प्रेस विज्ञप्ति

पुनरुपयोगी ऊर्जा भारत में बिजली की कमी दूर करने में प्रमुख भूमिका निभा सकती है

11 फरवरी, 2011



नई दिल्ली, 11 फरवरी, 2011 – विश्व बैंक की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि पुनरुपयोगी ऊर्जा के देश में उपलब्ध (इंडिजिनस) स्रोत, जिनके उत्पादन पर बहुत कम लागत आती है, आगे चलकर आर्थिक दृष्टि से अधिक व्यावहारिक साबित हो सकते हैं। पुनरुपयोगी संसाधन आपूर्ति में विविधता लाकर तथा आयात पर निर्भरता कम और ईंधन की क़ीमतों में उतार-चढ़ाव को दूर करते हुए भारत की ऊर्जा सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। अनलीशिंग द पोटेन्शियल ऑफ़ रिन्यूएबिल एनर्जी इन इंडिया शीर्षक रिपोर्ट समस्याओं का निदान करने वाली (डाइग्नास्टिक) रिपोर्ट है, जिसमें भारत में पुनरुपयोगी ऊर्जा के विकास की व्यावहारिकता का मूल्यांकन किया गया है। यह रिपोर्ट 20 राज्यों में लगभग 180 पवनचक्कियों, बॉयोमास और लघु पन-बिजली परियोजनाओं से मिले आंकड़ों के साथ-साथ नवीन और पुनरुपयोगी ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) तथा केन्द्रीय विद्युत नियामक आयोग (सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेग्यूलेटरी कमीशन - सीईआरसी) से मिली जानकारी पर आधारित है।

भारत में बिजली की मांग के अगले पच्चीस वर्षों में 7.4 प्रतिशत की औसत वार्षिक दर से बढ़ने की आशा है। मांग में वृद्धि के साथ संतुलन बनाए रखने के लिए उत्पादन-क्षमता में पांच गुना वृद्धि करनी होगी। इंटेग्रेटेड एनर्जी पॉलिसी रिपोर्ट, 2006 में दिए गए अनुमान के अनुसार स्थापित क्षमता का लगभग तीन-चौथाई (फ़ीडस्टॉक के तौर पर कोयला और गैस के साथ) ताप-ऊर्जा पर आधरित होगा। अगर नई उत्पादन-क्षमता स्थापित करने, बिजली सेवाओं के वितरण में कुशलता लाने और प्रबंध में सुधार करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए जाते, तो आपूर्ति और मांग के बीच अंतर के बढ़ने की संभावना है।

आज भारत के बिजली उत्पादन का तीन-चौथाई से अधिक कोयले और प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है। इस्तेमाल के मौजूदा स्तर पर भारत में कोयला भंडारों के 45 वर्ष में ख़त्म हो जाने का अनुमान है। भारत पहले ही बिजली उत्पादन में काम आने वाले अपने कोयले के 10 प्रतिशत का आयात करता है और वर्ष 2011 तक इसके बढ़कर 16 प्रतिशत हो जाने का अनुमान है।

उक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग 150GW (गीगा वाट)के विदित ऊर्जा संसाधनों के साथ, जिनका लगभग 10 प्रतिशत ही विकसित हो पाया है, पुनरुपयोगी ऊर्जा भारत में बिजली की कमी दूर करने वाले समाधानों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।

विश्व बैंक के सस्टेनेबिल डेवलपमेंट नेटवर्क के वाइस प्रेसिडेंट, इंगर एंडर्सन ने कहा है, “पुनरुपयोगी ऊर्जा को अगले बड़े प्रौद्योगिकी उद्योग के रूप में देखा जाता है, जिसमें विश्व-भर में एक ट्रिलियन डॉलर के ऊर्जा उद्योग में बदलने की संभावना मौजूद है। चीन ने इस दिशा में कदम उठाया है और यह पुनरुपयोगी ऊर्जा उपकरणों के उत्पादन में विश्व-अग्रणी बनने का प्रयास कर रहा है। पुनरुपयोगी ऊर्जा में निवेश करने से भारत विश्व-स्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्योगों और प्रौद्योगिकियों का विकास करने में सक्षम होगा, जिनकी मदद से संवृद्धि के लिए नए अवसर सुलभ हो सकते हैं।”

पुनरुपयोगी साधनों की आर्थिक और वित्तीय सामर्थ्य

रिपोर्ट में बताया गया है कि पुनरुपयोगी ऊर्जा का विकास भारत में भी क्षेत्रीय आर्थिक विकास का एक महत्त्वपूर्ण साधन बन सकता है। भारत के 65 प्रतिशत लघु पन-बिजली संसाधन हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर तथा उत्तराखंड में केन्द्रित हैं। ओड़िशा में आर्थिक दृष्टि से अधिक आकर्षक पवनचक्की से ऊर्जा-उत्पादन की क्षमता और मध्य प्रदेश में बॉयोमास की संभावनाएं अधिकतर अविकसित हैं। इन राज्यों में पुनरुपयोगी ऊर्जा का विकास करने से घरेलू औद्योगिक विकास को सुदृढ़ करने के लिए बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है, नए निवेशों को आकर्षित किया जा सकता है, रोज़गार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं और राज्यों को पुनरुपयोगी ऊर्जा ट्रेडिंग सर्टिफ़िकेट बेचने की अनुमति देने से उन्हें अतिरिक्त आय हो सकती है।

रिपोर्ट में सुझाया गया है कि लघु पन-बिजली परियोजनाओं से लगभग 3GW पुनरुपयोगी ऊर्जा पैदा करना आर्थिक दृष्टि से व्यावहारिक है, जबकि कोयले पर आधारित उत्पादन पर 3.08 रुपये/किलोवाट घंटा लागत (अवाइडेड कॉस्ट) बैठती है। पवनचक्कियों और बॉयोमास पर आधारित तथा लघु पन-बिजली परियोजनाओं में लगभग 59GW पुनरुपयोगी ऊर्जा 5 रुपये/किलोवाट घंटे से भी कम लागत पर उपलब्ध है। इन तीनों प्रौद्येगिकियों की 68GW की समग्र उत्पादन क्षमता का 6 रुपये/किलोवाट घंटा की दर पर उपयोग किया जा सकता है। कोयले के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखते हुए पवनचक्की, बॉयोमास और लघु पन-बिजली परियोजनाओं की 90 प्रतिशत की सम्मिलित पुनरुपयोगी क्षमता आर्थिक दृष्टि से व्यावहारिक है।

कोयले की तरह गैस और तेल के दामों में भी हाल के वर्षों में काफी उतार-चढ़ाव आया है। फ़ॉसिल (अश्मीभूत)ईंधनों की कीमतों में उतार-चढ़ावों को देखते हुए पुनरुपयोगी ऊर्जा ही एकमात्र फ़्री हेजिंग मैकेनिज़्म है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पुनरुपयोगी ऊर्जा की रिस्क-एडजस्टेड (निहित जोखिमों को समायोजित करने के बाद) लागत फ़ॉसिल-आधारित ईंधनों से कम है और इसके इस्तेमाल से पोर्टफ़ोलिओ की कीमतों की स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा बढ़ जाती है।

लघु पन-बिजली का पूरी तरह विकास नहीं हो पाया है, जो पुनरुपयोगी ऊर्जा का बहुत सस्ता और अत्यंत आकर्षक रूप है। यह पुनरुपयोगी प्रौद्योगिकी का आर्थिक दृष्टि से अत्यंत व्यावहारिक रूप है, जिस पर औसत लागत 3.56 रुपये प्रति किलोवाट घंटा बैठती है, जबकि यह लागत बॉयोमास से ऊर्जा-उत्पादन करने पर 4.60 रुपये प्रति किलोवाट घंटा और पवनचक्कियों से ऊर्जा का उत्पादन करने पर 4.90 रुपये प्रति किलोवाट घंटा बैठती है। वास्तव में, लघु पन-बिजली पर आने वाली लागत की तुलना ताप-उत्पादन स्रोतों से पैदा की जाने वाली ऊर्जा की लागत से तथा बॉयोमास से ऊर्जा के उत्पादन पर आने वाली लागत की तुलना पवनचक्कियों से पैदा की जाने वाली ऊर्जा पर आने वाली लागत से की जा सकती है। यह स्रोत आंध्र प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में अत्यंत आकर्षक है।

विश्व बैंक के भारत में कंट्री डाइरेक्टर एन. रॉबर्टो ज़ाघा ने कहा है, “भारत के लिए तेज़ी से विकसित होती अर्थव्यवस्था की मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन-क्षमता में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी करने के लिए बहुमुखी विकल्पों का सहारा लेना आवश्यक है। पुनरुपयोगी ऊर्जा विशेष रूप से अपनी आर्थिक व्यावहारिकता की वजह से ऐसा ही एक विकल्प है। सौर ऊर्जा समेत संपूर्ण पुनरुपयोगी क्षमता डीज़ल से सस्ती बैठती है, जिसकी 20GW की मौजूदा संस्थापित क्षमता पुनरुपयोगी संसाधनों का स्तर बढ़ाने की नई संभावनाओं की ओर संकेत करती है।”

भावी लक्ष्य

इस अंतर को दूर करने की ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए सरकार ने अगले 10 वर्षों में पुनरुपयोगी साधनों की कम से कम 40GW उत्पादन-क्षमता स्थापित करने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्ष 2022 तक उत्पादन-क्षमता में 40GW का समावेश करने के लिए भारत को न केवल राष्ट्रीय सौर मिशन के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों को पूरा करना होगा, इसे अपनी पवनचक्कियों से ऊर्जा उत्पादन की क्षमता को बढ़ाकर दोगुना और लघु पन-बिजली उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर चौगुना करना होगा, सह-उत्पादन क्षमता को पूरी तरह अर्जित करना होगा तथा बॉयोमास से ऊर्जा उत्पादन में भी वृद्धि करनी होगी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों की वजह से पुनरुपयोगी ऊर्जा के विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना विशेष रूप से तात्कालिक और प्रासंगिक हो गया है।

सस्टेनेबिल डेवलपमेंट नेटवर्क के जॉन हेनरी स्टेइन ने कहा है, “निःसंदेह भारत ने पुनरुपयोगी ऊर्जा को मिली-जुली ऊर्जा की मुख्यधारा में लाने के लिए नीतिगत संरचना तथा संस्थाएं स्थापित करने की दिशा में भारी प्रगति की है। विश्व बैंक पुनरुपयोगी ऊर्जा के विकास में 40GW का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य प्राप्त करने में सरकार के साथ भागीदारी करने की प्रतीक्षा कर रहा है।”

रिपोर्ट में कहा गया है कि पुनरुपयोगी ऊर्जा के विकास में उल्लेखनीय वित्तीय और नियामक बाधाएं अभी भी मौजूद हैं। विकास के चरण के दौरान बड़ी संख्या में आवश्यक क्लियरेंस मिलने में देरी होने से परियोजनाएं रुक जाती हैं। ईंधन की बढ़ती हुई लागत से बॉयोमास सेक्टर ठप हो गया है।

रिपोर्ट में समस्त पुनरुपयोगी ऊर्जा परियोजनाओं के लिए एक ही जगह से (सिंगिल विंडो) क्लियरेंस की व्यवस्था करने, नए दृष्टिकोणों को बढ़ावा देने, प्रतिस्पर्धी बिडिंग प्रक्रिया अपनाने और उत्पादकों को दीर्घकालिक वित्तीय विकल्प सुलभ कराने का सुझाव दिया गया है।

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