मुख्य कहानी

कन्ट्री प्रोग्राम स्ट्रेटेजी (सीपीएस) सलाह, नागरिक सामाजिक संगठनों के साथ: दिल्ली- 26 जून 2012

14 सितम्बर, 2012


प्रतिक्रिया और सलाह को निम्न ईमेल पते पर भेजा जा सकता है: consultationsindia@worldbank-org

स्थानः नयी दिल्ली
दिनांकः 26 जून 2012
प्रतिभागीः सूची
मध्यस्थः श्री शेखर सिंह, संयोजक, राष्ट्रीय लोक सूचनाअधिकार अभियान

चर्चा के प्रमुख बिन्दुः

बैंक द्वारा सूचीबद्ध तीन रणनीतिक स्तम्भ स्वीकार्य पाये गये।

चूँकि यह राज्यस्तरीय परिचर्चा नहीं थी, इसलिए राष्ट्रीय स्तर के क्रियान्वयन मुद्दों एवं नीतियों से सम्बन्धित सुझाव एवं टिप्पणियाँ मिलीं
समाज के हाशिये पर पड़े समुदायों के समावेश के अतिरिक्त कृषि व्यवसाय, बुजुर्ग अवस्था, अक्षमता क्षेत्र एवं बच्चों के मुद्दों की पहचान ऐसे क्षेत्रों के रूप में की गयी जिन्हें रणनीति में ध्यान में विशेष रूप से रखे जाने की आवश्यकता है।
तीव्र शहरीकरण किये जाने की चिंता जतायी गयी क्योंकि इससे शहरी क्षेत्रों में असमानताएँ बढ़ती जा रही हैं।
सरकारी मुद्दे (खासकर भ्रष्टाचार से लड़ने की आवश्यकता और सरकार में समन्वय सुधारना) चिंता के मुख्य क्षेत्र थे।
सिविल सोसायटी के घटते स्थान और देश के लोगों उसका जुड़ाव कम होने की चिंता थी। स्वैच्छिक (वॉलॅण्टरी) क्षेत्र में बढ़ाया जा रहे सरकारी नियमन को भी एक गम्भीर मुद्दा माना गया।

चर्चा का विस्तार

निम्नांकित तीन सवालों के विषय में चर्चा की गयी थी
क्या वर्ल्ड बैंक ने शरत की विकास प्राथमिकताओं को जानने की रणनीति प्रस्तावित की है?
रणनीति में विशेष रूप से दर्शायी गयीं विकास चुनौतियों के सम्बन्ध में आपकी चिंताएँ क्या-क्या हैं?
इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत की सहायता में वर्ल्ड बैंक समूह आपको कौन-सी भूमिका निभाता दिखायी देता है?
क्या 2009-13 के लिए वर्ल्ड बैंक की प्रस्तावित रणनीति में शरत की विकास प्राथमिकताएँ हैं?

अधिकांश प्रतिभागी इस बात पर सहमत थे कि सीपीएस 2013-2016 के लिए बैंक के प्रस्तुतिकरण में भारत की विकास प्राथमिकताएँ वास्तव में शामिल रहीं। उसी समय अनेक प्रतिभागियों ने उन विशिष्ट विकास मुद्दों पर जोर डाला जो प्रस्तुतिकरण में दिखायी नहीं दिये।
तीव्र एवं समावेशी उन्नति

यह आम सहमति थी कि ‘तीव्र एवं समावेशी उन्नति' आने वाले वर्षों में देश के लिए महत्त्वपूर्ण आधारशिला थी। इसका अर्थ हुआ कि कृषि क्षेत्र सुधारों एवं निर्माण क्षेत्र में रोजगार-सृजन' पर ध्यान केन्द्रित करना था। बैंक की रणनीति में सरकार के 12वीं योजना ड्राफ्ट दस्तावेज से समानता है, इसमें भी ऊँची और समावेशी उन्नति पर जोर दिया गया है।

एक प्रतिभागी का दृष्टिकोण था कि वर्ल्ड बैंक को सर्वप्रथम सबसे पिछड़े अँचलों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। देश के पूर्वी अँचल को प्राथमिकता के रूप में सुझाया गया था क्योंकि इसमें सबसे कम उत्पादकता है और यह सबसे दरिद्र (निर्धन) है। कृषि, पानी और स्वच्छता व प्राथमिक स्वास्थ्यसेवा क्षेत्रों को एजेंडा में सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए। उन्नति ‘कृषि चालित/आधारित' हो और कृषि उपज के लिए बाजारों का विकास एवं किसानों के लिए सारी सुविधाओं की एकसाथ व्यवस्था प्राथमिकता हो। देश के जल संसाधनों का सुचारु प्रबंधन दूसरा महत्त्वपूर्ण विषय था।

अनेक प्रतिभागियों ने ‘समावेश' के बारे में अपने-अपने दृष्टिकोण बताये। एक प्रतिभागी ने दर्शाया कि बड़े शहरों में मूलभूत सुविधाओं के बिना जी रहे शहरी निर्धनों को खासतौर पर ध्यान में रखे जाने की आवश्यकता है। उन बच्चों पर अधिक बल दिये जाने की आवश्यकता है जो मुख्यधारा से दूर छितरे हुए हैं और स्वास्थ्य व शिक्षा सुविधाओं की आवश्यकता जिन्हें सबसे अधिक है। दलितों और दूसरे पिछड़े समुदायों को समाविष्ट (शामिल) करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया क्योंकि वर्तमान नौकरी बाजार में वे बहुत नीचे हैं जहाँ उन्हें सामाजिक भेदभाव से जूझना पड़ता है।

अनेक प्रतिभागियों ने आशंका जतायी कि तीव्र शहरीकरण (खासतौर पर गाँवों से शहरों की ओर पलायन) शहरी निर्धनता का दायरा बढ़ रहा था। इससे असमानताएँ बढ़ती गयीं और पलायन करने वालों की रोजगार-योग्यता निखारने के लिए उनके कौशलों के विकास को विशेष ध्यान में नहीं रखा गया। कामग़ार बच्चों और अक्षम व्यक्तियों को ऐसे वर्गों के रूप में पहचाना गया जिन्हें विशेष सहयोग आवश्यक है ताकि समूची उन्नति में उनका समावेश सुनिश्चित किया जा सके। अक्षमता क्षेत्र के प्रतिनिधित्व से बैंक की रणनीति में एक ‘स्वतंत्र स्तम्भ' के रूप में अक्षमता को शामिल करने का मजबूत मामला बना क्योंकि इस क्षेत्र में पर्याप्त योगदान नहीं किया जाता था और इस मुद्दे में लोगों की चिंता भी कम ही थी।

कुछ प्रतिभागियों ने समावेश की प्रवृत्ति पर प्रश्नचिह्‌न उठाया। उन्होंने अनुभव किया नवाचार द्वारा जनसंख्या के सभी वर्गों में सर्विस डिलीवरी प्रमुख चुनौती थी। एक व्यक्ति ने यहाँ तक सुझाया कि ‘समावेश' को वर्ल्ड बैंक की रणनीति में एक अलग विषय के रूप में जोड़ा जाना चाहिए ताकि इस विषय पर लोगों के बीच बैंक की विचारधारा स्पष्ट हो जाये।

कुछ छूटे विषय/क्षेत्र

एक प्रतिभागी ने बताया कि 60 वर्ष से अधिक आयु की बुजुर्ग जनसंख्या को बैंक के प्रस्तुतिकरण में नहीं रखा गया। वरिष्ठ नागरिकों खासतौर पर ध्यान में रखे जाने की आवश्यकता है क्योंकि उन्हें आर्थिक रूप से अनुत्पादक मानकर अनदेखा कर दिया जाता है और अधिकांश विकास कार्यक्रमों से उन्हें दूर रखा जाता है। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में युवा शहरी ओर भाग रहे थे, बिना किसी सहायक प्रणाली के बुजुर्ग पीछे अकेले छूट रहे थे। एक प्रतिष्ठित स्वयंसेवी संस्था ने बुजुर्ग निर्धनों के स्व-सहायता समूहों के साथ कार्य करके बहुत सकारात्मक परिणाम दिखाये तथा उसे प्रयासों को फैलाने की सम्भावना बनती थी। ऐसा देखा गया कि शरत में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या यूएन आकलन के अनुसार सन्‌ 2050 तक 340 मिलियन हो जायेगी। इस मुद्दे का साफ-साफ पता लगाने के एजेंडा के अभाव में भविष्य में गम्भीर समस्या उत्पन्न होने वाली थी।

व्यावसायिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित क्षेत्र भी छूट रहा था। यह देश में चिंता का एक कारण था तथा इस क्षेत्र में सहायक प्रणालियों अथवा जागरुकता बढ़ाने की दिशा में बहुत कम काम किया गया।

कुछ प्रतिभागियों ने तीव्र उन्नति की पर्यावरणीय कीमत पर जोर दिया तथा ‘संसाधनों के खाराब प्रबंधन' पर ध्यान दिलाया। ऐसा कहा गया कि प्रदूषण एवं अपशिष्ट(कचरे) को विकास परियोजनाओं के साथ में नियंत्रित किया जाना चाहिए था। उन्नति के बढ़ावे के कार्यक्रमों से पर्यावरणीय न्याय का प्रश्न उठा और न्याय-आधारित समाज की आवश्यकताएँ सामने आयीं। ऐसा अनुभव हुआ कि बैंक को अधिक विस्तार से यह पता लगाना आवश्यक होगा कि विकास की आवश्यकताओं के साथ पर्यावरणीय बाध्यताओं से संतुलन कैसे बनायें ताकि जलवायु परिवर्तन एजेंडा में परिपक्व प्रतिक्रिया सुनिश्चित हो। एक प्रतिभागी ने तर्क रखा कि पर्यावरण एवं पारिस्थितिक स्वास्थ्य की ओर पवित्र प्रयास परमआवश्यक थे और मात्र सम्पदा-सृजन अथवा आर्थिक उत्थान के बजाय उनको भी विशेष ध्यान में रखा जाना चाहिए था
एक प्रतिभागी ने ऊर्जा एवं शहरी अधोसंरचना के सहयोग वाले बैंक-एजेंडा पर चिंता व्यक्त की। यह सुझाया गया कि बड़े बाँधों इत्यादि के मामलों में जनता के विरोध को ध्यान में रखते हुए इन क्षेत्रों में बैंक अपने प्रयासों का स्पष्टीकरण करे।

सरकार में अंतर्मंत्रालयीन और अंतर्विभागीय समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया। ऐसा अनुभव किया गया कि इस क्षेत्र में बैंक द्वारा विशेषज्ञता उपलब्धता करायी जा सकती थी। यह भी सुझाया गया था कि इस बड़े देश में सरकार, निजी क्षेत्र और सिविल सोसायटी के बीच समन्वय करने के लिए एक एजेन्सी की आवश्यकता थी।

कुछ प्रतिभागियों ने बैंक के प्रस्तुतिकरण की ÷टेलीग्राफ़िक' प्रवृत्ति पर नाराज+गी जतायी तथा अधिक विस्तार से यह जानना चाहा कि अपने एजेंडा की ओर बढ़ने के लिए बैंक ने किस प्रकार योजना बनायी है। यह भी कहा गया कि बैंक द्वारा वर्षों में सीखे हुए कुछ पाठों को दर्शाया जाना और यह बताया जाना चाहिए था कि पिछले वर्षों की तुलना में अस बार की रणनीति किस प्रकार अलग है।

कार्यक्रमों का क्रियान्वयन

जहाँ तक ÷आवाज+ उठाने' की बात है तो अनेक प्रतिभागियों को अनुभव हुआ कि सिविल सोसायटी और स्वयंसेवी संस्थाओं की आवाज अधिक समय तक मजबूत व प्रभावी नहीं रही। सिविल सोसायटी का अधिकांश एजेंडा बड़ी-बड़ी ÷बहुत निधिप्राप्त'(वेल-फ़ण्डेड) धन-दाताओं द्वारा संचालित स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा निर्धारित किया गया था। पहले के वर्षों में स्वयंसेवी संस्थाओं की गतिविधियों पर सरकारी नियंत्रण भी बहुत बढ़ चुका था। ऐसा अनुभव किया गया कि सिविल सोसायटी (ज+मीन से जुड़ी स्वयंसेवी संस्थाओं सहित) बैंक को मजबूत रूप में एक सक्रिय भूमिका निभानी थी ताकि बैंक के कार्यक्रम के ढाँचे में उनका समावेश सुनिश्चित हो। उसी समय एक प्रतिभागी ने अनुभव किया कि लोगों की गतिविधियों में अंतर करना महत्त्वपूर्ण था और योजना आयोग द्वारा एजेंडा को सामने रखा जाना चाहिए। एक टिप्पणी यह मिली कि सरकार द्वारा पहले की अपेक्षा अभी सिविल सोसायटी को अधिक महत्त्व दिया जा रहा था। प्रतिभागी ने जन-आँदोलनों की उपलब्धियों पर जोर दिया। उदाहरण के लिए औपचारिक सिविल सोसायटी संगठनों द्वारा किये काम की अपेक्षा सूचनाधिकार (आरटीआई) अधिनियम बना देने से जनता की बहुत भागीदारी बढ़ी। जन-आँदोलनों के उदाहरणों के रूप में कुछ वर्तमान आँदोलनों का जि+क्र किया गया। चल रहा एक आँदोलन ÷कानून-निर्माण पूर्व विचार-विमर्श' से सम्बन्धित है, जिसमें यह सुझाया गया कि लोगों से विचार-विमर्श ड्राफ्+ट बिल को संसद में भेजे जाने से पहले किया जाना चाहिए, न कि बाद में क्योंकि बाद में तो निहित स्वार्थों का मुद्दा आ जाता है। अन्य आँदोलन बुजुर्ग निर्धनों के लिए वृद्धावस्था पेन्शन' लाने से सम्बन्धित था, ऐसे बुजुर्ग निर्धन जिनका कोई दूसरा आसरा न बचा हो। इस पर आम सहमति बनी थी कि वर्ल्ड बैंक के अंतिम रणनीति दस्तावेज में देश के विकास में सिविल सोसायटी के लिए उनकी भूमिका को साफ़ तौर पर दर्शाया जाये।

इस बात पर भी कुछ विरोधाभास था कि एनजीओ या सीएसओ देश के भ्रमित आकार और विविधता पर विचार करते हुए जनसंख्या के खण्ड का कितना प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। एक प्रतिभागी ने सुझाव दिया कि निजी क्षेत्र को सिविल सोसायटी का एक भाग माना जाये और सामाजिक उद्देश्यों के लिए कार्यक्रमों में वित्त-पोषण(फ़ाइनेन्सिंग) के लिए उन्हें प्रेरित किया जाये क्योंकि अनेक वर्ष पहले ऐसा किया जाता रहा है। इप पर सहमति थी कि स्वैच्छिक (वॉलॅण्टरी) क्षेत्र को स्व-विश्लेषण(अपना विश्लेषण) किये जाने एवं लोगों से अपना जुड़ाव बढ़ाने

की आवश्यकता है।

सरकारी मुद्दों पर भी बल दिया गया क्योंकि परियोजनाओं व कार्यक्रमों की सफलता में वेबहुत महत्त्व रखते हैं। वित्तीय क्षेत्र में थोड़ी दुर्बलता(खासतौर पर कर-सुधारों के सम्बन्ध में) पर एक प्रतिभागी द्वारा ध्यान दिलाया गया। यह दर्शाया गया कि कर-सुधारों के बावजूद कर-प्रशासन प्रणाली में कोई परिवर्तन नहीं दिखा था। यह कहा गया था कि वस्तुओं व सेवाओं पर प्रस्तावित कर में बहुत अलग प्रणाली और बहुत अधिक दक्ष प्रशासन की आवश्यकता होगी। प्रतिभागियों ने PRIs को मजबूत बनाने के महत्त्व के बारे में अलग से बताया क्योंकि देश में स्त्रियों के राजनैतिक सशक्तिकरण को कारगर बनाने का वही एक तरीका था। इससे स्थानीय सरकार में फुर्ती आती है और नीचे तक योजना-निर्माण सम्भव हो पाता है। जिला स्तर पर योजना-निर्माण के लिए PRIs में क्षमता उत्पन्न करने की आवश्यकता को भी कुछ

प्रतिभागियों द्वारा बताया गया।

एक प्रतिभागी ने तर्क किया कि वर्ल्ड बैंक वित्तीय क्षेत्र सुधारों (कर लगाने सहित) की ओर देखे और फ़डिंग एजेन्सियों की मनोदशा बदलने में सहायता करे जो स्वयंसेवी संस्थाओं को ‘ठेकेदार' समझकर व्यवहार करती हैं। यह कहा गया कि जबकि मूलभूत राजकोषीय अनुशासन और निगरानी की आवश्यक थी, करमुक्त एनजीओ और सीएसओ, को कोई भय नहीं होना चाहिए, जैसा कि अभी कुछेक परस्थितियों में दिखलाई पड़ता है। यह देखा गया कि इस क्षेत्र में लाए गए सुधार से एनजीओं की आवाज बुलंद होगी।

लिंग मुद्दों के बारे में एक प्रतिभागी का कहना था कि वर्तमान रणनीति में इस चिंता को उतनी मजबूती से नहीं जताया गया, जितनी मजबूती ‘लिंग व विकास सम्बन्धी वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट 2012' में बरती गयी थी। यह सुझाव दिया गया था कि लिंग को बैंक के कार्यक्रम के ढाँचे में रखा जाना चाहिए।

एक प्रतिभागी ने दर्शाया कि प्राथमिक शिक्षा एवं भू-अधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत्‌ स्वयंसेवी संस्थाओं के मार्ग में संरचनागत असमानताएँ एक स्थायी (ढीठ) बाधा बनी हुई थी तथा इस समस्या निवारण किया जाना चाहिए था।

कुछ चिंता यह जतायी गयी कि स्थानीय स्तर पर क्षमता उत्पन्न करने एवं नीति सहित अपनी स्थिति के सम्बन्ध में बैंक पहले से आये विरोधाभासों को कैसे सुलझायेगा। उदाहरण के लिए विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया में बैंक सहयोग करना चाहता है किन्तु उसे प्राथमिक रूप से केन्द्र एवं राज्य सरकारों के साथ काम करना था, विचारों/अवधारणाओं की मूलभूत गतिविधियाँ तो ऊपर-नीचे रह गयीं। यह स्थिति तब बदलती जब प्रतिक्रियाओं और सुधार प्रक्रिया को संस्थागत किया जाता। एक प्रतिभागी ने यह भी बताया कि वर्ल्ड बैंक को देश में छोटे-छोटे सफल मॉडलों से पाठ सीखने की आवश्यकता है, सीख लेने के इस काम को नहीं किया गया। सामाजिक उद्यमिता ऐसा क्षेत्र था जहाँ ऐसी अनेक सफल कहानियाँ पायी जा सकतीं थीं।

यह रोचक रहा कि जहाँ एक ओर कुछ दृष्टिकोण नियंत्रण हटाने और राज्य-नियमन घटाने करने के पक्ष में थे, तो वहीं दूसरी ओर कुछ प्रतिभागियों ने अनुभव किया कि सरकार जो कर सकती है, वह कोई और नहीं कर सकता तथा निर्वाचित सरकार होने से उसके कुछ दायित्व(ड्यूटीज) हैं, जिनसे दूर नहीं भागा जा सकता।

यह भी एक सुझाव रहा कि बैंक को अपने कार्यक्रमों के ढाँचे में न्याय-आधारित प्रयास किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि बैंक के कार्यक्रमों के ढाँचों को सरकार द्वारा नकार दिये जाने के मामले बढ़ते हुए देखे गये थे।

वर्ल्ड बैंक की भूमिका

अनेक प्रतिभागियों ने दर्शाया कि बैंक को सभी स्तरों पर बेहतर योजना-निर्माण के लिए क्षमता बढ़ाने, क्रियान्वयन का अधिकार होने और निगरानी में सहायता एवं मजबूत प्रशिक्षक की भूमिका निभानी चाहिए। अनेक क्षेत्रों में तकनीकी सहायता एवं प्रबंधनात्मक जानकारी का भी महत्त्व था। यह सहमति दिखी कि बैंक के सहायता कार्यक्रम में विश्वभर में उसके व्यापक विकास अनुभव की बहुत महत्त्व था। क्षमता बढ़ाने (खासतौर पर नियामक एजेनिसयों की) को भी ऐसा महत्त्वपूर्ण क्षेत्र माना गया जहाँ वर्ल्ड बैंक भूमिका निभा सकता था।

एक प्रतिभागी ने सुझाव दिया कि बैंक को उन सलाहकारों से सावधान रहना चाहिए जिन्हें शरत का अनुभव या उसकी समझ नहीं है। बैंक की अपनी इंस्टीट्यूश्नल मेमोरी सुधारने के लिए भी उस बैंक के विभिन्न विभागों में बेहतर समन्वय आवश्यक था।

ऐसा सुझाव दिया गया कि सरकार के नीतिगत ढाँचे में संचालन करते समय बैंक को देश के उन लोगों से अपना संवाद होगा जिन्हें विकास कार्यक्रमों से लाभान्वित होना है।

विश्व बैंक की प्रतिक्रिया

वर्ल्ड बैंक टीम ने भारत के साथ लम्बे सम्बन्ध पर जोर दिया और मील के कुछ पत्थर दर्शाये। यह कहा गया कि इस लम्बे सम्बन्ध से भी सीखा गया है और बैंक अनेक सीखों को ग्रहण कर चुका है।

यह पता चला कि भारत के विकास क्षेत्र बजट की तुलना में बैंक का कुल सहयोग बहुत कम था, जिस कारण इसका कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा। उसी समय बैंक जिन क्षेत्रों में काम कर रहा था वे महत्त्वपूर्ण थे एवं उनकी कायापलट(बड़े बदलाव) हो रही थी तथा शरत में उसकी
उपस्थिति का यह एक बड़ा प्रमाण था।

उदाहरण के लिए लगभग तीन दशक पहले बैंक ने सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों का सहयोग किया क्योंकि वे देश की अर्थव्यवस्था की आधारशिला का निर्माण करते हैं। वैसे उस समय लगभग हर प्रमुख सार्वजनिक उद्यम को बैंक लोन उपलब्ध कराया गया था। यह चरण अब समाप्त किया जा चुका है। उसके बाद उदाहरण के लिए बैंक प्राथमिक शिक्षा में बड़े सहयोग (खासतौर पर खराब अधोसंरचना और कम स्कूली नामांकन वाले पिछड़े जिलों में) की ओर बढ़ा। अब उस (पिछड़े जिलों वाले) भारत में प्राथमिक शिक्षा पर सार्वभौमिक पहुँच अधिक है, यह चिंता का मुख्य विषय अधिक समय तक नहीं रहा। निवारण किये जाने वाले नये मुद्दे समानता, रखरखाव, सुधारना एवं गुणवत्ता बढ़ाना थे।
पानी की उपलब्धता एक और मुख्य विषय था जहाँ कर्णाटक में बैंक-फ़ंडेड पाइलट-प्रोजेक्ट ने पानी की अत्यधिक कमी वाली निर्धन बसाहटों में चौबीसों घण्टे पेय-जल उपलब्ध कराया था। इसीलिए बैंक की परियोजनाएँ रंग ला रही थीं और जीवन बदल रही थीं किन्तु जैसे-जैसे देश आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे नयी विकास चुनौतियों को पहचानना और सहयोग के नये तरीके खेजना आवश्यक हो गया।

इस बात पर जोर दिया गया था कि वर्ल्ड बैंक सभी क्षेत्रों एवं हितग्राही समूहों से उनके अपने-अपने दृष्टिकोणों को सुनने के लिए तैयार था। फिर भी शरत के सन्दर्भ में रणनीति बनाने का काम कठिन एवं श्रमसाध्य था, खासतौर पर संसाधनों की सीमाओं के कारण प्राथमिकताओं को तय कर लेना अनिवार्य हो जाता है


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