मुख्य कहानी

राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन परियोजना

14 जून, 2011

गंगा भारत की अत्यंत महत्त्वपूर्ण नदी है। इसके विशाल बेसिन में देश के एक-चौथाई जल-संसाधन मौजूद हैं और 40 करोड़ से अधिक लोग – भारत की लगभग एक-तिहाई आबादी - इसके क्षेत्र में निवास करते हैं। हिमालय क्षेत्र में स्थित अपने हिमानी-स्रोत से बंगाल की खाड़ी में एक विशाल पंखे जैसे आकार के डेल्टा तक 2,500 किमी. की यात्रा के दौरान गंगा की मुख्यधारा भारत के पांच राज्यों से होकर गुजरती है और अपने हरे-भरे मैदानी इलाकों को उपजाऊ बनाने के साथ-साथ किनारों पर बसे कस्बों व शहरों में जीवन का संचार करती है।

भारत की पवित्रतम नदी होने के नाते गंगा का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व है, जो इसके बेसिन की सीमाओं से परे तक फैला हुआ है। इसकी देवी के रूप में पूजा-अर्चना की जाती है और प्राचीन काल से ही देश-भर के लोग इसके किनारों पर स्थित अनेक ऐतिहासिक नगरों में बने मंदिरों में पूजा करने और इसके जल में स्नान करने के लिए आते हैं।

अपनी इस मूर्तिवत् स्थिति और धार्मिक धरोहर के बावजूद आज गंगा को प्रदूषण-संबंधी भारी दबावों का सामना करना पड़ रहा है और इसकी जैव-विविधता तथा पर्यावरण-संबंधी व्यावहारिकता (सस्टेनबिलिटी) को इनसे पैदा होने वाले ख़तरों का सामना करना पड़ रहा है। लगातार बढ़ती हुई आबादी, अनियोजित शहरीकरण और उद्योगीकरण की वजह से नदी के जल की गुणवत्ता पर असर पड़ा है। आज गंगा के जल में सीवेज के साथ-साथ सॉलिड वेस्ट और औद्योगिक वेस्ट की भरमार है, जो इसके किनारे रहने वाले लोगों तथा यहां होने वाली आर्थिक गतिविधियों की देन है।

प्रदूषण-संबंधी इन भारी दबावों से निपटने के लिए ज़रूरी अवसंरचना की कमी का अर्थ है कि नदी की मुख्यधारा के समीप बसे कस्बों और शहरों में एकत्र होने वाले सीवेज के मात्र एक-तिहाई का ही उपचार हो पाता है और इसका अनुपचारित या अच्छी तरह ट्रीट नहीं किया गया औद्योगिक वेस्टवाटर (कारखानों से बाहर निकलने वाला बहिःस्राव या दूषित जल और कचरा) नदी में मिलने वाले समस्त वेस्टवाटर का 20 प्रतिशत है। वास्तव में गंगा, विशेष रूप से इसके मध्य क्षेत्र में इतना अधिक प्रदूषण है कि इसका जल पीने लायक ही नहीं, बल्कि नहाने लायक भी नहीं है।

भारत सरकार गंगा एक्शन योजना के जरिए पहले भी गंगा में बढ़ते हुए प्रदूषण से निपटने की कोशिश कर चुकी है। जबकि इस कार्यक्रम से नदी की सफ़ाई करने में सीमित सफलता ही मिल पाई, इस कार्यक्रम को क्रियान्वयन के दौरान अनेक खामियों का सामना करना पड़ा।

पिछले अनुभवों से मिली शिक्षा के आधार पर भारत सरकार ने गंगा की सफ़ाई करने और इसके संरक्षण के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण का विकास किया है, जिसकी शुरूआत वर्ष 2009 में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण नेशनल गंगा रिवर बेसिन ऑथोरिटी (एनजीआरबीए) की स्थापना के साथ हुई। एनजीआरबीए को यह सुनिश्चित करने के लिए एक बहु-क्षेत्रीय कार्यक्रम तैयार करने का काम सौंपा गया है कि वर्ष 2020 के बाद नगरपालिका या उद्योगों का अनुपचारित अपशिष्ट जल (वेस्टवाटर गंगा) में नहीं बहने दिया जाएगा।

विश्व बैंक की सहायता

विश्व बैंक उक्त राष्ट्रीय लक्ष्य अर्जित करने के भारत सरकार के प्रयासों में सहायता कर रहा है। दिसम्बर 2009 में पर्यावरण और वन मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जयराम रमेश और विश्व बैंक के अध्यक्ष रॉबर्ट ज़ोएलिक के बीच हुई एक बैठक में इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि बैंक एनजीआरबीए कार्यक्रम को दीर्घकालिक सहायता मुहैया कराएगा, जिसमें इस कार्यक्रम को क्रियान्वित करने के लिए ज़रूरी संस्थाओं का विकास और सुदृढ़ीकरण करना तथा अवसंरचना-संबंधी प्राथमिक निवेशों के लिए वित्त सुलभ कराना शामिल है।

बैंक के कार्यकारी निदेशक मंडल ने 31 मई, 2011 को 1.556 अरब डॉलर की लागत वाली राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन परियोजना को स्वीकृति प्रदान की, जिसके लिए विश्व बैंक समूह से 1 अरब डॉलर की धनराशि प्राप्त होगी (जिसमें आईडीए से 19.9 करोड़ डॉलर का ब्याजमुक्त ऋण (क्रेडिट) और आईबीआरडी से 80.1 करोड़ डॉलर का कम ब्याज पर ऋण (लोन) शामिल है)। इस परियोजना को आठ वर्षों में पूरा किया जाएगा। यह परियोजना निम्न क्षेत्रों में राष्ट्रीय गंगा नदी नदी बेसिन प्राधिकरण (एनजीआरबीए) की मदद करेगी।

इसकी परिचालन-स्तर पर स्थापित संस्थाओं की क्षमता का गठन करना, जिससे ये गंगा की सफ़ाई और इसका संरक्षण करने के दीर्घकालिक कार्यक्रम का प्रबंध कर सकें।

  • केन्द्रीय और राज्य-स्तर पर परिचालन-स्तरीय संस्थाओं के गठन के अलावा परियोजना अत्याधुनिक गंगा नॉलेज सेंटर स्थापित करने में भी एनजीआरबीए की मदद करेगी, जो गंगा के संरक्षण के लिए प्रासंगिक जानकारी के भंडार के तौर पर काम करेगा।
  • जबकि एनजीआरबीए गंगा में प्रदूषण कम करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, सीवर नेटवर्क आदि की व्यवस्था पर व्यय करने के लिए पूंजी सुलभ कराएगा, नगरों और नगरपालिकाओं को आगे चलकर इनके प्रबंध और रखरखाव (ओ. एंड एम.) की ज़िम्मेदारी निभानी होगी। परियोजना से उक्त प्रणालियों (असेट्स) के सुचारू संचालन के लिए ज़िम्मेदार नगर-स्तर पर सेवाएं मुहैया कराने वालों की क्षमता का गठन और ऐसा करने के लिए उनकी प्रणालियों का आधुनिकीकरण करना होगा।
  • परियोजना से केन्द्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड्स को सुदृढ़ करने में मदद मिलेगी, ताकि ये अपनी सूचनी प्रणालियों के आधुनिकीकरण की मदद से और स्टॉफ़ को प्रशिक्षण मुहैया कराकर गंगा में प्रदूषण की बेहतर ढंग से मॉनिटरिंग कर सकें। इस परियोजना द्वारा गंगा जल की गुणवत्ता की मॉनिटरिंग प्रणाली को उन्नत करने के लिए वित्त सुलभ कराने के साथ-साथ गंगा जल की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले प्रदूषण के सभी स्रोतों की सूची तैयार की जाएगी।
  • जनता की भागीदारी की कमी गंगा को स्वच्छ करने के लिए पूर्व में किए गए प्रयासों के सफल न होने का एक कारण थी। नदी के किनारे रहने वाले समुदायों, तीर्थयात्रियों तथा नदी के जल-संग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) में स्थित उद्योगों समेत विभिन्न पक्षकारों (स्टेकहोल्डर्स) ने नदी को प्रदूषित करने वाले रोज़मर्रा के व्यवहार में बदलाव लाने की ज़रूरत को नहीं समझा। इस परियोजना से एनजीआरबीए को जनता को स्वच्छता कार्यक्रम में भाग लेने के लिए उत्साहित करने के लिए उनसे संपर्क साधने वाले कार्यक्रमों (कम्यूनिकेशंस प्रोग्रैम) की तैयारी और इन्हें क्रियान्वित करने में मदद मिलेगी।

गंगा में प्राथमिकता-प्राप्त स्थानों पर प्रदूषण के स्रोत (प्वाइंट सोर्स) कम करने के लिए कुछ प्रदर्शनात्मक निवेश (डिमांस्ट्रेटिव इन्वेस्टमेंट) करने होंगे। यह परियोजना नई प्रायोगिक (पायलट) प्रौद्योगिकियों या क्रियान्वयन व्यवस्थाओं के गठन के लिए वित्त मुहैया कराएगी, जिनके सफल होने की स्थिति में इनका विस्तार किया जा सकेगा। इस तरह के निवेशों का चयन एनजीआरबीए के लिए विकसित निवेश के फ़्रेमवर्क कार्यक्रम के अनुसार किया जाएगा।

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