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प्रेस विज्ञप्ति

विश्व बैंक द्वारा हिमाचल प्रदेश को अपनी हरित संवृद्धि की कार्यसूची को सर्वांगीण और व्यावहारिक बनाने के लिए 10 करोड़ अमरीकी डॉलर का ऋण

6 सितम्बर, 2012

हिमाचल प्रदेश में इस कार्य में राज्य की आर्थिक संवृद्धि के प्रमुख क्षेत्रों – ऊर्जा, जल-संभर प्रबंधन, उद्योग और पर्यटन – में जलवायु के अनुरूप विकास पर ध्यान दिया जाएगा।

वाशिंगटन, 6 सितम्बर, 2012: आज विश्व बैंक ने प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न पर्वतीय राज्य हिमाचल प्रदेश की सरकार को आर्थिक संवृद्धि के लिए पर्यावरण की दृष्टि से व्यावहारिक मॉडल अपनाने की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करने के लिए 10 करोड़ अमरीकी डॉलर के डेवलपमेंट पॉलिसी लोन (डीपीएल) को स्वीकृति प्रदान की।

सर्वांगीण हरित संवृद्धि और व्यावहारिक विकास को बढ़ावा देने के लिए स्वीकृत किए गए इस डीपीएल से हिमाचल प्रदेश की सरकार को ऐसे समय में मदद मिलेगी जब राज्य आर्थिक संवृद्धि को गतिशीलता प्रदान करने वाले क्षेत्रों - ऊर्जा, जल-संभर प्रबंधन, उद्योग और पर्यटन - में परिवर्तनकारी कार्य शुरू कर रहा है। इस कार्यक्रम के साथ हिमाचल प्रदेश ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन की गहनता को कम करने के भारत सरकार के उद्देश्य को अर्जित करने में ठोस में अंशदान कर सकेगा। विश्व बैंक के बोर्ड द्वारा आज स्वीकृत डीपीएल पिछले एक दशक में हिमाचल प्रदेश में बैंक की काफी समय से चली रही और बहु-क्षेत्रीय भागीदारी का परिणाम है।

आज हिमाचल प्रदेश देश के काफी बड़े भाग को आर्थिक दृष्टि से मूल्यवान सेवाएं उपलब्ध कराता है। इस राज्य में तीन नदियों के बेसिन मौजूद हैं और यह एक जल-संभर के तौर पर काम कर रहा है, जो हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में 20 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह देश का स्वच्छ ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत है और पन-बिजली का उत्पादन करता है, जिससे उत्तर भारत के अधिकांश भाग में बिजली की कमी को दूर करने में मदद मिल सकती है। हिमाचल प्रदेश के वन भी एक महत्वपूर्ण कार्बन सिंक के तौर पर काम करते हैं और विश्व के जैवविविधता के हॉटस्पॉट के रूप में सुविदित हैं।

बैंक का सहायता सुलभ कराने का यह कार्यक्रम जलवायु-परिवर्तन के दुष्प्रभावों के साथ ताल-मेल बिठलाने और इन्हें दूर करने, स्थाई आधार पर पन-बिजली के विकास का मार्गदर्शन करने वाली नीतियों और कार्यव्यवहार को अमल में लाने, अपने जल-संभरों का बेहतर ढंग से संरक्षण करने के लिए स्थानीय समुदायों को अधिकारिता प्रदान करने और निर्णयकारी प्रक्रिया में जीआईएस को एकीकृत करने में मदद करने को लक्षित है।

भारत-स्थित विश्व बैंक के कंट्री डाइरेक्टर ओन्नो रुह्ल ने कहा, “हिमाचल प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों को बरकरार रखना राज्य और भारत दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। हिमाचल प्रदेश सरकार यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत को स्वीकार करती है कि संवृद्धि को गतिशील बनाने से प्राकृतिक संसाधनों को कोई क्षति नहीं पहुंचेगी और संवृद्धि को पर्यावरण की दृष्टि से व्यावहारिक बनाने के लिए इसने अनेक पहलकदमियां की हैं।”

अपने जलसंभरों की रक्षा करने में समुदायों की सहायता 

राज्य सरकार ने पूरे राज्य में समुदायों की अगुवाई में स्थानीय जलसंभरों के संरक्षण का एक कार्यक्रम शुरू किया है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत गांववासी स्थानीय स्तर पर योजनाएं बनाएंगे और इन्हें क्रियान्वित करेंगे। इससे  पहाड़ों में जल की उपलब्धता में सुधार होने, किसानों को अधिक आमदनी देने वाली फ़सलों को अपनाने, सीमित जल-संसाधनों का सोच-समझकर इस्तेमाल करने तथा कृषि-संबंधी कारोबार शुरू करने में समुदायों को मदद मिलने की आशा है। बैंक द्वारा वित्त-पोषित डीपीएल से राज्य सरकार को राज्य के 77 विकास खंडों में से प्रत्येक में कम से कम एक ग्राम पंचायत में उक्त दृष्टिकोण को मूर्तरूप देने में मदद मिलेगी। आशा है कि जलसंभर-प्रबंधन-संबंधी उक्त कार्यव्यवहार का परिणाम मिट्टी के अधिक संरक्षण, जैवविविधता के लिए परिष्कृत पर्यावास (हैबिटैट), पहले से अधिक वन-अवरण और पहले से कम अवसादन (सेडिमेंटेशन) में निकलेगा।

पन-बिजली की पहचान राज्य में आर्थिक संवृद्धि के एक प्रमुख संचालक तत्व के तौर पर की गई है। राज्य में पन-बिजली उत्पादन की भारी संभावना भारत में ऊर्जा की बढ़ती हुई मांग में अंशदान करने वाला महत्वपूर्ण लो-कार्बन तरीका है। राज्य की अगले दस वर्षों में 10 गीगावाट पन-बिजली का उत्पादन करने की महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं। डीपीएल से हिमाचल प्रदेश की सरकार को यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि राज्य के पन-बिजली कार्यक्रम में ऐसी नीतियां और कार्यव्यवहार शामिल हैं, जो पर्यावरणीय और सामाजिक दृष्टि से व्यावहारिक हैं।

इस कार्यक्रम के अग्रणी पर्यावरण-विशेषज्ञ और टॉस्क टीम लीडर चार्ल्स कोर्मियर ने कहा है, “इस कार्य का उद्देश्य पन-बिजली का विस्तार करने में मदद करना ही नहीं, बल्कि ऐसी बेहतर नीतियां और कार्यप्रक्रियाएं अपनाना भी है, जिनसे यह सुनिश्चित होगा कि हिमाचल प्रदेश की पन-बिजली परियोजनाओं का इस तरह से विकास किया गया है, जो पर्यावरण की दृष्टि से व्यावहारिक है और जिनसे स्थानीय समुदायों को लाभ भी पहुंचता है। हिमाचल प्रदेश की सफलता भारत में अन्य हिमालय-क्षेत्रीय राज्यों के लिए ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया क्षेत्र में अन्य देशों के लिए भी एक उदाहरण होगी।”

पर्यावरण और सामाजिक दृष्टि से व्यावहारिक पन-बिजली

                इस कार्यक्रम से हिमाचल प्रदेश को बड़े स्तर पर पन-बिजली के विकास से जुड़े पर्यावरणीय जोखिमों का मूल्यांकन और प्रबंधन करने में नदी-बेसिन दृष्टिकोण अपनाने में मदद मिलेगी। इसमें सभी प्रमुख नदी बेसिनों पर पड़ने वाले आवर्ती प्रभाव का मूल्यांकन करना, पन-बिजली परियोजनाओं से रिलीज़ होने वाले पर्यावरणीय प्रवाहों की समीक्षा और इन्हें मॉनिटर करना तथा बेसिन-स्तर पर आवाह क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) उपचार योजनाएं बनाना शामिल होगा।

                पन-बिजली परियोजनाओं के क्षेत्र में रहने वाले स्थानीय समुदायों को अक्सर ही नकारात्मक प्रभावों का सामना करना पड़ता है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि इन विकास परियोजनाओं से गांववासियों को भी लाभ पहुंचे, हिमाचल प्रदेश सरकार ने इस ऑपरेशन के समर्थन से राजस्व में भागीदारी की एक अनोखी योजना शुरू की है। इस नई नीति के अंतर्गत प्रत्येक परियोजना द्वारा की जाने वाली बिजली की बिक्री का एक प्रतिशत एन्युटी (वार्षिकी) भुगतान के तौर पर परियोजना-प्रभावित परिवारों में वितरित किया जाएगा। “ग़रीबी की रेखा से नीचे” परिवारों को अतिरिक्त राशि मिलेगी।”

अन्य कम्पोनेंट (घटक)

                हिमाचल प्रदेश सरकार मानती है कि करों से छूट और राजकोषीय इंसेन्टिव्स से ऐसे उद्योगों का सृजन हुआ है, जो प्रतिस्पर्धात्मक नहीं हैं। उक्त कार्यक्रम में इंसेन्टिव पर आधारित आर्थिक नीतियां बनाने पर ध्यान दिया जाएगा, जिससे औद्योगिक उत्सर्जन (इमिशन) कम किया जा सके और इससे पर्यटन-संबंधी व्यावहारिक कार्यव्यवहार को बढ़ावा मिलेगा।

अंततः, आशा है कि दो की सीरिज़ में दूसरी डीपीएल को क्लीन टेक्नोलॉजी फंड (सीटीएफ़) द्वारा वित्त-पोषित किया जाएगा, जैसा कि सीटीएफ़ ट्रस्ट फंड कमेटी द्वारा भारत की निवेश योजना का नवम्बर 2011 में अनुमोदन किया जा चुका है। आईबीआरडी और सीटीएफ़ दोनों रियायती शर्तों पर वित्त सुलभ कराते हैं।

इंटरनेशनल बैंक फ़ॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट (आईबीआरडी) से मिलने वाले इस ऋण की परिपक्वता अवधि 18 वर्ष है और इसका भुगतान पांच वर्ष बाद शुरू होगा।

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2013/049/SAR