का विशालतम ग्रामीण और शहरी प्रवासन (माइग्रेशन) है।

    आने वाले ऐतिहासिक बदलावों की वजह से देश एक अदभुत मोड़ पर पहुंच गया है। भारत अपनी श्रमशक्ति की उल्लेखनीय सामर्थ्य का किस प्रकार से विकास करता है और अपने बढ़ते हुए नगरों व कस्बों की संवृद्धि के लिए किस तरह की नई योजनाएं तैयार करता है – इन्हीं चीज़ों से आने वाले समय में देश और इसके निवासियों का भविष्य अधिकतर निर्धारित होगा।

    बढ़ती हुई उम्मीदों को पूरा करने के लिए रोज़गार के अवसर पैदा करने, रिहायशी मकानों और बुनियादी सुविधाओं (इंफ़्रास्ट्रक्चर) का गठन करने के लिए ज़रूरी पूंजी निवेश की ज़रूरत होगी, जिनसे कस्बे तथा शहर अधिक रहने योग्य तथा हरे-भरे हो जाएंगे।

    भारत की 40 करोड़ से अधिक जनता – या अभी तक ग़रीबी के चंगुल में फंसे विश्व के एक-तिहाई ग़रीबों - का उत्थान करने में समर्थ संवृद्धि अर्जित करना भारत के लिए मुख्य बात होगी। और, हाल ही में (अकेले 2005-2010 के बीच) ग़रीबी के चंगुल से छूटने वाले 5.3 करोड़ लोगों में से अनेक के दोबारा इसमें फंस जाने की संभावना है। वास्तव में जनसंख्या में वृद्धि हो जाने से भारत के कुछ एक सर्वाधिक ग़रीब राज्यों में वस्तुतः पिछले वर्षों में ग़रीबों की कुल संख्या बढ़ी है।

    राज्यों, जातियों तथा स्त्री-पुरुषों के बीच भेदभाव समेत सभी स्तरों पर मौजूद समस्त प्रकार की असमानताओं पर ध्यान देना होगा। भारत के सर्वाधिक ग़रीब राज्यों में ग़रीबी की दर अत्यंत विकसित राज्यों की तुलना में तीन से चार गुना अधिक है। जबकि भारत की वार्षिक औसत प्रति व्यक्ति आय वर्ष 2011 में $1,410 थी (विश्व के मध्यम आय वर्ग के देशों में सर्वाधिक ग़रीब देशों के बीच स्थान) – उत्तर प्रदेश में, जिसकी जनसंख्या ब्राज़ील से भी अधिक है, यह मात्र $436 और भारत के सर्वाधिक ग़रीब राज्यों में से एक बिहार में केवल $294 थी। ऐसे वर्गों को मुख्य धारा में लाने की, जिससे ये आर्थिक संवृद्धि के लाभों का उपयोग कर सकें, और महिलाओं को (विश्व की आधी जनसंख्या) अधिकारिता देने की ज़रूरत होगी, ताकि उन्हें देश के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने में अपना न्यायोचित स्थान मिल सके।

    शिक्षा तथा कुशलताओं के स्तरों को अधिकाधिक उन्नत करना विश्व में, जिसका तेज़ी से ग्लोबलाइज़ेशन हो रहा है, समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए महत्त्वपूर्ण होगा। हालांकि प्राथमिक शिक्षा का  काफी हद तक सर्वव्यापी (यूनिवर्सलाइज़) हो चुका है, अधिगम (लर्निंग) संबंधी परिणाम काफी नीचे हैं। काम करने की आयु वाली जनसंख्या का 10% से भी कम माध्यमिक शिक्षा पूरी कर पाया है और माध्यमिक शिक्षा पूरी करने वालों में आज के बदलते हुए रोज़गार बाज़ार में प्रतिस्पर्द्धा का सामना करने लायक जानकारी और कुशलता की कमी है।

    स्वास्थ्य-संबंधी देखभाल भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण होगी। हालांकि भारत के स्वास्थ्य-संबंधी संकेतकों में सुधार हुआ है, माताओं और बच्चों की मृत्यु दरें बहुत नीचे हैं और कुछ राज्यों में इनकी तुलना विश्व के सर्वाधिक ग़रीब देशों के आंकड़ों से की जा सकती है। भारत के बच्चों में कुपोषण विशेष रूप से चिंता का विषय है, जिनके कल्याण से भारत के प्रतीक्षित जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्रैफ़िक डिविडेंड) का स्तर निर्धारित होगा। इस समय विश्व के कुपोषण का शिकार बच्चों का 40% (21.7 करोड़) भारत में है।

    देश की अवसंरचना-संबंधी आवश्यकताएं काफी अधिक हैं। तीन ग्रामवासियों में से एक की सभी मौसमों में खुली रहने वाली सड़क तक पहुंच नहीं है और पांच राष्ट्रीय राजमार्गों में से एक ही चार गलियारों वाला (फ़ोर लेन) है। बंदरगाहों और हवाईअड्डों की क्षमता पर्याप्त नहीं है तथा रेलगाड़ियां बहुत धीरे चलती हैं। अनुमान है कि 30 करोड़ लोग राष्ट्रीय बिजली ग्रिड से नहीं जुड़े हैं और जो जुड़े भी हैं उन्हें अक्सर ही आपूर्ति में बाधाओं का सामना करना पड़ता है। रोज़गार के अवसर पैदा करने के लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण विनिर्माण क्षेत्र अभी छोटा है और पूरी तरह विकसित नहीं है।

    तथापि, भारत के अनेक राज्य देश के सामने काफी समय से मौजूद चुनौतियों का सामना करने के लिए नए और ठोस प्रयास करने की दिशा में पहल कर रहे हैं और चहुंमुखी विकास की दिशा में भारी प्रगति कर रहे हैं। इनकी सफलताएं आगे बढ़ने के लिए देश का मार्गप्रशस्त कर रही हैं, जिससे पता चलता है कि सर्वाधिक ग़रीब राज्य अत्यंत खुशहाल राज्यों से सीखकर क्या कुछ नहीं कर सकते।

    आज भारत के पास अपने 1.2 अरब नागरिकों के रहन-सहन के स्तर में सुधार करने तथा सच्चे अर्थों में समृद्धिशाली भविष्य की नींव डालने के विरले अवसर सुलभ हैं – ऐसा भविष्य जिसका देश और इसकी आने वाली पीढ़ियों पर प्रभाव पड़ेगा।

  • भारत के लिए नई कंट्री पार्टनरशिप स्ट्रैटेजी अगले चार वर्षों (2013-2017) में भारत को विश्व बैंक ग्रुप की सहायता का मार्गदर्शन करेगी। सरकार के साथ गहन सलाह-मशविरे और नागरिक संगठनों तथा निजी क्षेत्रों से प्राप्त जानकारी की मदद से विकसित इस कार्यनीति से भारत को “अधिक तेज़ी से, व्यावहारिक और अधिक चहुंमुखी संवृद्धि” अर्जित करने के लिए आधारशिलाएं रखने में मदद मिलेगी, जिसकी रूपरेखा सरकार की 12वीं पंचवर्षीय योजना में दी गई है।

    विश्व बैंक ग्रुप वित्त, परामर्शदात्री सेवाओं और नॉलेज (ज्ञान) का समेकित पैकेज उपलब्ध कराकर भारत की मदद करेगा – ऐसा पैकेज, जिसे अलग-अलग राज्यों की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। नई कार्यनीति की एक मुख्य विशेषता है - कम आमदनी वाले और विशेष श्रेणियों के राज्यों को दी जाने वाली सहायता में उल्लेखनीय परिवर्तन, जिनमें भारत के अनेक ग़रीब और अभावग्रस्त लोग रहते हैं।

    यह ग़रीबी दूर करने तथा साझा समृद्धि में बढ़ोतरी करने वाले इस संस्था के नए वैश्विक उद्देश्यों को समेकित करने वाली विश्व बैंक ग्रुप की पहली देश रणनीति (कंट्री स्ट्रैटेजी) है। इसमें दो परिदृश्य (सेनैरिओ) प्रस्तुत किए गए हैं, जिनमें अगले 17 वर्षों में संवृद्धि, ग़रीबी में कमी और समृद्धि के लिए भारत की संभावनाओं को प्रदर्शित किया गया है। “2030 के महत्त्वाकांक्षी परिदृश्य” में भारत की संवृद्धि की औसत दर 8.2% है और इसमें अंतिम दशक के उत्तरार्द्ध के दौरान आर्थिक संवृद्धि बेहतर कार्य-प्रदर्शन करने वाले राज्यों की तरह चहुंमुखी है। संभावना काफी व्यापक है; ग़रीबी 29.8% (2010) से घटकर 2030 तक 5.5% रह जाएगी तथा ऐसे लोगों की भागीदारी, जिनके दोबारा ग़रीबी के चंगुल में फंसने की कोई आशंका नहीं रहेगी, 19.1% से बढ़कर 41.3% हो जाएगी। अगर भारत का विकास संवृद्धि को अधिक चहुंमुखी किए बिना होता है, जैसा कि 2005 से 2010 के बीच हुआ था, तो भारत में ग़रीबी में 2030 तक केवल 12.3% की गिरावट ही आएगी।

    नई कार्यनीति के अंतर्गत विश्व बैंक ग्रुप की वित्तीय सहायता के अगले पांच वर्षों तक $3 अरब से लेकर $5 अरब के बीच रहने की आशा है। 60% वित्तीय सहायता राज्य सरकार द्वारा समर्थित परियोजनाओं को दी जाएगी। इसका आधा या सकल लेंडिंग का 30% कम आय वाले या विशेष श्रेणी के राज्यों को दिया जाएगा।

    क्षेत्र, जिन पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाएगा

    अगले पांच वर्षों में विश्व बैंक ग्रुप तीन मुख्य क्षेत्रों पर ध्यान देगाः एकीकरण (इंटेग्रेशन), ग्रामीण-शहरी रूपांतरण और अंतर्वेशन (इन्क्लूश्ज़न) इन क्षेत्रों से संबंधित समान विषय होंगेः बेहतर शासन, पर्यावरणीय व्यावहारिकता, निजी क्षेत्र और स्त्री-पुरुष समानता।

    • एकीकरणः भारत की विशालकाय अवसंरचना की आवश्यकताओं पर अकेले सार्वजनिक निवेशों के ज़रिये ध्यान नहीं दिया जा सकता। कार्यनीति में अवसंरचना में सार्वजनिक और निजी दोनों ही प्रकार के निवेशोँ में सुधार करने पर ध्यान दिया जाएगा। उदाहरण के लिए, आर्थिक संवृद्धि के लिए महत्तवपूर्ण बिजली क्षेत्र की क्षमता का बड़े पैमाने पर विस्तार करने तथा बिजली के उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण की विश्वसनीयता में सुधार करने की ज़रूरत होगी। अत्यंत सक्रिय विनिर्माण क्षेत्र के लिए – विशेषकर लघु और मझले आकार के उद्यम, जो रोज़गार पैदा करने के लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण हैं – श्रम कानूनों में सुधार करने तथा भूमि और वित्त तक पहले से बेहतर पहुंच बनाने की ज़रूरत होगी। बेहतर एकीकरण का परिणाम भारतीय राज्यों के बीच और अधिक संतुलित संवृद्धि के रूप में निकलेगा, जिससे कम आय वाले राज्यों को तेज़ी से विकसित होते उनके पड़ोसियों के साथ तेज़ी से आगे बढ़ने में मदद मिलेगी।
    • ग्रामीण-शहरी रूपांतरणः “रूपांतरण” नई कार्यनीति के दृष्टिकोण में सबसे बड़े बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है। सुव्यवस्थित शहरीकरण से भारत में उन 60 करोड़ लोगों को अनगिनत लाभ पहुंच सकते हैं, जिनके वर्ष 2031 तक भारत में शहरों में रहने का अनुमान है। तदनुसार, नई कार्यनीति का लक्ष्य ग्रामीण इलाकों से शहरों में स्थानांतरण को संवृद्धि और अंतर्वेशन (इन्क्लूश्ज़न) के लिहाज़ से यथासंभव उत्पादक बनाने और शहरी इलाकों, विशेषकर दूसरे स्तर के (सेकंडरी) नगरों में रहन-सहन का सुधार करने में भारत की मदद करना है, जहां जनसंख्या में अच्छी ख़ासी बढ़ोतरी हो रही है। साथ ही, देश के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने में कृषि के सतत महत्तव को देखते हुए कार्यनीति से भारत को कृषि की उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में काम करने में मदद मिलेगी।
    • अंतर्वेशन (इन्क्लूश्ज़न): आर्थिक एकीकरण और ग्रामीण-शहरी रूपांतरण से भारत की जनसंख्या के एक विशाल भाग को मानव विकास तथा उन नीतियों पर सशक्त रूप से ध्यान देने पर ही लाभ पहुंच सकता है, जिनसे संवृद्धि को सर्वांगीण बनाने में मदद मिलती है। विश्व बैंक ग्रुप पोषण में सुधार करने के लिए पोषण-संबंधी नीति के साथ-साथ इसकी कार्यप्रणालियों व क्षमताओं को मजबूत बनाने के लिए केन्द्र तथा राज्य सरकारों की मदद करेगा। यह शिक्षा में मुख्य रूप से माध्यमिक और तृतीयक स्तरों पर शिक्षा में सुधार करने के लिए सरकारी प्रयासों में मदद करेगा। अभावग्रस्त बच्चों की शिक्षा तक पहुंच बनाने, लड़कियों को माध्यमिक शिक्षा में बनाए रखने और उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में अवसर सुनिश्चित करने पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाएगा। यह वित्त तक पहुंच में सुधार तथा ग़ैर-औपचारिक क्षेत्र में कार्यरत 90% से अधिक श्रमशक्ति के लिए सामाजिक सुरक्षा कवरेज का विस्तार करने के लिए भी काम करेगा।
  • विश्व बैंक ग्रुप द्वारा विगत में भारत की विकास-संबंधी कार्यसूची को दिए गए समर्थन से अनेक क्षेत्रों में परिणामों को सुधारने में अंशदान हुआ है। ऐसे कुछ परिणामों का उल्लेख नीचे किया जा रहा है:

    • 2001 और 2009 के बीच भारत के सर्व शिक्षा अभियान में स्कूल न जाने वाले लगभग दो करोड़ बच्चों, विशेषकर लड़कियों तथा सामाजिक दृष्टि से अभावग्रस्त परिवारों के बच्चों को दाखिला दिया गया। 2009 तक स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या घटकर लगभग 81 लाख रह गई। आज भारत के 98% से अधिक बच्चों को अपने घरों से एक किमी. की दूरी के भीतर प्राइमरी स्कूल सुलभ है। आज अधिगम (लर्निंग) की क्वालिटी में सुधार करने, बच्चों को स्कूलों में बनाए रखने और यह सुनिश्चित करने पर ध्यान दिया जाता है कि अधिकाधिक बच्चों की माध्यमिक शिक्षा तक पहुंच हो और वे इसे पूरा कर सकें।
    • चुनी हुई संस्थाओं में व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए विश्व बैंक की सहायता से स्कूली शिक्षा पूरी करने वाले पहले से अधिक बच्चों को रोज़गार पाने में मदद मिली है और इनकी संख्या 2006 में मात्र 32% से बढ़कर 2011 में 60% से अधिक हो गई। इसके बावजूद, विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में भारत के युवाजन को बड़ी संख्या में उन कुशलताओं से - ऐसी कुशलताएं, जो औपचारिक या ग़ैर-औपचारिक श्रम बाज़ार की मांगों से बेहतर ढंग से मेल खाती हैं - सशक्त बनाने से उन्हें शहरी इलाकों में रोज़गार पाने में मदद मिलेगी, जहां अच्छे पारिश्रमिक पर रोज़गार उपलब्ध है।
    • ग्रामीण आजीविका कार्यक्रमों से 90,000 गांवों में 3 करोड़ से अधिक ग़रीब परिवारों को 12 लाख स्वयंसेवी समूहों में संगठित किया जा चुका है। स्वयंसेवी समूहों में भाग लेने वालों में 90% महिलाएं हैं। अकेले आंध्र प्रदेश में स्वयंसेवी समूहों में शामिल एक करोड़ महिलाओं ने अपनी आमदनी में 115% की वृद्धि होते देखी है। इन समूहों के सदस्यों ने 2011 में $1.1 अरब से अधिक की बचत की और ऋण तक उनकी पहुंच में 200% की वृद्धि हुई और यह $5.8 अरब (2000-09) पर पहुंच गया। सहायता के परिणामस्वरूप स्वयं-सेवी समूहों द्वारा निर्मित उत्पादों की क़ीमत में 30-40% की वृद्धि हुई है और इस प्रकार भारत में कारोबार-संबंधी शर्तों का पलड़ा ग़रीब लोगों के पक्ष में झुक गया है।
    • पिछले दो दशकों में विश्व बैंक परियोजनाओं ने ग्रामीण जल आपूर्ति और स्वच्छता के लिए $1.4 अरब का अंशदान किया है। 150 से लेकर 15,000 तक की जनसंख्या वाले 15,000 से अधिक गांवों के लगभग 2.4 करोड़ निवासी उक्त परियोजनाओं से लाभान्वित हुए हैं। इसके अलावा, लगभग 1.7 करोड़ ग्रामीण सुधरी हुई सफ़ाई व्यवस्था से लाभान्वित हुए हैं।
    • विश्व में तपेदिक (टी.बी.) का सबसे ज़्यादा बोझ भारत पर है। अनुमान है कि भारत में प्रति वर्ष टी.बी. के 22 लाख नए मामले सामने आते हैं, जो विश्व के सकल भार का एक-चौथाई है। राष्ट्रीय तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम के तहत 1998 से 2012 के बीच आईडीए द्वारा दिए गए कुल मिलाकर $27.9 करोड़ के दो ऋणों से कारगर रोग-निदान और उपचार का विस्तार करने के लिए उल्लेखनीय सहायता मिली। इस अवधि के दौरान तपेदिक से प्रभावित लगभग 1.5 करोड़ से अधिक लोगों की जांच की गई, उनका इलाज किया गया और इस तरह लगभग 26 लाख जीवनों को बचा लिया गया। विश्व बैंक द्वारा समर्थित राष्ट्रीय एड्स कार्यक्रम आज तक लगभग 81% महिला यौनकर्मियों (सेक्स वर्कर्स), पुरुषों के साथ यौन-संबंध बनाने वाले 66% पुरुषों तथा इंजेक्शनों के ज़रिये नशीली दवाओं का सेवन करने वाले 71% व्यक्तियों तक पहुंच चुका है। लेकिन इन सफलताओं को आगे जारी रखने के लिए लगातार ध्यान देने की ज़रूरत है।
    • स्वास्थ्य-संबंधी परियोजनाओं के लिए विश्व बैक की सहायता से गर्भवती महिलाओं को बच्चे को जन्म देने (प्रसव) के लिए समय से चिकित्सालय पहुंचना संभव हुआ है; तमिल नाडु में आज 99.5% प्रसव चिकित्सा संस्थानों में ही कराए जाते हैं। लेकिन, माताओं और शिशुओं की मृत्यु दरों में तेज़ी से गिरावट आने के बावजूद, ये दरें अधिक ग़रीब देशों की दरों के बराबर बनी हुई हैं। हालांकि भारत ने पिछले दशक में प्रभावशाली आर्थिक संवृद्धि दर्ज की है, कुपोषण की दरों में बहुत थोड़ी कमी आई है; वास्तव में भारत में रुद्ध-विकास (स्टंटिंग) की दर अन्य ब्रिक्स देशों की तुलना में दो से सात गुना अधिक है।
    • सितम्बर 2004 से ‍विश्व बैंक की लगभग 2 अरब डॉलर की मदद से भारत के राष्ट्रीय ग्रामीण सड़क कार्यक्रम को विशेष रूप से आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर इलाकों और पहाड़ी राज्यों में संयोजकता (कनेक्टिविटी) में सुधार करने के लिए सहायता मिल रही है। सभी मौसमों में खुली रहने वाली लगभग 24,200 किमी. सड़कों से हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मेघालय, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश राज्यों की ग्रामीण जनता को लाभ पहुंचा है। लेकिन, काफी कुछ काम शेष रहता है; एक-तिहाई ग्रामीण आबादी बारह महीने खुली रहने वाली सड़कों से अभी तक वंचित है।
    • पिछले दशक या कमोबेश इतनी अवधि के दौरान कर्णाटक, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में किसानों को वर्षापोषित ज़मीनों से होने वाली आमदनी बढ़ाने के लिए विश्व बैंक द्वारा दी जाने वाली सहायता से मिट्टी और जल संरक्षण-संबंधी उपायों पर अमल करने तथा कृषि-उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिली है। इन कार्यों के अनुभवों से भारत सरकार के समान जल-संभर दिशानिर्देशों को मूर्तरूप देने और राष्ट्रीय जल-संभर कार्यक्रमों का डिज़ाइन बनाने में मदद मिली है।
    • 1993 में उत्तर प्रदेश में दो सॉडिक भूमि सुधार परियोजनाओं (सॉडिक लैंड रिक्लेमेशन प्रोजेक्ट्स) की मदद से 2,60,000 हेक्टेयर से अधिक बंजर या अनुत्पादक ज़मीन को खेती के योग्य बनाया गया । फ़सलों की पैदावार में तीन से छह गुना की वृद्धि हो जाने से 4,25,000 से अधिक ग़रीब परिवारों को लाभ पहुंचा है। लगभग 15,000 स्वयं-सेवी समूहों ने महिलाओं की बचत की पूलिंग करने और औपचारिक बैंकिंग नेटवर्क से जुड़ने में मदद की। आज ये स्वयं-सेवी समूह कई गांवों में सरकारी कार्यक्रम के अंतर्गत स्थानीय सरकारी स्कूल में दोपहर के भोजन की व्यवस्था करते हैं। इन दिनों विश्व बैंक से प्राप्त $19.7 करोड़ के एक क्रेडिट से उस परियोजना के तीसरे चरण की सहायता की जा रही है, जिसका उद्देश्य अन्य 1,30,000 हेक्टेयर ज़मीन का, जो मुख्य रूप से बंजर है, तथा राज्य के लगभग 25 ज़िलों में कम पैदावार देने वाली सॉडिक ज़मीनों का सुधार करना है।
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