मुख्य कहानी

भारतः उत्तराखंड में आपदा से उबरने के प्रयासों पर भारत में विश्व बैंक के देश निदेशक के साथ वार्ता

11 नवम्बर, 2013



इस वर्ष जून के महीने में, विशाल प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर और भारत में सबसे अधिक बार आने वाले पर्यटकों और धार्मिक गंतव्य में से एक, उत्तराखंड को अभूतपूर्व वर्षा का सामना करना पड़ा जिससे केदारनाथ, रामबाड़ा, गौरीकुंड और अन्य कस्बों में भारी तबाही हुई।

विश्व बैंक की टीम ने आपदा के बाद उससे उबरने की योजनाओं में राज्य की मदद करने के लिए तेजी से तैयारी की और उसके साथ-साथ आपदा जोखिम प्रबंधन में उसकी क्षमता मजबूत करने के लिए भी काम किया।

भारत में विश्व बैंक के देश निदेशक, ओन्नो रूह्ल का साक्षात्कार पढि़ए, जहां वे ज्यादा समझदारी के साथ ऐसे उपाय करने पर महत्त्व देते हैं जिससे राज्य की नाजुक पर्वतीय पर्यावरण को नुकसान न हो।  

प्रश्न. उत्तराखंड आपदा से उबरने की परियोजना के तहत कौन से प्रमुख घटकों में समर्थन दिया जा रहा है ?

हाल ही में उत्तराखंड में जिस तरह की आपदा आई वह विकास को दशकों पीछे धकेल सकती है। हमारी नई परियोजना - उत्तराखंड आपदा रिकवरी परियोजना - में तुरंत राहत और पुनर्निर्माण प्रयासों के साथ-साथ आपदा तैयारियों के लिए राज्य सरकार की मदद करने पर ध्यान दिया जाएगा।

इस परियोजना में मकानों, सार्वजनिक इमारतों और छोटी सड़कों तथा पुलों के साथ-साथ खच्चरों के मार्ग का पुनर्निर्माण किया जाएगा। उत्तराखंड सरकार ने अनुरोध किया है कि हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम जो कुछ भी पुनर्निर्माण करें वह जहां तक संभव हो सबसे सुरक्षित स्थान पर हो तथा उसे इस तरह से बनाया जाए कि वह हर संभव नाजुक पर्यावरण को समर्थन दे । इस परियोजना का उद्देश्य “वापस बेहतर निर्माण (बिल्ड बैक बैटर)” है।

इसलिए, लक्षित और कारगर ढंग से आपदा से उबरने तथा भविष्य में आपदाओं पर अधिक लचीलापन सुनिश्चित करने के लिए इस परियोजना में भारत और विश्व दोनों क्षेत्रों से पिछली आपदाओं द्वारा सीखे गए सबक समाहित किए जा रहे हैं। इनमें ऐसी सूचना और संचार व्यवस्था कायम करना शामिल है जो प्रभाव की आशंका वाले लोगों को जल्दी चेतावनी दे सके। 

प्रश्न.  क्या विश्व बैंक आपदा पुनर्निर्माण के लिए परियोजनाओं में शीघ्रता लाता है ?

भारत सरकार ने जुलाई के अंत में एडीबी और विश्व बैंक से समर्थन के लिए अनुरोध किया है। इस क्षेत्र में शीतकाल के दौरान कड़ाके की ठंड पड़ती है इसलिए सर्दी आने से पहले लोगों को छत उपलब्ध कराने में मदद करना हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। तदनुसार, अनुरोध प्राप्त होने के दिन ही देहरादून एक दल भेजा गया और 12 महीने की तैयारी अवधि की तुलना में दो महीने से कुछ अधिक समय में ही परियोजना तैयार की गई। हमारा स्टाफ कम से कम समय में हर संभव व्यावहारिक परिणाम देने के लिए देहरादून में काम करना जारी रखेगा।

 प्रश्न. इस परियोजना से भविष्य में तैयारियों में कैसे मदद मिलेगी ?

1999 में जब ओडिशा में सुपर साइक्लोन आया तब से ही हमारी राष्ट्रीय चक्रवात उन्मूलन परियोजना में आपदा तैयारियां बढ़ाने और छत यानी शेल्टर्स के निर्माण पर ध्यान दिया गया है।

जब ओडिशा में फाइलिन तूफान आया तो उससे दो सप्ताह पहले इस प्रणाली का व्यापक परीक्षण किया गया। 10 लाख लोगों को समय पर निकाल लिया गया जिससे जनहानि न्यूनतम हुई। हमें खुशी है कि ओडिशा, आंध्र प्रदेश और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के नेतृत्व में हमारे सामूहिक प्रयासों से यह उपलब्धि हासिल की जा सकी। हालांकि समझदारी से पुनर्निर्माण में अब भी काम करना बाकी है ताकि भौतिक नुकसान भी कम किया जा सके।

फिर भी, यह ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि पहुंचते तूफान को समुद्र के ऊपर कई दिन पहले भी देखा जा सकता है जबकि बादल फटने के मामले में ऐसा नहीं है। इसने उत्तराखंड में तैयारियों को बहुत मुश्किल बना दिया है जिसके लिए अधिक विस्तृत और बेहतरीन मौसम जानकारी की जरूरत है।

इस जानकारी का प्रचार-प्रसार करना एसएमएस मैसेज सहित संचार के विविध मामध्यमों के जरिए करना और भी अधिक महत्वपूर्ण है। खासतौर से ऐसे पर्वतीय क्षेत्रों में यह महत्वपूर्ण है जहां प्रचार-प्रसार को तूफान से भी अधिक तेजी से करने की जरूरत होती है। उत्राखंड में यह हमारे लिए ध्यान देने का स्पष्ट केंद्र है।


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