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मुख्य कहानी

कन्ट्री प्रोग्राम स्ट्रेटेजी (सीपीएस) सलाह, नागरिक सामाजिक संगठनों के साथ: लखनऊ, उत्तरप्रदेश

14 सितम्बर, 2012



प्रतिक्रिया और सलाह को निम्न ईमेल पते पर भेजा जा सकता है: consultationsindia@worldbank-org
स्थानः लखनऊ, उत्तरप्रदेश
दिनांकः 13 जून 2012
मेजबानः गिरि विकास अध्ययन संस्थान (जीआईडीएस), लखनऊ
मध्यस्थः प्राध्यापक ऐ.के. सिंह, निदेशक, जीआईडीएस, लखनऊ
प्रतिभागीः सूची

चर्चा के प्रमुख बिन्दुः

कृषि में सहयोग बढ़ाना एक व्यापक विषय था। इसमें किसानों के लिए बेहतर आमदनियाँ सुनिश्चित करना, अनुसंधान व विस्तार सेवाओं एवं अधोसंरचना से सम्बन्धित विकास शामिल है।

राज्य का MSME क्षेत्र पहले से मजबूत रहा था किन्तु उसकी सम्भावनाओं को उभारने के लिए कुशल कार्यबल और नीतिगत सहयोग आवश्यक था।

स्वास्थ्य, शिक्षा इत्यादि जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सर्विस डिलीवरी के सहयोग की मजबूत दलील दी गयी थी। विभिन्न स्तरों पर क्षमताओं के सृजन की और तकनीकी सहायता व प्रबंधनात्मक इन्पुट्स की आवश्यकता थी।

उद्योग की माँगें पूरी करने के लिए व्यावसायिक शिक्षा एवं कौशल-प्रशिक्षण की भी आवश्यकता थी।

सरकारी मुद्दों, खासतौर पर भ्रष्टाचार से निपटने की आवश्यकता बार-बार आती थी। शासन यदि बेहतर होगा तो ही निजी निवेश प्रेरित होगा, इस बात को नोट किया गया था।

पिछड़े राज्यों के सहयोग के लिए वर्ल्ड बैंक जब अंतिम तैयारी कर रहा था तब राज्य (एवं प्रतिव्यक्ति लाभ) के बड़े आकार को ध्यान में रखे जाने की आवश्यकता थी।

चर्चा का विस्तार
कृषि

एक प्रतिभागी ने बताया कि उत्तरप्रदेश में कृषि प्राथमिक व्यवसाय था और ज+मीनी स्तर के अधिक लोगों को अनुसंधान एवं विस्तार प्रणालियों में भी लाने की आवश्यकता थी। यह दर्शाया गया कि बीजों को कम ही बदला जाता था और कुशल व अकुशल श्रम की कमी थी। पानी के मुद्दों के सिवाय भी कई मुद्दों ने उत्पादकता को कुप्रभावित किया था। अनेक किसान चावल की खेती कर रहे थे। ऐसा अनुभव किया गया कि ज+मीनी स्तर पर बिना तकनीकी सहायता, भण्डारण क्षमता व प्राथमिक स्तरीय प्रसंस्करण क्षमता के कृषि-क्षेत्र में सुधार नहीं होने वाला।

अन्य प्रतिभागी ने पशुपालन में सहयोग के बारे में बताया और स्वस्थ पशुधन के जीन पूल को संरक्षित किये जाने की आवश्यकता बतायी। यह जीन पूल धीरे-धीरे समाप्त हो रहा था और स्वस्थ दुधारु पशुओं एवं दूसरे पशुधन की कमी हो रही है। यह भी सुझाया गया कि पारम्परिक समय-परीक्षित खेती-किसानी पद्धतियों (जैसे किसानों द्वारा स्थानीय बीजों का पुनःउपयोग और संरक्षण) को अपनाया जाना चाहिए था, न कि इन पद्धतियों के लिए हानिप्रद नयी प्रणालियों को। एक आम सहमति यह थी कि कृषि से सम्बन्धित अधोसंरचना व प्रौद्योगिकी (स्थानीय रूप से उपलब्घ बीज, मशीनरी इत्यादि) उत्तरप्रदेश में कृषि-क्षेत्र में सुधार के लिए महत्त्वपूर्ण थी। यह भी सुझाया गया कि किसी प्रौद्योगिकी को व्यापक स्तर पर लोगों द्वारा अपनाने के लिए स्थानीय स्तर पर उद्यमिता विकास बहुत महत्त्वपूर्ण था। इनके अतिरिक्त यह भी पता चला कि मानसून की बरसात बहुत अनियमित हो चुकी थी और अब तो सूखे भी बार-बार पड़ने लगे थे। इसीलिए कृषि में जलवायु-अनुकूल प्रौद्योगिकी आवश्यक थी।

एक प्रतिभागी ने सुझाव दिया कि कृषि एवं उद्योग एक-दूसरे के पूरक बनें तथा इन दोनों क्षेत्रों से सेवा क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा।

स्वास्थ्य

प्रतिभागियों ने बताया कि उत्तरप्रदेश की सामाजिक अधोसंरचना खराब थी। स्वास्थ्य सूचक (जैसे जन्म-दर, MMR, IMR इत्यादि) राष्ट्रीय औसत से अधिक थे। सामान्य स्वास्थ्यसेवाओं तक बहुत कम प्रतिशत्‌ जनसंख्या की पहुँच थी। 80 प्रतिशत्‌ स्वास्थ्य खर्चा निजी क्षेत्र में था; खाराब प्रबंधन और भ्रष्टाचार के कारण सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश पंगु हो चुका था। खासतौर पर ग्रामीण उत्तरप्रदेश स्वास्थ्य व स्वच्छता की बड़ी समस्याओं से जूझ रहा था। इससे राज्य के मानव-संसाधन की गुणवत्ता घटी। उत्तरप्रदेश में आँचलिक एवं क्षेत्रीय असंतुलनों को तब तक नहीं सुधारा जा सकता जब तक कि सामाजिक क्षेत्रों में निवेशों को काफी बढ़ाया नहीं जाता। ICDS IV वास्तव में अपनाया नहीं गया तथा स्त्रियों एवं बच्चों में खासकर कुपोषण जारी रहा। स्वास्थ्य सेवाओं में मानव-संसाधनों की अपर्याप्तता स्वास्थ्य-सुविधाओं में पिछड़ेपन का मुख्य कारण बनी।
एक प्रतिभागी ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को पर्याप्त गम्भीरता से नहीं लिया गया और इस समस्या को पहचाना जाना था

शिक्षा एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण

एक प्रतिभागी ने पाया कि शिक्षा में जब निवेश बढ़ाया जा रहा था तब साथ ही में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं दिखा। ऐसा कहा गया कि सर्वशिक्षा अभियान ने अधिक से अधिक संख्या में शिक्षार्थियों की भर्ती(नामांकन) पर जोर दिया, न कि प्रदान की जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता पर। स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या भी एक गम्भीर समस्या थी।

एक वक्ता ने कहा कि उच्चशिक्षा में सहयोग में बैंक इच्छुक हो या न हो, वह छोटे पैमाने पर प्रदर्शन परियोजना में इच्छुक हो सकता है। उदाहरण के लिए बैंक एक या दो विश्वविद्यालयों को अपना सकता है और उन्हें विश्वस्तरीय संस्थानों में बदल सकता है।

एक प्रतिभागी ने बताया कि शिक्षा में सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उसने उद्यमिता को बढ़ावा नहीं दिया। राज्य में युवाओं के लिए व्यावसायिक शिक्षा एवं कौशल-प्रशिक्षण की अत्यधिक आवश्यकता है। यह बताया गया था कि 1.5 लाख इंजीनियरिंग सीटें थीं किन्तु आईटीआई सीटें 25000 और पॉलिटेक्निक सीटें 35000 ही थीं; इससे बाज+ार की असल आवश्यकताएँ अधूरी रह गयीं, रोज+गार सम्भावनाओं व औद्योगिक आवश्यकताओं की अनदेखी की गयी। उत्तरप्रदेश में कौशल-प्रशिक्षण खासतौर पर आवश्यक था क्योंकि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम क्षेत्र में उन्नति और रोज+गार सृजन की बहुत सम्भावना थी। यह सुझाया गया कि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम क्षेत्र के महत्त्व को समझते हुए यह उद्यम क्षेत्र समर्पित वित्तीय प्रणालियों एवंसंस्थानों के रूप में प्रस्तुत हो सकता था, वित्तीय सहयोग सहित विशेषज्ञता प्रदान कर सकते हों। ऐसा देखा गया कि वर्ल्ड बैंक तो इस क्षेत्र में खासतौर पर प्रेरक व सलाहकार का काम कर सकता है तथा राज्य में साधारण औद्योगिक विकास के लिए भी।

शासन और भ्रष्टाचार के मुद्दे

कई वक्ताओं ने राज्य में भ्रष्टाचार के स्तर पर चिंताएँ जतायीं और राज्य के ÷भ्रष्टाचार राज्य' के रूप में कुख्यात्‌ होने की बात बोली। एक प्रतिभागी ने कहा- ''विकास तो भ्रष्टाचार का समानार्थी हो चुका था'' तथा इस प्रकार इसकी निश्चितता नहीं थी कि निवेश को दक्ष उपयोग में लाया जायेगा भी या नहीं। परियोजनाओं में निधियों (फ़ण्ड्स) के प्रवाह की निगरानी के लिए नये तंत्र में सरकार, स्वयंसेवी संस्थाओं एवं सामाजिक कार्यकर्त्ताओं को भागीदार किया जा सकता है। यह अनुभव किया गया था कि निगरानी एवं संगठित कार्यवाही करने में सक्षम शिक्षित जनता के बिना शासन एवं पारदर्शिता मेंसुधार नहीं आयेगा। उदाहरण में तंत्र की खामियाँ उजागर करने वाले (व्हिसिलब्लोअर) की हत्या का मामला बताया गया जिसने एक सड़क परियोजना में किये जा रहे भ्रष्टाचार को उजागर किया था। मामले की जाँच अब तक अधूरी है।

यह सुझाया गया है कि ज+मीनी स्तर पर क्षमता बढ़ाने, खासतौर पर पीआरआई संस्थानों को मजबूत बनाना सुशासन(बढ़िया शासन) को लाने के लिए आवश्यक था। एक और सुझाव सरकारी मुद्दों को निपटाने और पारदर्शिता बढ़ाने में सूचना प्रौद्योगिकी एवं मजबूत शिकायत-निवारण तंत्र की आवश्यकता के सम्बन्ध में दिया गया। राज्य में सूचनाधिकार अधिनियम (आरटीआई) जैसे कानूनों का भी बेहतर क्रियान्वयन किया जाना चाहिए था। आमराय यह थी कि भ्रष्टाचार से लड़ने, कार्य-पद्धति सुधारने और राज्य में कानून-पालन की स्थिति ठीक करने के लिए वह अति आवश्यक था।

वर्ल्ड बैंक सहयोग की आवश्यकता वाले क्षेत्र

अधिकांश प्रतिभागियों ने उन क्षेत्रों व प्राथमिकताओं की पहचान बिल्कुल साफ तौर पर करायी जहाँ वर्ल्ड बैंक से सहयोग की आवश्यकता है। कृषि एवं लघु उद्योग पर विशेष जोर देने के अतिरिक्त प्रतिभागियों ने योजना-निर्माण, बाजार, सुधार लाने में नौकरशाही की क्षमता बढ़ाने और तकनीकी एवं प्रबंधनात्मक सहायता सहित सर्विस डिलीवरी ठीक करने को विशेष तौर पर ध्यान में रखे जाने को कहा। यह बात सामने लायी गयी कि भण्डारण-अधोसंरचना के अभाव के कारण शरतीय कृषि को लगभग ट्रिलियन रुपयों का वार्षिक घाटा होता है; इसमें से 30 प्रतिशत्‌ घाटा उत्तरप्रदेश के हिस्से आता। श्ण्डारण प्रणालियाँ इतनी महत्त्वपूर्ण थीं कि कम से कम विकासखण्ड स्तर पर बीज, खाद्यान्न एवं खेत-खलिहान की अन्य उपज का संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए था तथा बेहतर कीमत के लिए किसानों को अपना-अपना स्टॉक रखने में सक्षम किया जाना चाहिए था। यह बताया गया कि यदि नीतिगत सहयोग की उपलब्ण्धता सुनिश्चित की जाती तो इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र में निजी क्षेत्र निवेश का इच्छुक होता। अनेक वक्ताओं ने कृषि अनुसंधान, विस्तार सेवाओं व प्रौद्योगिकी प्रसार में सहयोग एवं किसानों

को सही समय पर सही रूप में उनकी उपलब्धता सुनिश्चित किये जाने की आवश्यकता बतायी।


अन्य प्रतिभागी ने मानव-संसाधन विभाग पर जोर दिया एवं बताया कि न तो रणनीति ठीक थी, न ही उसका क्रियान्वयन करने वाले मानव-संसाधनों की गुणवत्ता। बैंक के ध्यानकर्षण एवं सम्भावित सहयोग के लिए वक्ता ने दो क्षेत्र महत्त्वपूर्ण बतायेः (1) सम्पूर्ण श्रृंखला के लिए तकनीकी आदानों से सर्विस डिलीवरी सुधार; (2) समस्त घटक जिनमें ग्राम स्तर पर किए गए सा्रेत मेपिंग भी शामिल हैं के साथ पूर्ण एक प्रभावी एक क्रियांवित जिला कार्य योजना का गठित करने के लिए तकनीकी सहयोग। वक्ता ने जोर दिया कि हर स्तर पर सर्विस डिलीवरी के लिए क्षमताओं को बढ़ाना महत्त्वपूर्ण था क्योंकि ऐसा न किये जाने से सभी क्षेत्रों में और सरकारी मुद्दों में समस्याएँ आती हैं।


एक प्रतिभागी ने सुझाया कि वर्ल्ड बैंक को tier II व III शहरों में ढंग से नियोजित प्रगति को सुनिश्चित करते हुए शहरीकरण मुद्दों को देखना चाहिए तथा शहरों में सम्पदा-सृजन की सम्भावना व तीव्र शहरीकरण प्रचलनों को ध्यान में रखना चाहिए था।


बिजली क्षेत्र की भी कुछ चर्चा की गयी। ऐसा देखा गया कि लगभग हर महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के विकास में बिजली की कमी एक मुख्य बाधा थी। यह दर्शाया गया कि राज्य में प्रति व्यक्ति बिजली उपयोग बहुत कम था, केवल 350 kWh वार्षिकः जो कि राष्ट्रीय औसत से कम था और यूरोपियन व स्केंडिनेवियन औसत का चालीसवाँ भाग। चूँकि बिजली बनाने का कार्य धीमी गति से किया जा रहा था, इसलिए परिसर/प्रतिष्ठान/कार्यालय उधारी में चलाये जा रहे थे। कुछ प्रतिभागियों ने अनुभव किया कि बैंक को राज्य में नवीकरणीय (अक्षय) ऊर्जा में सहयोग करना चाहिए, खासतौर पर सौर ऊर्जा में क्योंकि वहाँ धूप की प्रचुरता थी। सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए बुंदेलखण्ड क्षेत्र को

सम्भावित स्थल सुझाया गया था।

एक प्रतिभागी स्थानीय शासन में बड़ी भूमिका निभाने के लिए सामुदायिक संगठनों(CBOs) एवं स्व-सहायता समूहों (SHGs) के संघों को समर्थ बनाने में बैंक द्वारा आर्थिक विकास कराना चाहा। यह ख्+ाासतौर पर NRLM के विषय में था, जिसका आगमन शीघ्र ही उत्तप्रदेश में होने वाला था। आंध्रप्रदेश में  स्व-सहायता समूहों और सामुदायिक संगठनों के संघों की सफलता की कहानी बतायी गयी तथा बताया गया कि वहाँ ऐसे संघों के पंजीकरण के लिए विशेष कानून बनाये गये थे।


स्वास्थ्य एवं कुपोषण की भी चर्चा प्राथमिक चर्चाओं के रूप में की गयी थी। ऐसा अनुभव हुआ कि बैंक को इन क्षेत्रों में सहयोग जारी रखना चाहिए क्योंकि भारत के मानव-संसाधनों की गुणवत्ता से उनका सीधा सम्बन्ध था। यह भी सुझाया गया कि उत्तरप्रदेश में निवेश के माहौल को सुधारा जाना था। इसके लिए बैंक ऐसा माहौल बनाने में सहायता कर सकता है जिससे निजी निवेशक एवं उद्यमी आकर्षित हों। राज्य में विभिन्न स्तरों पर परियोजना विकास सुविधाओं का निर्माण किया जाने का एक सुझाव दिया गया।


उत्तरप्रदेश (खासकर तराई के पिछड़ेपन, बुंदेलखण्ड और पूर्वी उत्तरप्रदेश) में क्षेत्रीय असंतुलनों का होना बताया गया। ऐसा सुझाव आया कि शहरी क्षेत्रों में पलायन रोकने व जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए जितने जल्दी हो सके, ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाओं को कई गुनी

 करने का सरकारी लक्ष्य होना चाहिए।

एक प्रतिभागी ने सेकंड जनरेशन सुधारों के लिए बैंक के सहयोग एवं संरचनात्मक मुद्दों में देरी होने के बारे में बताया जिसके होने का अनुमान न था। ऐसा देखा गया था कि ये सुधार राज्य स्तर पर किये जा रहे थे किन्तु क्रियान्वयन कठिन रहेगा तथा भ्रष्टाचार की बहुत आशंका रहेगी। यह भी पाया गया कि इस राज्य में पीपीपी मॉडलों को चलाने की क्षमता नहीं है। प्रतिभागी ने बता दिया कि सुधारों को आगे ले जाये बिना छोटे उद्योग, कृषि, स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसे विभिन्न महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रगति सम्भव न थी।


अनेक प्रतिभागियों ने आगे बैंक को कुछ महत्त्वपूर्ण छूटे क्षेत्रों में अनुसंधान के लिए सहयोग करने प्रेरित किया जिनमें अंतर्क्षेत्रीय(इंटरसेक्टोरल) जोड़, असंगठित क्षेत्र में स्त्रियाँ, मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियाँ होना एवं शहरीकरण और सामाजिक पक्षपातों के कारण पारम्परिक व्यवसायों/व्यापारों का विलोपन शामिल है। एक सुझाव यह दिया गया कि निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों बीपीएल परिवारों की स्त्रियों को विशेष लक्ष्य बनाया जाना चाहिए था ताकि वे वास्तव में आगे बढ़ सके व सशक्त हो पायें। अध्ययनों ने भी अगले पाँच वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों में मानव-संसाधनों की आवश्यकता का आकलन आवश्यक बताया।


कुछ प्रतिभागियों ने वर्ल्ड बैंक का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि बिगड़ रहे पर्यावरण को ध्यान में रखें, जैसे कि पानी, वायु एवं मृदा प्रदूषण। उन्होंने सुझाया कि बैंक को जलवायु-परिवर्तन से जूझने में मध्यम और लम्बे समय के लिए राज्य की सहायता करनी चाहिए।

अनेक प्रतिभागियों ने इस तथ्य पर प्रकाश डाला कि उत्तरप्रदेश एक बहुत बड़ा राज्य होने से उसकी तुलना छत्तीसगढ़ व झारखण्ड जैसे दूसरे पिछड़े छोटे राज्यों से नहीं की जा सकती थी। छोटे राज्यों की तुलना में उत्तरप्रदेश में निवेश व परियोजना का प्रति व्यक्ति प्रभाव कम रहा। यह सुझाया गया था कि बैंक को यह तथ्य पिछड़े राज्यों के सहयोग के सम्बन्ध में अपनी व्यापार योजना में ध्यान में रखना चाहिए।


विश्व बैंक की प्रतिक्रिया

वर्ल्ड बैंक की टीम ने प्रतिभागियों को धन्यवाद कहा और स्पष्ट किया कि सिविल सोसायटी, राज्य शासन और अन्यों से उसका संवाद जारी रहेगा ताकि राज्य में बेहतर कार्य किये जाने पर बल दिया जाये और संसाधनों की कमी को ध्यान में रखा जाये। यह दर्शाया गया था कि उत्तरप्रदेश वर्ल्ड बैंक के लिए एक महत्त्वपूर्ण राज्य था तथा चर्चा में ऐसे अनेक मुद्दों की पहचान की गयी जो सरकारी प्राथमिकताओं में भी हैं। बैंक टीम ने भी इस बात पर जोर दिया कि सहयोग के अगले चरण में ज+मीनी स्तर पर क्रियान्वयन की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने की दिशा में देखा जायेगा।


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