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आर्थिक एवं मानव विकास के लिए सामाजिक संबंधों की आवश्यकता होती है लेकिन भारत में कई औरतें सामाजिक अलगाव से भरा जीवन जीती हैं।
विश्व बैंक
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कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • भारत भर में कई औरतें सामाजिक अलगाव से भरा जीवन जीती हैं।
  • सामाजिक संबंधों के अभाव में औरतों को कई स्तर पर नुकसान उठाना पड़ता है, ख़ासकर परिवार नियोजन के संदर्भ में, जहां परिवार के सदस्य महिलाओं की गतिविधियों पर नियंत्रण रखते हैं और उनकी चुनने के अधिकार को सीमित कर सकते हैं।
  • भारत के उत्तर प्रदेश में किए गए एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि नए दृष्टिकोणों को अपनाने से महिलाओं की उन सामाजिक-आर्थिक बाधाओं को दूर किया जा सकता है जो उन्हें ज़रूरी परिवार नियोजन सुविधाओं का लाभ उठाने से रोकते हैं।
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संयुक्त राज्य अमेरिका में, औसत रूप से एक महिला के आठ क़रीबी मित्र होते हैं। उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड जैसे भारतीय राज्यों में, ग्रामीण औरतें सामाजिक रूप से कहीं अकेली होती हैं, जहां औसत रूप से उनके केवल एक से तीन ऐसे संबंध होते हैं। देश भर से जुटाए गए सर्वेक्षण के आंकड़े हमें बताते हैं कि 60 प्रतिशत महिलाओं को बाजार, स्वास्थ्य सुविधाओं और गांव के बाहर अकेले यात्रा करने की अनुमति नहीं है। लगभग एक चौथाई महिलाएं ऐसी हैं, जिन्हें अपनी महिला मित्रों से भी मिलने की अनुमति नहीं मिलती, वहीं 25 फीसदी पुरुष हमेशा यह जानने पर जोर देते हैं कि उनकी पत्नियां कहां हैं।

विकासशील देशों में जहां बाज़ार एवं संस्थान अपेक्षाकृत कमज़ोर हैं, वहां सामाजिक संबंधों की भूमिका और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। विश्व बैंक की अर्थशास्त्री एस. अनुकृति कहती हैं, "सामाजिक संबंध मानव विकास एवं आर्थिक गतिविधियों का एक बेहद महत्त्वपूर्ण मगर उपेक्षित हिस्सा है। सामाजिक संपर्कों के बूते अनौपचारिक ऋण, सुरक्षा बीमा हासिल करने के साथ-साथ हम रोज़गार, अधिकार, स्वास्थ्य सेवाओं और प्रौद्योगिकी, ख़ासकर प्रजनन और परिवार नियोजन से संबंधित चीजों के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।“

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सामाजिक संबंध मानव विकास एवं आर्थिक गतिविधियों का एक बेहद महत्त्वपूर्ण मगर उपेक्षित हिस्सा है। सामाजिक संपर्कों के बूते अनौपचारिक ऋण, सुरक्षा बीमा हासिल करने के साथ-साथ हम रोज़गार, अधिकार, स्वास्थ्य सेवाओं और प्रौद्योगिकी, ख़ासकर प्रजनन और परिवार नियोजन से संबंधित चीजों के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।
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हाल ही में आयोजित हुए विश्व बैंक के एक कार्यक्रम में, अनुकृति ने भारतीय महिलाओं के सामाजिक जीवन पर एक अध्ययन के नतीजों को संक्षिप्त रूप में पेश किया। हाल के एक अध्ययन में, भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में 671 विवाहित महिलाओं का उनके सामाजिक संबंधों और उसका उनके जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में जानने के लिए साक्षात्कार लिया गया। अध्ययन के पहले चरण में प्रत्येक महिला से अपने पति और अपनी सास के अलावा ऐसे पांच लोगों का नाम बताने को कहा गया, जिनके साथ वे अपने व्यक्तिगत मामलों और परिवार नियोजन के मुद्दों पर बात कर सकती हैं। औसतन, महिलाओं ने केवल एक ऐसे साथी का नाम लिया।

इस सामाजिक अलगाव का महिलाओं के जीवन पर गहरा प्रभाव प्रभाव पड़ता है, जिससे उनके सामने उपलब्ध अवसरों की संभावनाएं भी क्षीण हो जाती हैं। यह बात परिवार नियोजन के संदर्भ में विशेष रूप से खुलकर सामने आती है, जहां सर्वेक्षण में शामिल 50 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि वह एक और बच्चा नहीं चाहतीं लेकिन उनमें से केवल 19 प्रतिशत ही ऐसी थीं जो आधुनिक गर्भनिरोधक साधनों का प्रयोग कर रही थीं। ऐसे में सामाजिक संपर्कों की भूमिका काफ़ी बड़ी हो जाती है क्योंकि इनके अभाव में नई जानकारियों तक महिलाओं की पहुंच बेहद सीमित हो जाती है और नए मानदंडों को अपनाना कठिन होता है।

सामाजिक संबंधों के अभाव में परिवार के करीबी सदस्यों की इच्छाएं हावी हो सकती हैं, विशेष रूप से, सास की। 82 फीसदी मामलों में, बेटों की माएं चाहती थीं कि बहू अधिक से अधिक लड़के पैदा करे, जबकि ऐसा बहुएं नहीं चाहती थीं। इसके अलावा, परिवार के सदस्य (जैसे लड़की की मां) औरतों को घर के बाहर नहीं निकलने देते, जिससे उनकी बाहरी संबंध प्रभावित होते हैं। सामाजिक संबंधों के अभाव में महिलाएं अपने स्वास्थ्य को लेकर कम जागरूक होती हैं, और इससे उनके परिवार नियोजन और प्रजनन से जुड़े फैसलों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

अनुकृति और उनके साथियों ने उत्तर प्रदेश में एक स्थानीय परिवार नियोजन केंद्र के साथ मिलकर यह परीक्षण किया कि क्या वे अपने प्रयासों से महिलाओं का सामाजिक संपर्क बढ़ाने के साथ-साथ उनकी परिवार नियोजन सुविधाओं तक पहुंच सुनिश्चित कर सकते हैं? इस अध्ययन में महिलाओं को तीन समूहों में बांटा गया:

1) समूह क (केवल एक के इस्तेमाल के लिए मिला स्वास्थ्य कूपन)

2) समूह ख (साझा सुविधाओं वाला स्वास्थ्य कूपन)

3) समूह ग (नियंत्रण समूह)

समूह क की औरतों को उनकी स्वास्थ्य संबंधी वित्तीय बाधाओं को दूर करने के लिए एक कूपन दिया गया, जिसके ज़रिए वे नि: शुल्क में परिवार नियोजन सुविधाओं का लाभ उठाने के साथ-साथ एक बार मुफ़्त परामर्श हासिल कर सकती थीं। और इसके अलावा, स्वास्थ्य केंद्र पर ऐसे तीन विजिट पर यात्रा शुल्क दिया जायेगा। समूह ख की औरतों को दिए गए कूपन में पहले कूपन जैसी सुविधाओं के साथ-साथ उन्हें साझा करने का विकल्प दिया गया, जहां महिलाओं के अधिकतम दो "साथियों" को स्वास्थ्य केंद्र पर किसी महिला के साथ आने पर उन्हें भी उसका लाभ उठाने की सुविधाएं दी गईं। तीसरे समूह की महिलाओं को ऐसा कोई कूपन नहीं दिया गया। इसके अलावा, तीनों समूहों की औरतों को आधुनिक गर्भनिरोधक उपायों और परिवार नियोजन से जुड़े लाभों को बताने वाला एक पत्र दिया गया।

जैसी उम्मीद थी, कूपन की सुविधा पाने वाली पहले दो समूह की महिलाओं के नियंत्रण समूह की महिलाओं की तुलना में परिवार नियोजन केंद्र में जाने और उनके द्वारा आधुनिक गर्भनिरोधक उपायों को अपनाने की संभावनाएं कहीं ज्यादा थी।

लेकिन समूह क और समूह ख के बीच अलग-अलग परिणामों को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि सामाजिक संबंधों को प्रोत्साहित करना संभव है। अध्ययन के अंत तक, जिन महिलाओं को मित्र लाने का कूपन (समूह ख) प्राप्त हुआ, उनके स्वयं के इस्तेमाल हेतु कूपन प्राप्त करने वाली महिलाओं (समूह क) की तुलना में किसी को अपने साथ क्लिनिक में आमंत्रित करने की संभावना लगभग दोगुनी थी। अंत में ये देखा गया कि दूसरे समूहों की तुलना में इन महिलाओं का सामाजिक संपर्क कहीं व्यापक था।

इन प्रभावों को सबसे ज्यादा गरीब परिवारों के साथ-साथ ऐसे परिवार की महिलाओं के बीच महसूस किया गया, जिनके अध्ययन की शुरुआत में परिवार नियोजन सुविधाओं तक पहुंच में सबसे बड़ी बाधा सामाजिक संपर्कों का अभाव थी।

अध्ययन के अंत तक हमने देखा कि गरीब परिवारों की जिन महिलाओं को साझा सुविधाओं वाले कूपन दिए गए थे, उनके समूह केवल अपने प्रयोग के लिए कूपन प्राप्त करने वाली महिलाओं की तुलना में अपने घर के बाहर दोस्त बनाने की संभावना 13% ज्यादा थी। इसी तरह, जिन महिलाओं का मानना ​​था कि उनके मौजूदा करीबी संबंधों में कोई भी परिवार नियोजन सुविधाओं का लाभार्थी नहीं था, उन्हें साझा सुविधाओं वाले कूपन दिए जाने पर उनके घर के बाहर सामाजिक संबंधों में 94 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई।

जबकि इस अध्ययन में भारत के सिर्फ जिले को शामिल किया गया था, लेकिन इसके संभावित प्रभाव बेहद व्यापक हैं। निम्न-आय वाले देशों में अब तक किए गए कई सर्वेक्षणों में आमतौर पर एक महिला की निर्णय लेने की क्षमता का आकलन तुलनात्मक रूप से उसके अपने पति के संबंधों के सापेक्ष किया गया है लेकिन अनुकृति के शोध से पता चलता है कि महिलाओं की निर्णयन क्षमता को घर के अन्य सदस्य भी प्रभावित करते हैं। इससे हमें पता चलता है कि किस तरह परिवार नियोजन कार्यक्रमों में एक महिला की सास को भी सीधे तौर पर जोड़ना होगा, और उसके साथ ही महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में भी नए तौर तरीकों को अपनाना होगा।

फिर भी यहां कई प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं: महिलाओं के सामाजिक संबंध किस प्रकार से उनके जीवन को प्रभावित करते हैं? किस प्रकार महिलाओं और पुरुषों के सामाजिक संबंध एक दूसरे से भिन्न होते हैं? और वे कौन से कारक हैं, जो महिलाओं की सामाजिकता को सकारात्मक या नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं? महिलाओं की सामाजिकता पर व्यवस्थित, तुलनात्मक और व्यापक (कई देशों से लिए गए आंकड़े) आंकड़ों के अभाव में हम इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं दे सकते। और इन सवालों का जवाब ढूंढ़ने के लिए ही अनुकृति और उसके साथी अपने नए शोध पर काम कर रहे हैं।

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