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हाइलाइट
- बिहार में लगभग 7,500 पोषण सखियों की एक समर्पित शक्ति है, जो गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार के जीविका कार्यक्रम के तहत काम करती हैं।
- आज बिहार में, 5 साल से कम उम्र के लगभग आधे बच्चे अधिक विविध आहार खा रहे हैं। अब प्रजनन आयु की 10 में से 6 महिलाएं भी बेहतर आहार खा रही हैं।
- जीविका कार्यक्रम के तहत पूरे बिहार में 35 जिला अस्पतालों और 10 मेडिकल कॉलेजों में 135 स्वास्थ्य मित्र कार्यरत हैं।
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रूबी देवी एक गृहणी हैं, जो पूर्वी भारतीय राज्य बिहार के जहानाबाद जिले के रतनी गांव में रहती हैं । रूबी बताती हैं, "2014 में जब मेरा पहला बच्चा पैदा हुआ, तो उसका वजन लगभग 1.25 किलोग्राम था । वह अक्सर बीमार पड़ जाता था और बढ़ती उम्र के साथ उसे कुछ भी सीखने में कठिनाई हो रही थी।" साल 2016 के बाद इस स्थिति में काफ़ी बदलाव आया जब रूबी देवी को गर्भावस्था के दौरान उचित पोषण के महत्व, गर्भधारण के बीच सही अंतर और बच्चे को सही तरीके से दूध पिलाने के बारे में पता चला. उनका दूसरा बच्चा स्वस्थ पैदा हुआ, जिसका जन्म के दौरान 3.5 किलो वजन था। वह अब दूसरी कक्षा में जाने के लिए तैयार है। वहीं उनका बड़ा बच्चा अब पहली कक्षा में ही है.
रूबी देवी विश्व बैंक द्वारा समर्थित जीविका कार्यक्रम की एक लाभार्थी हैं। इस कार्यक्रम ने राज्य भर में स्वयं सहायता समूहों की लाखों महिला सदस्यों के बीच पोषण को लेकर जागरूकता बढ़ाने में मदद की है। यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है क्यूंकि बिहार में गरीबों की आबादी बहुत ज्यादा है, जो स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर को बेहतर करने में कई चुनौतियों का सामना करते हैं।
बिहार के मुजफ्फरनगर जिले में रहने वाली 29 वर्षीय विनीता जीविका कार्यक्रम के तहत एक "पोषण सखी" के रूप में काम करती हैं। 2019 में पहली बार इस कार्यक्रम से जुड़ने के बाद उन्होंने जिन चुनौतियों का सामना किया, उसके बारे में याद करते हुए विनीता कहती हैं, "गांव की कई महिलाएं गर्भावस्था के दौरान पोषण या नियमित जांच के महत्व के बारे में सुनने के लिए तैयार नहीं थीं। " उस दौरान बिहार में बच्चे के जन्म को लेकर पुरानी मान्यताओं का प्रचलन था, जहां बूढ़ी मांओं का मानना था कि पिछली पीढ़ी की महिलाएं जिन चीज़ों पर निर्भर थीं, वह इस पीढ़ी की गर्भवती महिलाओं के लिए भी पर्याप्त है।"
अभी, विनीता का गांव में खुलकर स्वागत किया जाता है। वह हर रोज़ पांच से सात घरों में जाती हैं, गर्भवती महिलाओं और उनके परिवारों के साथ उचित पोषण, गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच के बारे में बात करती है। यहां तक कि वह ऐसे खानपान को अपनाने के बारे में सलाह देती हैं, जिससे जुड़ी सामग्री उनके घर पर आसानी से उपलब्ध हो और आराम से घर पर ही उसे पकाना संभव हो। प्रगति को दर्शाने के लिए वह उन घरों पर लाल बिंदी लगा देती है जहाँ उन्हें लगता है कि यहां सुधार की गुंजाइश है। जिन घरों में उनकी सलाह का पालन किया जा रहा होता है, वहां हरी बिंदी लगा देती है। पिछले कुछ सालों में विनीता यह देखकर खुश हैं कि लाल बिंदी वाले घर धीरे-धीरे हरी बिंदी वाले घरों में तब्दील हो रहे हैं।
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[tweetquote:[tweetText=बिहार में लगभग 7,500 पोषण सखियां मौजूद हैं, जो गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार के जीविका कार्यक्रम के तहत काम कर रही हैं। पोषण सखियों का चुनाव स्वास्थ्य और पोषण के बारे में उनकी रुचि और ज्ञान के आधार पर किया जाता है। ,tweetData=WorldBankIndia,tweetHash=]]इस कार्यक्रम के तहत उन्हें मास्टर रिसोर्स पर्सन्स द्वारा सात दिनों का प्रशिक्षण दिया जाता है। वे प्रतिदिन लगभग 160 रुपए कमाती हैं और ग्राम पंचायतों की ओर से सामुदायिक पोषण के लिए एक रिसोर्स पर्सन के रूप में काम करती हैं। वे गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं को गर्भावस्था से संबंधित मिथ्याओं को दूर करने में महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान कर रही हैं। साथ में मातृ मृत्यु दर में कमी लाने के लिए राज्य के एक सहयोगी के तौर पर काम कर रही हैं और अच्छी आहार पद्धतियों को अपनाने में सुधार ला रही हैं।
[tweetquote:[tweetText=बिहार ने पोषण के मामले में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है। राज्य में 5 साल से कम उम्र के लगभग आधे बच्चों को संतुलित पोषक आहार मिल रहा है, जबकि 2018 में हर 10 में से केवल 2 बच्चों को ही पोषक आहार मिल पा रहा था। ,tweetData=WorldBankIndia,tweetHash=]]2018-2022 के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में प्रजनन आयु की महिलाओं में हर 10 में से 6 महिलाएं उचित आहार ले रही हैं, जबकि पहले 10 में से केवल 2 महिलाएं उचित आहार ले पा रही थीं। बिहार में बाल कुपोषण की ऊंची दर को देखते हुए यह उपलब्धि विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहां 5 वर्ष से कम उम्र के 41 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं और 69 प्रतिशत एनीमिया से पीड़ित हैं। वैश्विक अध्ययनों से पता चला है कि कैसे जीवन के पहले 1,000 दिनों में पोषण संबंधी कमी से शारीरिक विकास धीमा हो जाता है और संज्ञानात्मक क्षमता कम हो जाती है, और साथ ही शैक्षणिक परिणामों में भी गिरावट आती है ।
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अस्पतालों में नियमित जांच में सहयोग करने वाली मित्र
बिहार के भागलपुर जिले में 27 वर्षीय शालिनी सुबह 4 बजे उठती हैं। वह अपने 7 साल के बेटे को स्कूल जाने के लिए तैयार कर[tweetquote:[tweetText=लगभग 15 किमी दूर मेडिकल कॉलेज में सुबह 6 बजे की शिफ्ट के लिए लिए तीन ऑटो रिक्शा बदलके पहुँचती है। शालिनी पिछले 10 महीनों से भागलपुर मेडिकल कॉलेज में एक स्वास्थ्य मित्र के रूप में काम कर रही हैं। इनका काम मरीज़ों को सही डॉक्टरों से मिलाना, अस्पताल में सुविधाओं के बारे में जानकारी देना और चिकितसा जांच में उचित सहयोग प्रदान करना है। वह कहती हैं, "मेडिकल कॉलेज में हर रोज़ 30-40 मरीज़ आते हैं और उनमें से ज्यादातर गरीब लोग है। वे अस्पताल की प्रक्रियाओं के बारे में कुछ नहीं जानत। कभी-कभी, उदाहरण के लिए, उन्हें तुरंत सर्जरी करानी पड़ती है। ऐसे में मेरा काम उन्हें सही प्रक्रियाओं के बारे में बताना और सही विभागों से जोड़ना है।" जीविका कार्यक्रम के तहत, स्वास्थ्य मित्रों का चयन स्वास्थ्य क्षेत्र में उनकी रुचि के आधार पर किया जाता है और उनका कम से कम बारहवीं पास होना ज़रूरी है। उन्हें राज्य की राजधानी पटना में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में दो दिन का प्रशिक्षण दिया जाता है। शालिनी स्वीकार करती हैं कि उन्हें शुरुआत में मेडिकल कॉलेज में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। “चिकित्साकर्मियों के साथ बातचीत करने, चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी शब्दावलियों और उनकी जटिलताओं के बारे में जानने और अस्पताल की प्रक्रियाओं को समझने में समय लगा। आज मुझे ख़ुशी है कि मैं उन वंचित लोगों की मदद कर पाती हूं जो दूर-दराज के इलाकों से यहां आते हैं और गुमराह किए जाने के डर और अनिश्चितता के चलते घबराए हुए होते हैं।" 40 वर्षीय तैमूल हक़ एक एचआईवी मरीज़ हैं, जो बिहार के पूर्णिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। वह अपना अनुभव के बारे में बताते हैं कि वह इससे पहले कभी भागलपुर नहीं आए थे और उन्हें नहीं पता था कि वह कहां जाएं और अस्पताल में किसी से क्या उम्मीद करें. "शालिनी मेरे और मेरे परिवार के लिए एक सगी बहन जैसी थी, जिसने बहुत धैर्य के साथ हमें अस्पताल की जटिल प्रक्रियाओं के बारे में समझाया और हमारे लिए फॉलो-अप जांच पर नज़र रखी।" बिहार भर में जीविका कार्यक्रम के तहत 35 जिला अस्पतालों और 10 मेडिकल कॉलेजों में 135 स्वास्थ्य मित्र काम कर रहे हैं। ,tweetData=WorldBankIndia,tweetHash=]]ती हैं, अपने परिवार के लिए खाना बनाती हैं, और वहां से लगभग 15 किमी दूर मेडिकल कॉलेज में सुबह 6 बजे की शिफ्ट के लिए लिए तीन ऑटो रिक्शा बदलके पहुँचती है।
शालिनी पिछले 10 महीनों से भागलपुर मेडिकल कॉलेज में एक स्वास्थ्य मित्र के रूप में काम कर रही हैं। इनका काम मरीज़ों को सही डॉक्टरों से मिलाना, अस्पताल में सुविधाओं के बारे में जानकारी देना और चिकितसा जांच में उचित सहयोग प्रदान करना है। वह कहती हैं, "मेडिकल कॉलेज में हर रोज़ 30-40 मरीज़ आते हैं और उनमें से ज्यादातर गरीब लोग है। वे अस्पताल की प्रक्रियाओं के बारे में कुछ नहीं जानत। कभी-कभी, उदाहरण के लिए, उन्हें तुरंत सर्जरी करानी पड़ती है। ऐसे में मेरा काम उन्हें सही प्रक्रियाओं के बारे में बताना और सही विभागों से जोड़ना है।"
जीविका कार्यक्रम के तहत, स्वास्थ्य मित्रों का चयन स्वास्थ्य क्षेत्र में उनकी रुचि के आधार पर किया जाता है और उनका कम से कम बारहवीं पास होना ज़रूरी है। उन्हें राज्य की राजधानी पटना में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में दो दिन का प्रशिक्षण दिया जाता है। शालिनी स्वीकार करती हैं कि उन्हें शुरुआत में मेडिकल कॉलेज में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। “चिकित्साकर्मियों के साथ बातचीत करने, चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी शब्दावलियों और उनकी जटिलताओं के बारे में जानने और अस्पताल की प्रक्रियाओं को समझने में समय लगा। आज मुझे ख़ुशी है कि मैं उन वंचित लोगों की मदद कर पाती हूं जो दूर-दराज के इलाकों से यहां आते हैं और गुमराह किए जाने के डर और अनिश्चितता के चलते घबराए हुए होते हैं।"
40 वर्षीय तैमूल हक़ एक एचआईवी मरीज़ हैं, जो बिहार के पूर्णिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। वह अपना अनुभव के बारे में बताते हैं कि वह इससे पहले कभी भागलपुर नहीं आए थे और उन्हें नहीं पता था कि वह कहां जाएं और अस्पताल में किसी से क्या उम्मीद करें. "शालिनी मेरे और मेरे परिवार के लिए एक सगी बहन जैसी थी, जिसने बहुत धैर्य के साथ हमें अस्पताल की जटिल प्रक्रियाओं के बारे में समझाया और हमारे लिए फॉलो-अप जांच पर नज़र रखी।"
बिहार भर में जीविका कार्यक्रम के तहत 35 जिला अस्पतालों और 10 मेडिकल कॉलेजों में 135 स्वास्थ्य मित्र काम कर रहे हैं। उनतीस वर्षीय रिंजू ने हरियाणा से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की पढाई की है और वह जमुई जिले के सदर अस्पताल में काम करती ह। वह रोज़ के काम का 491 रुपये कमाती हैं। उनके पति बेरोजगार हैं और वह बताती हैं कि एक वक्त ऐसा था जब चार सदस्यों वाला उनका परिवार आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहा था। वह मुस्कुराते हुए कहती हैं, "मुझे अपने मायके वालों और ससुराल वालों से पैसे मांगने पड़े स्वास्थ्य मित्र के रूप में जो मेरी आमदनी है, उससे मैं बिना किसी और की मदद लिए अपने बच्चों को स्कूल भेज सकती हूं।"
जीविका अधिकारियों के अनुसार, पहले एक चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिलती थी, जहां कई गर्भवती महिलाएं समय पर इलाज के लिए सदर अस्पताल नहीं पहुंच पाती थीं। बल्कि उन्हें निजी दवाखानों में ले जाया जाता था, जहां उन्हें इलाज के लिए बहुत ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते थे।. रिंजू बताती हैं, "अगर हम मरीजों की मदद करने की कोशिश करते थे तो [tweetquote:[tweetText=निजी दवाखानों की शह पर तमाम बिचौलिए हमें डराने-धमकाने लगते थे।" जिला प्रशासन के प्रयासों और स्वास्थ्य सखियों की मदद से सदर अस्पतालों में सुविधाएं बेहतर हो जाने के कारण स्थिति में सुधार आया है। अक्टूबर 2022 से, जमुई के सदर अस्पताल ने 57 C-सेक्शन और 600 से अधिक परीक्षण, अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे किए हैं.,tweetData=WorldBankIndia,tweetHash=]]
पोषणयुक्त भविष्य के लिए प्रयास
छह माह के बच्चों से लेकर छह साल के बच्चों में पोषण संबंधी स्वास्थ्य परिणामों में सुधार लाने के लिए बिहार ने बालाहार संयुक्त उद्यम को अपनाया है। इस उद्यम को राज्य में पूसा कृषि विश्वविद्यालय का समर्थन प्राप्त है. [tweetquote:[tweetText=बालाहार एक ऐसा शुष्क पोषक आहार है, जिसे गेंहू, मूंग दाल, दूध का पाउडर, शक्कर और घी से तैयार किया गया है। इसे भारतीय खाद्य प्राधिकरण से गुणवत्ता प्रमाण भी दिया गया है। यह प्रति 100 ग्राम पर 370 कैलोरी की ऊर्जा देता ह। इसके ५० ग्राम के पैकेट बाजार में आसानी से १२ रुपये में ख़रीदा जा सकता है। ,tweetData=WorldBankIndia,tweetHash=]]
27 साल की मधु दो बच्चों की मां हैं, और अप्रैल से ही अपनी ढाई साल की बेटी को बालाहार खिला रही हैं। वह सोच रही हैं कि जब उनका बेटा छह महीने का हो जायेगा तो वह उसे भी यह आहार देना शुरू कर देगी। मधु को लगता है कि बलाहार बाजार में उपलब्ध अन्य पूरक खाद्य पदार्थों की तुलना में किफायती है और यह उनकी बेटी के विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर है। "मेरी बेटी का वजन बढ़ रहा है और वह लंबी हो रही है। मैं अपने दूसरे बच्चे को भी यह खिलाऊंगी।"
विश्व बैंक के समर्थन से राज्य के समस्तीपुर जिले में दो बालाहार इकाइयां दिसंबर 2022 से काम कर रही हैं, और नवंबर 2023 से भागलपुर में दूसरी इकाई शुरू होने वाली है। जीविका कार्यक्रम के तहत पूसा विश्वविद्यालय ने ऐसी 40 महिलाओं को बालाहार भोजन के उत्पादन, खरीद, स्वच्छता और पैकेजिंग का प्रशिक्षण दिया है जो लघु उद्योग स्थापित करना चाहती थीं।
बिहार में इस बहुस्तरीय प्रयासों से पता चलता है कि सामूहिक संकल्प के ज़रिए समुदायों को सशक्त बनाने, मिथ्याओं को दूर करने, स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच में सुधार करने और पोषण में सुधार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की जा सकती ह। इससे लोगों और परिवारों की बेहतरी की दिशा में महत्त्वपूर्ण बदलवा लाया जा सकता है। इस कार्यक्रम की सफ़लता को देखते हुए जीविका को भारत में स्वास्थ्य और पोषण के लिए राष्ट्रीय संसाधन संगठन के रूप में मान्यता दी गई है।
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