प्रेस विज्ञप्ति

बिजली के स्थानीय उत्पादन और वितरण से ग्रामीण इलाकों में बिजली की आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिल सकती है

15 फरवरी, 2011



महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों के अध्ययन से पता चलता है कि ऐसे मॉडल से ग्रामीण उपभोक्ताओं को काफी आर्थिक लाभ हो सकता है

मुंबई, 15 फरवरी, 2011 : विश्व बैंक की एक नई रिपोर्ट में बताया गया है कि ऊर्जा के पुनरुपयोगी स्रोतों को इस्तेमाल करते हुए राज्य की विद्युत सेवा के जरिए बिजली उत्पादन और वितरण का स्थानीय स्तर पर विकेन्द्रीकरण कर देने से ग्रामीण इलाकों में काफी समय तक बिजली के गायब रहने की समस्या से राहत मिलेगी।

अगर ऐसे स्रोत स्थानीय तौर पर बिजली उत्पादन और आपूर्ति करने के लिए मिट्टी के तेल और डीज़ल की जगह ले लें, तो काफी मात्रा में आर्थिक लाभ हो सकता है। यह सुझाव एम्पॉवरिंग रूरल इंडियाः एक्सपैंडिंग इलेक्ट्रिसिटी एक्सेस बाइ मोबिलाइज़िंग लोकल रिसोर्सेज़ (ग्रामीण भारत को सशक्त बनानाः स्थानीय संसाधनों को जुटाते हुए बिजली तक पहुंच का विस्तार करना) शीर्षक रिपोर्ट में कहा गया है।

महाराष्ट्र के कोल्हापुर ज़िले में रत्नागिरि सब-डिवीज़न में किए गए अध्ययन से पता चलता है कि औसतन एक उपभोक्ता को दिन में 8-10 घंटे तक ही बिजली मिल पाती है। घरेलू उपभोक्ताओं की बिजली-संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने पर 11 रुपये प्रति यूनिट की कोपिंग कॉस्ट (लागत) आती है।

रिपोर्ट के अनुसार अगर विकेन्द्रीकरण के इस मॉडल को प्रयोग के तौर पर महाराष्ट्र के रत्नागिरि सब-डिवीज़न में लागू किया जाता है, तो आशा है कि उपभोक्ताओं को न केवल चौबीसों घंटे बिजली मिलेगी, बल्कि कोपिंग कॉस्ट घटकर 6 रुपये प्रति यूनिट रह जाएगी। इस सेवा की कार्यकुशलता में भी सुधार होगा, क्योंकि ट्रांसमिशन और वितरण में होने वाली हानि भी 36.81 प्रतिशत के वर्तमान स्तर से घटकर 15 प्रतिशत रह जाएगी।

इसके अलावा, महाराष्ट्र में विंड (पवन) और बॉयोमास के अप्रयुक्त भंडार मौजूद हैं। इस मॉडल को अपनाने से महाराष्ट्र के ग्रामीण उपभोक्ताओं को 4,700 करोड़ रुपये तक का आर्थिक लाभ हो सकता है।

डिस्ट्रिब्यूटेड जेनेरेशन एंड सप्लाई ऑफ़ रिन्यूएबिल एनर्जी में, जिसे डीजीएंडएस मॉडल के नाम से भी जाना जाता है, उत्पादन और वितरण दोनों शामिल हैं। ग्रामीण फ़्रेन्चाइज़ी बिजली का वितरण और प्रभार एकत्र करने के अलावा स्थानीय तौर पर बिजली का उत्पादन और फ़्रेन्चाइज़ के अंतर्गत इलाके में इसका वितरण भी करता है। स्थानीय समुदाय को इसलिए लाभ होता है, क्योंकि पैदा की जाने वाली बिजली का कतिपय न्यूनतम प्रतिशत विनिर्दिष्ट (डेज़िग्नेटेड) क्षेत्र को दिया जाता है और शेष को ग्रिड में डाल दिया जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे मॉडल से स्थानीय पुनरुपयोगी संसाधनों के इस्तेमाल से बिजली के उत्पादन में बढ़ोतरी होगी और इसकी उन इलाकों को आपूर्ति की जा सकेगी, जो ग्रिड तक पहुंच के बावजूद बिजली की आपूर्ति से वंचित रह सकते हैं।

1रत्नागिरि सब-डिवीज़न में गांवों का एक समूह है। इसमें लगभग 28000 घरेलू उपभोक्ता, 1200 कमर्शियल उपभोक्ता और 450 औद्योगिक उपभोक्ता हैं।

लेकिन, वर्तमान नीति में अत्यंत दूरदराज़ ग्रामीण इलाकों में ही बिजली के स्थानीय तौर पर ऐसे उत्पादन और इसकी आपूर्ति की व्यवस्था है, जो अभी तक ग्रिड से जुड़े हुए नहीं हैं। रिपोर्ट में सिफ़ारिश की गई है कि डीजीएंडएस मॉडल का उन ग्रामीण इलाकों तक भी विस्तार किया जाना चाहिए, जो ग्रिड से जुड़े हुए हैं और ज़्यादा दूर नहीं हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि इस समय बिजली का केन्द्रीकृत उत्पादन बढ़ाने या वितरण व्यवसाय की कार्यकुशलता में सुधार लाने पर ध्यान दिया जा रहा है।

विश्व बैंक के सस्टेनेबिल डेवलपमेंट नेटवर्क की उपाध्यक्षा इंगर एंडर्सनने कहा है, “विद्युत प्रणाली में सौ वर्षों से भी अधिक समय से निवेश के बावजूद भूमंडल पर मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में मोटे तौर पर 1.6 अरब लोग ऐसे हैं, जो बिजली से वंचित हैं। सब-सहारा अफ़्रीका की तरह दक्षिण एशिया और भारत में भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जिनकी बिजली तक पहुंच नहीं है।” उन्होंने आगे कहा, “चीन और फिलीपींस के अनुभव से पता चलता है कि वितरित उत्पादन परियोजनाएं, जिनमें आपूर्ति शामिल है और जो ग्रिड से भी जुड़ी हुई हैं, सफल रही हैं। स्थानीय समुदाय की भागीदारी से इलाके में सामजिक-आर्थिक विकास की दिशा में मार्गप्रशस्त होता है और इस प्रकार चहुंमुखी संवृद्धि को बढ़ावा मिलता है।”

सबका लाभ

ग्राहकों के लिए

  • विश्वसनीयता और सेवा के स्तर में वृद्धि।
  • बिजली की उपलब्धता में वृद्धि (स्थानीय स्तर पर उत्पादन होने से ग्रामीण इलाकों को गारंटीशुदा सप्लाई मिलेगी)।
  • सामुदायिक विकास (स्थानीय स्रोत से दीर्घकालिक आधार पर बिजली की भरोसेमंद आपूर्ति होने से बिजली से चलने वाले मूल्य-वर्धित सेवा-उद्योगों के माध्यम से आर्थिक संवृद्धि में तेजी से बढ़ोतरी हो सकती है)।
  • मिट्टी के तेल और डीज़ल के इस्तेमाल जैसी चीज़ों पर होने वाले भारी व्यय में बचत।

सेवाओं के लिए

  • अगर स्थानीय संयंत्र किसी पुनरुपयोगी ऊर्जा संसाधन का इस्तेमाल करता है, तो सेवा के आरपीओ (रिन्यूएबिल पोर्टफ़ोलिओ ऑब्लिगेशन) में अंशदान।
  • स्थानीय बिजली उत्पादन सेवाओं का इस्तेमाल करते हुए केन्द्रीकृत बिजली संसाधनों से जुड़े ट्रांसमिशन प्रभारों और हानियों से बचना।
  • सेवा-संबंधी दायित्वों को पूरा करना।
  • बाज़ार-हानियों को कम करना।

नियामकों के लिए

  • ग्रामीण इलाकों में बिजली की उपलब्धता, भरोसेमंद आपूर्ति और क्वालिटी में सुधार- संबंधी लक्ष्य प्राप्त करना।
  • निजी वितरण फ़्रेन्चाइज़ीज़ को वितरित उत्पादन में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करते हुए उत्पादन-क्षमता में वृद्धि करना।


डीजीएंडएस की आर्थिक व्यवहार्यता

डीजीएंडएस की आर्थिक व्यवहार्यता को रेखांकित करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां ग्रिड की आपूर्ति संतोषजनक नहीं है और रोशनी तथा अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए डीज़ल और मिट्टी के तेल पर निर्भरता अधिक है, डीजीएंडएस आर्थिक और वित्तीय दृष्टि से प्रतिस्पर्धी है।

मिट्टी का तेल इस्तेमाल करने वाले परिवारों में बिजली की खपत पर 11 रुपये किलोवाट घंटा की कोपिंग कॉस्ट बैठती है, जो पुनरुपयोगी ऊर्जा स्रोतों (लघु पन-बिजली के लिए 4.6 रुपये किलोवाट-घंटा, बॉयोमास ऊर्जा के लिए 5.7 रुपये किलोवाट-घंटा, और पवन ऊर्जा कते लिए 6.1 रुपये किलोवाट-घंटा) से मिलने वाली ऊर्जा की कोपिंग कॉस्ट से कहीं अधिक है।

इस विश्लेषण को देखते हुए, डीजीएंडएस मॉडल की मदद से ग्रामीण उपभोक्ताओं को पर्याप्त मात्रा में बिजली मुहैया कराने की दिशा में भारत सरकार के प्रयासों को बल मिल सकता है। आज 56 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों की बिजली तक पहुंच नहीं है। बिजली की मांग के इसकी आपूर्ति से अधिक होने की वजह से – वर्ष 2009-10 में 13.3 प्रतिशत की पीक शॉर्टेज और 10.1 प्रतिशत की एनर्जी शॉर्टेज) ग्रामीण इलाकों के सामने बिजली की प्रति व्यक्ति बहुत कम खपत और अपर्याप्त आपूर्ति जैसी प्रमुख चुनौतियां मौजूद हैं (अधिकतर ग्रामीण इलाकों में बिजली दिन में कुछ ही घंटे मिल पाती है) और सेवा अच्छी न होने की वजह से स्थिति बिगड़ गई है।

इस कमी की पृष्ठभूमि में वितरण सेवा के लिए प्रायः बाज़ार से बिजली की अल्पकालिक ख़रीद के जरिए अतिरिक्त बिजली की आपूर्ति करने का विकल्प ही रह जाता है। यह अत्यंत महंगी बैठती है (6 रु. से 10 रुपये किलोवाट घंटा) और इसका मिलना भी मुश्किल होता है। बिजली प्रदाता द्वारा ग्रामीण इलाकों की आपूर्ति में वृद्धि करने के लिए अल्पकालिक बिजली का इस्तेमाल करने पर घरेलू उपभोक्ताओं के लिए 3 से 4 रुपये किलोवाट घंटा के औसत खुदरा प्रभार पर 6 से 9 रुपये किलोवाट घंटे की हानि होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर बिजली प्रदाता डीजीएंडसी ऑपरेटर नियुक्त कर दे, तो इस हानि के घटकर 4 रुपये किलोवाट घंटा रह जाने की संभावना है।

विश्व बैंक के भारत-स्थित परिचालन सलाहकार ह्यूबर्ट नोवे-जोसेरैंड ने कहा है, “इस तरह यह स्पष्ट है कि स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वितरित विद्युतीकरण का अधिक व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल करने के लिए एक ऐसा नया दृष्टिकोण अपनाने की ज़रूरत है, जिसमें बुनियादी घरेलू विद्युतीकरण से परे भी ध्यान दिया जाए। यह स्थानीय आवश्यकताओं की विविधता और निर्णयकारी प्रक्रियाओं पर आधरित होना चाहिए, जिसमें उत्पादक गतिविधियों में सुधार करने के लिए बिजली की ज़रूरत भी शामिल होनी चाहिए।”

भविष्य की ओर

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि उत्पादन परियोजनाओं को डीजीएंडएस मॉडल पर समर्थन देने के लिए वितरण प्रणाली और विकेन्द्रीकृत वितरित उत्पादन (डिसेंट्रलाइज़्ड डिस्ट्रिब्यूटेड जेनेरेशन – डीडीजी) को सुदृढ़ करने के लिए राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के अंतर्गत उपलब्ध सब्सिडी का विस्तार करने से, भले ही यह आंशिक रूप से हो, कार्यक्रम की शुरूआत बहुत अच्छी तरह होगी और इससे निवेशक के मन में विश्वास तथा सम्मिलित वितरण और उत्पादन के जटिल कारोबार में दिलचस्पी पैदा करने में मदद मिलेगी।

रिपोर्ट में महाराष्ट्र के लिए सुझाए गए विशेष कार्य इस प्रकार हैः प्रतिस्पर्द्धी फ़्रेमवर्क के जरिए डीजीएंडएस ऑपरेटर का चयन करना, नियमों का परिपालन सुनिश्चित करने के लिए ऑपरेटर की मॉनिटरिंग तथा आपूर्ति पर आने वाली लागत और प्रभारों के बीच अंतर पाटने के लिए ऑपरेटिंग सब्सिडी मुहैया कराने के लिए व्यवहार्यता-अंतर कोष (वाइएबिलिटी गैप फ़ंड) का गठन।

सस्टेनेबिल डेवलपमेंट नेटवर्क के सेक्टर निदेशक जॉन हेनरी स्टेइन ने कहा है, “बेशक, भारत ने अपने राष्ट्रीय ग्रिड तक पहुंच बढ़ाने और इसका विस्तार करने के लिए नीति-संबंधी कई कदम उठाए हैं, लेकिन अभी भी काफी कुछ करना शेष रहता है। विश्व बैंक भारत सरकार के बिजली तक शत-प्रतिशत पहुंच के लक्ष्य को पूरा करने में इसके साथ भागीदारी करने की प्रतीक्षा कर रहा है।”

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