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मुख्य कहानी

164 किमी. लंबी सड़क के खुल जाने से मिज़ोरम के दूरदराज़ और निर्धन इलाकों तक पहुंच

9 अगस्त, 2010

नई सड़क बन जाने से मिज़ोरम के उपजाऊ, लेकिन दूरदराज़ अंदरूनी इलाकों से संपर्क

श्रद्धेय डॉ. सी. एल. हमिंगा को दूरदराज़ पहाड़ियों में स्थित अपने घर से पढ़ने के लिए शिलांग जाने के लिए पैदल, बस और रेल से की गई थका डालने वाली अपनी यात्राएं याद आने लगती हैं। हालांकि यह काफी पुरानी बात है, वर्ष 1990 के दशक तक ज़्यादा कुछ नहीं बदला ही था। भारत के सुदूर पूर्वोत्तर के इस पहाड़ी इलाके में चंद एक सड़कें ही बन पाई थीं।

लेकिन आज उनके पास खुश होने की वजह थी। मिज़ोरम की राजधानी ऐज़ॉल से राज्य के दूसरे बड़े नगर लुंग्लेई में उनके घर तक जाने वाली सड़क, जो एक ज़माने में गड्ढ़ों से भरी होती थी और जिसके भू-स्खलन की चपेट में आने की आशंका बनी रहती थी, अब काफी चौड़ी, कहीं ज़्यादा सुरक्षित और इकसार है। म्यांमार और बंगलादेश की सीमाओं के समीपवर्ती लुंग्लेई के प्रमुख चर्च नेता श्रद्धेय डॉ. के. थंज़ाउवा का कहना है, ‘‘नई सड़क बन जाने से मिज़ोरम के उपजाऊ, लेकिन दूरदराज़ इलाके पहुंच के भीतर आ गए हैं। ऐसा महसूस होता है कि अब हम राजधानी के अधिक नज़दीक हैं और गांववासियों के जीवन में सुधार होगा।’’

संपर्क (कनेक्टिविटी) मिज़ोरम जैसे सुदूर पहाड़ी राज्य के लिए महत्त्वपूर्ण है। हालांकि लारियां और बसें असम के आखिरी स्टेशन से सामान लेकर पहाड़ी इलाकों से होकर गुज़रती हैं और गुवाहाटी तथा कोलकाता से उड़ानें यहां पहुंचती हैं, अधिकतर पहाड़ी इलाकों में लंबे और यातायात के लिहाज़ से दुगर्म मार्गों की वजह से व्यापार और विकास में बाधा जारी है।

मिज़ोरम की सीमा का 4/5वां हिस्सा दूसरे देशों से घिरा है - एक ओर पश्चिम में बंगलादेश के मैदानी इलाके मौजूद हैं, तो दूसरी ओर पूर्व में म्यांमार स्थित है। भौगोलिक दृष्टि से भारत से अलग-थलग मिज़ोरम न तो अन्य भारतीय राज्यों के साथ व्यापार करता है और न ही किसी पड़ोसी देश के साथ। 1947 में भारत के विभाजन की वजह से चिटागोंग बंदरगाह तक पहुंच से वंचित रह जाने से क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर भारी असर पड़ा। आज पश्चिम बंगाल में कोलकाता निकटतम समुद्री बंदरगाह है, जो इसकी पहुंच के भीतर है। इसके लिए ऐज़ॉव्ल से 1,700 किमी. लंबा सफ़र तय करना पड़ता है।

इंजीनियर-इन-चीफ़ तथा मिज़ोरम के सार्वजनिक निर्माण विभाग के सचिव श्री लिआन्सांगा के शब्दों में ‘‘समुचित संपर्क (कनेक्टिविटी) की कमी से होने वाला मनोवैज्ञानिक अलगाव भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण है, लेकिन मानसिक दृष्टि से हम अभी भी काफी पीछे हैं।’’

एक ज़माने के उनींदे गांवों में जीवन का संचार हुआ है

नई रेल, नदी या हवाई संपर्क की गुंजाइश न होने की वजह से मिज़ोरम के विकास के लिए अच्छी सड़कें महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें कोई ताज्जुब नहीं कि पुराने ऐज़ॉव्ल-लुंग्लेई मार्ग का व्यापक रूप से स्वागत किया गया है। इस नए मार्ग के बन जाने से सुप्त-प्रायः गांवों में जीवन का संचार और नए उद्यमों की स्थापना की दिशा में मार्गप्रशस्त हुआ है - एक ऐसी बात जो एक ऐसे राज्य में विशेष रूप से अर्थपूर्ण है, जिसमें बेराज़गारी का साया काफी लंबे समय से पढ़े-लिखे नौजवानों पर मंडराता रहा है।

राज्य की लगभग नब्बे प्रतिशत जनता जीवन-यापन के लिए ज़मीन पर निर्भर करती है, शायद इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव खेती पर पड़ा है। थेन्ज़ॉल गांव के निवासी कॉव्लदिंगा ने सड़क के बारे में खुशी से दमकते हुए अन्य दूसरों द्वारा व्यक्त विचारों को दोहराया, ‘‘सबसे बड़ी बात तो यह है कि हमें अपनी फ़सलें बेचने के लिए नए-नए बाज़ार मिल रहे हैं।’’

इसके पूर्व जानवरों और लोगों के झुंड पहाड़ी रास्तों पर माल ढोया करते थे और मानसून की भारी बारिश के दौरान ढलानों पर फिसलन रहने से आना-जाना मुश्किल हो जाता था। उन्होंने आगे कहा, ‘‘अपना फ़ालतू (सरप्लस) माल दोस्तों और पड़ोसियों को सामान के बदले सामान के आधार पर बेचने (बार्टर) के अलावा हमारे पास और कोई रास्ता न था। इसलिए हमने धान और अदरक की केवल एक मानसूनी फ़सल बोई। अब हम सर्दियों में गाज़र, फलियां, सरसों और बंद गोभी भी उगाते हैं।’’ गांव की महिलाएं अपना माल सड़क पर रखकर बेचती हैं और उनमें से अधिक मेहनती राजधानी के आकर्षक प्रातःकालीन बाज़ार में माल बेचने के लिए ऐज़ॉव्ल चली जाती हैं।

अब राज्य के उपजाऊ अंदरूनी भागों के साथ संपर्क स्थापित हो जाने से सरकार ने भविष्य के लिए महत्त्वाकांक्षी योजनाएं बनाई हैं। मिज़ोरम के समाज कल्याण और स्थानीय प्रशासन राज्य मंत्री श्री पी.सी. लालथन्लिआना ने बताया, ‘‘हमारा सूअरपालन और मुर्गीपालन शालाओं में सुधार करने तथा पहली बार अपना उत्पादन राज्य के बाहर बेचने का इरादा है।’’

नए उद्यम

नए-नए उद्यम लग रहे हैं। छोटे-छोट रेस्तरां खुल रहे हैं। ऐज़ॉव्ल से केवल 40 मिनट की दूरी पर स्थित गांव एइबॉक की निवासी गृहलक्ष्मी से बदलकर रेस्तरां की मालकिन बन गई सुश्री वान्लाल्चुआंगी ने बताया, ‘‘कारोबार बढ़ रहा है।’’ यह अनुमान लगाकर कि सड़क बन जाने से कारोबार के नए अवसर पैदा होंगे, उनके परिवार ने लकड़ी से निर्मित अपने मकान का पुनर्निर्माण करते समय इसमें एक मंज़िल और जोड़ दी थी। यह निर्माण कार्य उन्होंने मुआवज़े की उस धनराशि से किया था, जो उन्हें अपनी ज़मीन के बदले मिली थी। तभी से मकान का भू-तल एक हवादार रेस्तरां में बदल गया है और परिवार ऊपरी मंज़िल पर रहता है।

यह रेस्तरां यात्रियों को मूल्यवान सेवाएं मुहैया कराता है। नियमित रूप से यात्रा करने वाली डॉ. (श्रीमती) आर.एल. ह्नूनी ने बताया, ‘‘पहले आपको सड़क पर एक प्याला चाय भी नहीं मिल सकती थी।”

कारोबार की पहले से अच्छी संभावनाओं की वजह से ज़मीन के दाम भी बढ़ गए हैं। उदाहरण के लिए थेंज़ॉव्ल की बुनकर बस्ती में, जिसे मिज़ोरम का सांस्कृतिक दिल समझा जाता है, - ज़मीन के दाम दस गुना बढ़ गए हैं। वर्ष 2005 में ज़मीन के दाम 10,000 रुपये प्रति एकड़ से बढ़कर वर्ष 2010 में एक लाख रुपये प्रति एकड़ हो गए हैं।

स्थानीय शिल्प को लाभ पहुंचा है। अभी हाल ही तक थेंज़ॉव्ल के लगभग प्रत्येक परिवार में महिलाओं द्वारा बुने जाने वाले अधिकतर परंपरागत ‘पुआन’ (सारोंग) राजधानी के बिचौलियों को बेचे जाते थे। आज इन्हें गांव में ही तैयार बाज़ार सुलभ है और सड़क के किनारे रंग-बिरंगे उत्पाद प्रदर्शित करने वाले अनेक नए स्टाल मौजूद हैं।

ऐज़ॉव्ल और लुंग्लेई के बीच मोटर से तय किया जाने वाला रास्ता 235 किमी. से घटकर 164 किमी. रह गया है और वाहनों के चलने की परिस्थितियों में सुधार हुआ है, माल की ढुलाई पर आने वाली लागत कम हुई है, समय और डीज़ल के साथ-साथ मरम्मत-ख़र्च में भी कमी आई है। अब रूट पर मैक्सिकैब चलती हैं तथा दोपहिया वाहनों और सेकंड हैंड (पुरानी) मोटरगाड़ियों की बिक्री बढ़ रही है, जिससे लोगों को एक जगह से दूसरी जगह जाने में आसानी रहती है।

शिक्षा, स्वास्थ्य की देखभाल और मिज़ो युवाजन की बढ़ती हुई उम्मीदें

स्वास्थ्य-संबंधी देखभाल तक पहले से कहीं अधिक शीघ्रतापूर्वक पहुंच एक महत्त्वपूर्ण लाभ रहा है। एइबॉक ग्राम परिषद के अध्यक्ष श्री लालरिन्माविया ने बताया, ‘‘मलेरिया और अतिसार मानसून के दौरान होने वाली सामान्य बीमारियां हैं और बीमार पड़ने पर मरीज़ का यथाशीघ्र इलाज कराना ज़रूरी होता है।’’ सड़क बन जाने से लोगों की स्वास्थ्य-संबंधी चिंताएं घट गई हैं, क्योंकि मरीज़ों और विशेषकर शिशु जन्म के जटिल मामलों को जल्दी से जल्दी ऐज़ॉव्ल के अस्पताल में पहुंचाकर उनके जीवन की रक्षा की जा सकती है।

अंदरूनी इलाकों से संपर्क हो जाने से मिज़ोरम के युवाजन की महत्त्वाकांक्षाएं भी बढ़ गई हैं। अब वे शहर के अच्छे स्कूलों में पढ़ सकते हैं और फुटबाल तथा हॉकी की टोलियां दूर जगहों पर ऐज़ॉव्ल या अन्य दूसरे राज्यों में खेल प्रतियोगिताओं में भाग ले सकती हैं।

वाहनों की रफ़्तार बढ़ जाने से दुर्घटनाएं बढ़ी हैं। सड़क सुरक्षा के बारे में वाहनचालकों के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए स्थानीय महिलाएं संगठित हुई हैं। हाल ही में ‘बुलेट’ मोटरसाइकिल सवारों के 250 सदस्यीय मिज़ोरम थंडर्स क्लब ने सड़क पर चैरिटी प्रदर्शन किया, गांववासियों को सड़क पर खेलने वाले बच्चों के बारे में सावधान किया और इस पर सूखने के लिए धान बिछाया।

ग़ैर-मामूली चुनौतियां

जहां एक ओर सड़क बनकर चालू हो जाने से लाभ काफी पहुंचते हैं, इन दूरदराज़ पहाड़ियों में सड़कें बनाना सामान्य चुनौती से कहीं ज्यादा है। वर्ष में केवल छह महीने ही काम हो सकता है, मानसून की भारी वर्षा के दौरान काम पूरी तरह बंद करना पड़ता है। इसके अलावा, निर्माण के लिए ज़रूरी भारी उपकरण बाहर से लाने पड़ते हैं और मशीनरी में ख़राबी या फ़ालतू पुर्ज़ों की कमी हो जाने की वजह से भी अनावश्यक देरी हो जाती है। दूसरे राज्यों से अनुबंधित कामगारों से सामाजिक तनाव पैदा हो सकता है, उपयुक्त पत्थरों के खदानों को खोज निकालना मुश्किल होता है और बाहरी ठेकेदारों को इलाके को समझने में समय लग जाता है। परियोजना के लिए विश्व बैंक के टीम लीडर अशोक कुमार ने कहा, ‘‘इसके बावजूद यहां प्राप्त अनुभव दूरदराज़ और दुर्गम इलाकों में बैंक की भावी सहायता के लिए अत्यंत मूल्यवान होगा।’’

स्थानीय क्षमता बढ़ी है

महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि विश्व बैंक द्वारा वित्त-पोषित 6 करोड़ डॉलर की मिज़ोरम राज्य सड़क परियोजना से राज्य के सार्वजनिक निर्माण विभाग के इंजीनियरों में कार्यक्षमता का गठन हुआ है - यह देश का सबसे छोटा सार्वजनिक निर्माण विभाग है, जिसकी स्थापना 1972 में उस समय हुई थी, जब यह संघ क्षेत्र बना था। हाल ही में क्रियान्वित की जाने वाली पहली सड़क परियोजना के तौर पर (राज्य की सड़कों का निर्माण सीमा सड़क संगठन द्वारा किया गया है) इसने स्थानीय अधिकारियों को नई विशेषज्ञता प्रदान की तथा भारतीय और विदेशी इंजीनियरों व ठेकेदारों को बहुमूल्य अनुभव प्रदान किया।

परियोजना के निदेशक श्री के. लालसाम्वेला ने कहा, ‘‘हमें यह सब सीखने में समय लगा, क्योंकि काम की देखभाल और अनुबंध-प्रबंधन (कंट्रैक्ट मैनेजमेंट) का तरीका हमारे लिए नया था। लेकिन अब हम स्वयं ऐसी और इससे भी बड़ी परियोजनाएं हाथ में लेने के लिए तैयार हैं।’’ उनका जल्दी ही एक नए मल्टीमॉडल हाईवे प्रोजेक्ट (कालादान मल्टीमॉडल परियोजना) पर काम शुरू करने का इरादा है, जिसका निर्माण हो जाने पर राज्य पचास वर्षों से भी अधिक समय बाद एक समुद्री बंदरगाह तक आसानी से अपनी पहुंच बना सकेगा।

राज्य के योजना अधिकारियों ने जटिल सामाजिक और पर्यावरण-संबंधी मुद्दों पर ध्यान देने के क्षेत्र में भी अनुभव हासिल किया है, जो सड़क बनाने के दौरान अक्सर पैदा हो जाते हैं। सड़क-निर्माण के रास्ते में पड़ने वाले दबावों को कम से कम करने और विशेषकर ज़मीन पर मिज़ो समुदायों के स्वामित्व और ‘झुम्मिंग’ (स्लैश एंड बर्न कृषि-पद्धति) जैसे उनके रिवाज़ के बारे में कबीलाई नेताओं, चर्च समूहों और अन्य दूसरों से नियमित रूप से सलाह-मशविरा किया गया। श्री के. लालसाम्वेला ने कहा, ‘‘आपको लोगों के विचारों को सुनना चाहिए और उन्हें बतलाना चाहिए कि यह कार्य क्यों और किस तरह किया जा रहा है।’’

विशेष रूप से इस अत्यंत साक्षर राज्य में काम में खुलापन बनाए रखना महत्त्वपूर्ण रहा है और परियोजना-संबंधी दस्तावेज़ सार्वजनिक पुस्तकालयों के माध्यम से सुलभ कराए गए हैं। लुंग्लेई की ज़िला कलेक्टर सुश्री मार्गरेट ज़ोहमिंग्थांगी ने कहा, ‘‘यह पहला अवसर है, जब हमें ऐसी खुली कार्य-प्रक्रिया देखने को मिली है, हालांकि इसकी वजह से काम में देरी हो सकती है। लेकिन, अंत में हर कोई ऐसी क्वालिटी की सड़क चाहता है।’’

बाहरी कामगारों के मिज़ोरम के अधिक खुले समाज के साथ संपर्क को ध्यान में रखते हुए एचआईवी रोकथाम को परियोजना के अंग के रूप शामिल करने का विशेष महत्त्व रहा है। श्री लालसाम्वेला ने बताया, ‘‘पहले-पहल तो हमने सोचा कि इस एचआईवी कार्यक्रम का सड़क-परियोजना से क्या संबंध है, लेकिन अब इसका महत्त्व हमारी समझ में आ गया है।’’

सड़क रखरखाव कोष के गठन की दिशा में पहल

मिज़ोरम डीज़ल और पेट्रोल की बिक्री पर अधिभार (लेवी) लगाकर सड़क के रखरखाव के लिए बजट से अलग संसाधन जुटाने के लिए विशेष रूप से एक सड़क कोष के गठन की दिशा में भी प्रयास कर रहा है। हाल ही में राज्य विधान सभा में मिज़ोरम सड़क कोष नियम, 2010 पारत हुआ और सरकार इन नियमों को क्रियान्वित करने की दिशा में प्रयत्नशील है। अशोक कुमार ने कहा, ‘‘यह विशेषकर मिज़ोरम जैसे छोटे पूर्वोत्तर राज्य के लिए एक ठोस प्रयास है।’’

मिज़ोरम रोड ट्रांसपोर्टर्स यूनियन के अध्यक्ष श्री आर. लालमुन्माविया ने कहा, ‘‘हमें बदलाव दिखलाई दे रहा है। अगर राज्य के दूसरे भागों में भी ऐसी सड़कें बन जाएं, तो हम कहीं तेज़ी से विकास कर सकेंगे।’’ इसमें कोई संदेह नहीं कि स्थानीय इंजीनियरों और ठेकेदारों द्वारा सीखी गई उन्नत तकनीक इन दिनों चल रहे राज्य के ग्रामीण सड़क कार्यक्रम के साथ-साथ इसकी अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी भावी सड़क परियोजनाओं के लिए आगे चलकर लाभप्रद साबित होगी।बेहतर संपर्क (कनेक्टिविटी) मिज़ोरम के युवाजन के बेहतर भविष्य के निर्माण में सहायक होता है

स्थानीय बांस और परंपरागत तकनीकों से पहाड़ी ढलानों का स्थिरीकरण

परियोजना इंजीनियरों ने भूस्खलन-संभावित ऐज़ॉव्ल-लुंग्लेई मार्ग पर ढलानों को स्थिरता प्रदान करने के लिए नई जैव-इंजीनियरी तकनीकों के इस्तेमाल की दिशा में पहल की है। जब रिटेनिंग वॉल जैसी पेचीदा और समय लेने वाली परंपरागत संरचनाओं को 2004 के मानसून के दौरान क्षति पहुंची और ढलान बेअसर हो गए, राज्य के सार्वजनिक निर्माण विभाग ने विश्व बैंक के साथ मिलकर स्थानीय जानकारी और कुशलता से सीखने की दिशा में प्रयास किए। बैंक की टीम ने भूटान में एक सड़क परियोजना पर अर्जित अपने अनुभव से उल्लेखनीय तकनीकी जानकारी भी सुलभ कराई।

परियोजना पर काम करने वाले इंजीनियरों ने पहाड़ियों और सड़क के घाटी की ओर वाले भाग पर स्थित ढलानों पर नर्म चट्टानों को बांधने के लिए बड़े पैमाने पर उपलब्ध बांस का इस्तेमाल किया और ढलान-विशेष की विशेष ज़रूरत के अनुरूप बांस की दीवार बुनने, बांस की छत बनाने और बांस की बुनाई करने की स्थानीय तकनीकों को अपनाया। सार्वजनिक निर्माण विभाग के इंजीनियर और परियोजना के पारिस्थितिकी से जुड़े पहलुओं के प्रभारी डेविड सैप्ज़ोवा ने बताया, ‘‘हमने बांस की मैटिंग की अपनी पद्धतियों का भी विकास किया।’’

विशेषकर इस क्षेत्र में निर्माण के अल्पकालिक सत्र के दौरान इन कदमों को यथाशीघ्र उठाना ही संभव नहीं हुआ, बल्कि ये कदम स्थानीय लोगों के बीच भी लोकप्रिय हुए हैं, क्योंकि रिटेनिंग वॉल से भिन्न, जिस पर कुछ भी नहीं उग सकता, यहां ज़मीन इस्तेमाल के लिए उपलब्ध रही है। डेविड सैप्ज़ोवा ने आगे बताया, ‘‘हमने बांस की मैटिंग को स्थानीय घास से ढक दिया, जिसकी विभिन्न किस्मों को स्थानीय लोग इस्तेमाल कर सकते हैं - जैसे झाड़ू बनाने के काम आने वाली घास। हमने ऐज़ॉव्ल और लुंग्लेई इलाके में विभिन्न प्रकार की घास इस्तेमाल की, ताकि स्थानीय पारिस्थितिकी सुरक्षित रहे।’’ यह इलाका इंडो-बर्मा जैव-विविधता का हॉटस्पॉट है, जो विश्व के ऐसे छह इलाकों में से एक है।

दिलचस्प बात तो यह है कि जब बांस वर्ष 2005-06 में खिला - एक ऐसी घटना, जो मिज़ोरम और मणिपुर में 48 वर्षों में एक बार घटती है - परियोजना के स्टॉफ़ ने इस अवसर का इस्तेमाल जैव-इंजीनियरी से जुड़े उपायों का विस्तार करने के लिए किया और साथ ही 105 जगहों पर प्रचुर मात्रा में, सस्ते और तेज़ी से बढ़ने वाले बांस के बीज भी बोए, ताकि स्टैबिलाइज़ेशन की प्रक्रिया पूरी हो सके। कुल मिलाकर लगभग 90,000 डॉलर की लागत पर करीब 1,40,000 वर्ग मीटर पर ऐसा किया गया। इसकी तुलना में इतने ही बड़े इलाके में परंपरागत सिविल कार्य कराने पर लगभग 6,50,000 डॉलर से लेकर 10 लाख डॉलर की लागत आई होती। स्थानीय कुशलता, श्रम और सामग्री सस्ती ही नहीं पड़ी, बल्कि इनकी वजह से करीब 20 गांवों के लोगों के लिए अल्पकालिक रोज़गार सुलभ हुआ तथा सामुदायिक स्वामित्व को बढ़ावा मिला। जबकि यह कार्य एक उल्लेखनीय प्रयास का प्रतिनिधित्व करता है, सड़क के साथ-साथ चलने वाले नाज़ुक ढलानों तक इन प्रयासों का विस्तार करने की ज़रूरत होगी।

निर्माण कार्य से बच रहे मलबे के निपटान की चुनौती का सामुदायिक सलाह-मशविरे के जरिए सफलतापूर्वक सामना किया गया। इसकी वजह से निर्माण की प्रगति में भी बाधा पड़ती है। मिज़ोरम में समतल ज़मीन काफी महंगी है, इसलिए मलबे का इस्तेमाल स्थानीय युवकों के लिए चार फुटबाल खेलने के मैदान बनाने के लिए किया गया। इसकी वजह से स्थानीय निवासियों के बीच पर्याप्त सद्भावना पैदा हुई।

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