मुख्य कहानी24 नवंबर, 2025

बायोफ़ार्मा में भारत की ऊँची छलांग: शक्तिशाली सार्वजनिक-निजी सहयोग के ज़रिए स्वास्थ्य नवाचार का रूपांतरण

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मुख्य बिंदु

  • भारत में पहले ही वैज्ञानिक प्रतिभा और मज़बूत बोयोफ़ार्मा क्षेत्र (यानी जैविक पदार्थों से दवाएँ बनाने का क्षेत्र) मौजूद थे। लेकिन वे उद्योग और शैक्षिक समुदाय के बीच सीमित सहयोग, वित्तीय दिक्कतों, अपर्याप्त मूलभूत ढांचे और महँगे ‘क्लिनिकल ट्रायल’ जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे थे। इससे बोयोफ़ार्मा क्षेत्र के विकास में बाधाएँ आ रही थीं।
  • विश्व बैंक की 'इनोवेट इन इंडिया फॉर इन्क्लूसिवनेस' प्रोजेक्ट ने इन कमियों को दूर करने में मदद की है। इससे स्थानीय स्तर पर सफलताओं का दौर शुरू हुआ। इनमें एमआरआई स्कैनर, बायोसिमिलर (पहले जैसी जैविक दवाएँ) और टीके शामिल हैं। साथ ही इससे बायोटेक स्टार्टअप्स के लिए सहायक परिस्थितियों को बनाने में मदद मिली है।
  • लगातार निवेश, प्रगतिशील नियमों और शक्तिशाली सार्वजनिक–निजी सहयोग के साथ, भारत में यह क्षमता है कि वह जेनरिक दवाओं में वैश्विक नेतृत्व से आगे बढ़कर एक वास्तविक बोयोफ़ार्मा पावरहाऊस बन सकता है। ऐसा बोयोफ़ार्मा पावरहाऊस जो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों, दोनों के लिए बहुमूल्य और अत्याधुनिक चिकित्सा विकसित कर सके।

भारत में बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में चुपचाप एक क्रांति हो रही है और युवा उद्यमी इसका नेतृत्व कर रहे हैं।

बैंगलोर के अर्जुन अरुणाचलम के स्टार्ट-अप ने देश के लिए ऐसी उपलब्धी प्राप्त की है जो एक मील का पत्थर है।उन्होंने भारत का पहला पूर्ण तौर पर स्वदेशी एमआरआई स्कैनर बनाया है और उसे बाज़ार में लाए हैं। ये विश्व के बेहतरीन स्कैनरों का मुकाबला करता है लेकिन आयातित मशीनों की तुलना में बहुत ही सस्ता है। भारत ऐसे कुछ ही देशों में से एक है जो ये स्कैनर बना रहे हैं।अर्जुन के एमआरआई स्कैनर हल्के और कम ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं।

उनकी कंपनी वॉक्सेल ग्रिड्स इनोवेशन्स प्राइवेट लिमिटेड के बनाए स्कैनर मुंबई और असम के कैंसर अस्पतालों में इस्तेमाल भी होने लगे हैं। ये बिमारी के बारे में ज़्यादा जानने और उसके उपचार को सुलभ और किफ़ायती बना रहे हैं। इसका लाभ ख़ास तौर पर उन 90 फ़ीसदी भारतीयों को मिल रहा है जिनकी वर्तमान में इन सुविधाओं तक पहुँच नहीं है।

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चेन्नई स्थित लेविम लाइफ़टेक प्राइवेट लिमिटेड के जतिन विमल की भी ऐसी ही कहानी है। उनकी कंपनी लिराग्लूटाइड का उत्पादन कर रही है, जो टाइप 2 डायबिटीज़ के लिए एक बायोसिमिलर दवा है और जो आयातित दवा से एक तिहाई कीमत पर उपलब्ध है। यानी, जैविक पदार्थों से यह भारत में निर्मित पहली बायोसिमिलर दवा है। यह एक काफ़ी जटिल प्रक्रिया है जिसमें एक जीवित जीव को उपचार के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

वास्तव में, पुरानी रासायनिक-आधारित दवाओं और नई 'बायोलॉजिक' दवाओं के बीच का अंतर इतना विशाल है कि इसे एक कार और जम्बो जेट के बीच जो अंतर है, उससे समझा जा सकता है।  इसलिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कई स्थापित कंपनियां इन नई चिकित्सा विधियों को विकसित करने में तेज़ी से जुट गई हैं । यह स्टार्टअप भारत में इस क्षेत्र में सफलता पाने वाली पहली कंपनी है । इससे कंपनी ने अपने उत्पादन के एक साल के भीतर ही ब्रेक-ईवन यानी ख़र्चे पूरे कर लिए हैं। 

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केवल इतना ही नहीं है। अन्य निजी उद्यम यूटीआई के संक्रमण और निमोनिया के लिए नए एंटीबायोटिक्स विकसित कर रहे हैं। दूसरी ओर डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया की एक ऐसी किस्म जो घातक भी हो सकती है, इन सभी के लिए  टीके जल्द ही जारी किए जाने की संभावना है, साथ ही दुनिया का पहला हेपेटाइटिस ई टीका भी बाज़ार में आ सकता है।

महत्वपूर्ण है कि ये टीके, जो भारतीयों में होने वाली इन बीमारियों की किस्मों का समाधान करते हैं, भारत जैसी विशाल आनुवंशिक विविधता जैसे देश में क्लिनिकल परीक्षणों से गुजर चुके होंगे। उतना ही महत्वपूर्ण है कि भारत की पहली सेल थेरेपी (कोशिका के ज़रिए उपचार) विकसित की गई है जो वयस्कों और बच्चों में लिम्फोमा के लिए है, जहां जान बचाने वाली दवाओं के आयात की लागत बहुत ही अधिक है। इसके अतिरिक्त, एंडोस्कोप, हृदय वाल्व, दंत और हड्डी के  प्रत्यारोपण, साथ ही पैर के अल्सर के इलाज के लिए स्टेम सेल थेरेपी के अनुसंधान और विकास भी जारी हैँ।

इन सभी वैज्ञानिक सफलताओं में समान चीज़ ये है कि इनके विकास के महत्वपूर्ण चरणों में भारत के नेशनल बायोफार्मा मिशन ने इनकी मदद की है. नेशनल बायोफार्मा मिशन को अपनी तरह की पहली विश्व बैंक प्रोजेक्ट – इन्नोवेट इन इंडिया फॉर इंक्लूसिवनेस” (आई3) प्रोजेक्ट के तहत वित्तीय मदद दी गई है।

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बायोटेक्नोलॉजी इनोवेशन रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC) इस परियोजना को लागू कर रही है और उसके प्रबंध निदेशक हैं डॉक्टर जितेंद्र कुमार कहते हैं, “विश्व बैंक के समर्थन से राष्ट्रीय बायोफ़ार्मा मिशन एक प्रोजेक्ट से कहीं ज़्यादा है. यह भारत के स्वास्थ्य नवाचार ईकोसिस्टम के लिए एक उत्प्रेरक है। खोज को वितरण से जोड़कर, हम केवल सस्ती उपचार विधियों को आगे नहीं बढ़ा रहे हैं, बल्कि एक मज़बूत और वैश्विक रूप से विश्वसनीय बायोफ़ार्मा क्षेत्र का विकास कर रहै हैं। ये भारत को समान स्वास्थ्य देखभाल समाधानों के मामले में अग्रणी बनाता है।”

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भारत के पास एक मज़बूत और विकसित वैज्ञानिक ईकोसिस्टम है, जिसे सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों, स्टार्टअप्स और निजी उद्यमों के व्यापक नेटवर्क से मदद मिल रही है। इससे पहले, इन हितधारकों के बीच सहयोग ऐतिहासिक रूप से सीमित रहा है। 

बायोटेक्नोलॉजी इनोवेशन रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल 2012 से इस अंतर को पाटने का काम कर रही है, जिसका उद्देश्य मज़बूत और लचीले सहयोगों को प्रोत्साहित करना है। वर्ष 2017 से नेशनल बायोफ़ार्मा मिशन विश्व बैंक के समर्थन के साथ बायोटेक अनुसंधान को आगे बढ़ाने और बायो-फ़ार्मास्युटिकल्स के विकास को तेज़ करने में मदद कर रहा है।

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अनुसंधान को लैब से बाजार तक ले जाना

मिशन की प्रमुख प्राथमिकताओं में से एक - उद्योग और शैक्षिक संस्थानों के बीच साझेदारी को मज़बूत करना था।

विश्व बैंक परियोजना के वरिष्ठ स्वास्थ्य विशेषज्ञ दिनेश नायर और वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं टास्क टीम लीडर अमाडू डेम कहते हैं, “नवाचार अलग-थलग रह कर फलीभूत नहीं हो सकता।” वो कहते हैं, “परिवर्तनकारी सरकार-समर्थित सफलताएँ तब मिलती हैं जब सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के संस्थान, विशेषज्ञता और संसाधनों को साझा करने के लिए सहयोग करते हैं।” मिशन ने वैज्ञानिक सलाहकार समूहों की स्थापना की है। इनमें विश्वविद्यालयों, शोधकर्ताओं, व्यवसायों और सरकारी एजेंसियों ने ज्ञान साझा करने के लिए सहयोग किया और ऐसे शोध को अनुमोदित किया जो सार्वजनिक आवश्यकताओं को पूरा करता है।

एनबीएम के मिशन डायरेक्टर डॉक्टर राज के. शिरुमल्ला ने कहा, “वैश्विक स्तर पर, बहुत सारी नवाचार गतिविधियां स्टार्ट-अप्स में होती हैं। लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो रहा था क्योंकि फंडिंग और सहायक ईकोसिस्टम की कमी थी। स्टार्टअप्स को वित्तीय, तकनीकी सलाह, नियामक मार्गदर्शन और आवश्यक मूलभूत ढांचे के रूप में पोषण और समर्थन की आवश्यकता होती है।”

इसलिए मिशन ने ऐसे ईकोसिस्टम के निर्माण के लिए बुनियादी ढांचे की व्यवस्था की और अब यह इस क्षेत्र के लिए देश का सबसे बड़ा प्रारंभिक चरण का फंडिंग स्रोत बन चुका है।  भारत में वर्ष 2014 से, लगभग दस हज़ार बायो-आधारित शोध स्टार्टअप्स बने हैं, जिनमें से अनेक को मिशन से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से फ़ायदा हुआ है।

BIRAC ने लगभग 100 ऐसे इनक्यूबेशन केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों ने साझा लैब सुविधाएँ प्रदान की हैं जहां छोटी बायोटेक कंपनियां और स्टार्टअप्स अपने प्रयोगों को सस्ते में और आसानी से संचालित कर सकते हैं। यदि ये न होता तो नई नई स्थापित की गई कंपनियों के लिए ऐसा करना बहुत महंगा पड़ता है। इनके साथ-साथ एनबीएम के समर्थन से स्थापित 25 विशेष शोध, प्रोटोटाइपिंग और पायलट स्केल बायो-मैन्युफैक्चरिंग सुविधाओं ने भी इस काम में मदद की है। स्टार्टअप्स ने विशेषज्ञ मार्गदर्शन, वित्तपोषण और नेटवर्किंग के अवसरों से भी लाभ उठाया है। यह सब ऐसे वातावरण में हुआ जो नवाचार को बढ़ावा देने और वैज्ञानिक खोजों को बाज़ार के लिए तैयार उत्पादों में बदलने के लिए बनाया गया है।

इनमें से कुछ सुविधाएँ पुणे के वेंचर सेंटर, बेंगलुरु के सी-कैम्प, विशाखापत्तनम के एएमटीजेड, आईआईटी कानपुर और पुणे के आईआरशा में उपलब्ध हैं।

जब अर्जुन अरुणाचलम इलेक्ट्रिकल इंजीनरिंग में डॉक्टरेट पूरी करने और एमआरआई फिज़िसिस्ट के रूप में विशेषज्ञता हासिल करके बाद भारत लौटे, तो उन्हें अपने उद्यम को शुरु करने के लिए टाटा ट्रस्ट से प्रारंभिक वित्तीय सहायता मिली। लेकिन वह मानते हैं कि मिशन से प्राप्त 12.4 करोड़ रुपये ही थे जिन्होंने उन्हें अपने विचार को अवधारणा से उत्पादन तक ले जाने में सक्षम बनाया।

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बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा

इस परियोजना में हिस्सा लेने वाले 7000 से अधिक इन्नोवेटर्स (जिनमें 45 फ़ीसदी महिलाएँ हैं), के बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा के लिए उन्हें राष्ट्रीय और वैश्विक नियमों का प्रशिक्षण दिया गया। इसने इन्नोवेटर्स को अपने बौद्धिक संपदा अधिकारों के लिए आवेदन कर अपने काम को सुरक्षित रख पाने में मद्द मिली है।

मिशन ने सात क्षेत्रीय प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यालय स्थापित करने में भी मदद की, जिन्होंने कुल 850 से अधिक मामलों में बौद्धिक संपदा के बारे फ़ाइलिंग यानी दावा किया और लगभग 120 प्रौद्योगिकी हस्तांतरण किए। इस सुरक्षा ने इन्नोवेटर्स को शोध करने के लिए आवश्यक प्रोत्साहन प्रदान किया है। इन प्रयासों ने एक मज़बूत, कुशल कार्यबल तैयार किया है जो बायोफ़ार्मा नवप्रवर्तन को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित है।

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क्लिनिकल प्रयोगों का संचालन

एक और बड़ी कमी थी, क्लिनिकल ट्रायल साइट्स, जो अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार स्थापित की जा रही हैं। लगभग 30 अस्पताल और 10 फील्ड साइट्स के पास लगभग आठ लाख स्वयंसेवकों का उपलब्ध डेटाबेस है। उन्हें कैंसर, रूमेटोलॉजी, डायबिटीज़ और नेत्र विज्ञान जैसे क्षेत्रों में ट्रायल्स चलाने के लिए स्थापित किया गया है। अब तक 100 से अधिक क्लिनिकल ट्रायल्स के लिए मदद की गई है। इससे भारत उच्च गुणवत्ता वाले ट्रायल्स के लिए एक भरोसेमंद स्थान बन गया है और इसने अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को भी आकर्षित किया है।

लीराग्लुटाइड के निर्माता जतिन विमल कहते हैं कि मिशन के माध्यम से उन्हें जो फंडिंग प्राप्त हुई, उसने उनके क्लिनिकल ट्रायल की 85 फ़ीसदी लागत को पूरा किया। इतना ही नहीं, हर तीन महीने के बाद वैज्ञानिक परामर्श और तकनीकी समीक्षा बैठकों ने उन्हें महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया। ये मार्गदर्शन उन्हें उद्यम के विकास, नियामक रणनीति और परियोजना प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में मिला जिससे उन्हें लागत को कम रखने और तेज़ी से बाजार में प्रवेश करने में मदद मिली।

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भारत और दुनिया के लिए टीके बनाना

मिशन की प्रमुख उपलब्धियों में से एक है दुनिया का पहला डीएनए-आधारित कोविड-19 टीका ज़ाईकोव-डी बनाना, जिसे ज़ाइडस कैडिला ने विकसित किया। ज़ाइडस ने वैज्ञानिक विशेषज्ञता और बड़े पैमाने पर निर्माण क्षमताएं प्रदान कीं, जबकि मिशन ने महत्वपूर्ण वित्तीय और तकनीकी समर्थन दिया।

मिशन भारत बायोटेक द्वारा चिकनगुनिया टीके के विकास में भी मदद कर रहा है। भारत बायोटेक भारत की एक प्रमुख टीका और बायो-थेरैप्यूटिक्स कंपनी है। यह अपनी किस्म का पहला ऐसा टीका होगा जो भारत में विकसित किया गया है और इसका परीक्षण भी यहीं हुआ है। इसकी घरेलू बाज़ार में ही नहीं बल्कि अफ़्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और लातिनी अमेरिका के बाज़ारों में निर्यात होने की भी प्रबल संभावना हैं क्योंकि वहाँ चिकनगुनिया आम है।

डॉक्टर बद्री पटनायक, डॉक्टर राजश्री और इस कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे 20-25 वैज्ञानिकों की टीम को भरोसा है कि वैक्सीन जल्द ही लॉन्च हो जाएगा। उनका कहना है कि मिशन से लगभग 16 करोड़ रुपए मिलना और इसके अलावा समय समय पर समीक्षाएं बहुत मददगार साबित हुईं। मिशन की ओर से नियामक अनुमोदनों में सहायता भी लाभदायक रही।

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भारत के बायोफ़ार्मा भविष्य की रूपरेखा

अर्जुन अरुणाचलम कहते हैं, “भारत में प्रतिभा का बहुत बड़ा खज़ाना है।” कई अन्य लोग भी इसी विचार को व्यक्त करते हैं। वह विभिन्न क्षेत्रों से 35 लोगों को रोज़गार देते हैं और उनकी मज़बूत कार्य शैली और सीखने की कमाल की क्षमता की प्रशंसा करते हैं। वह बताते हैं कि इन में से कई लोगों ने आम से तकनीकी संस्थानों में अध्ययन किया है। वे कहते हैं, “उन्हें केवल सही वातावरण की आवश्यकता है ताकि वे अपनी प्रतिभा दिखा सकें।”

डॉक्टर राज के. शिरुमल्ला बताते हैं, “भारत में वो क्षमता और इच्छाशक्ति है कि वो  1.1 खरब डॉलर के वैश्विक फार्मा उद्योग पर अपनी छाप छोड़ सके। भारत पहले ही जेनेरिक दवाओं और टीकों में विश्व में सबसे आगे हैं। इसे केवल समर्थन और निरंतर निवेश की आवश्यकता है ताकि यह केवल मात्रा के पक्ष से ही नहीं, बल्कि मूल्य और असर के रूप में भी एक वैश्विक बायो-फ़ार्मास्यूटिकल ताकत के रूप में उभर सके।”

भारत जैवप्रौद्योगिकी के नए युग में प्रवेश कर रहा है, जहां उद्यमी और वैज्ञानिक देश की प्रतिभा और बायोफ़ार्मा नवाचार के प्रति उत्साह दिखा रहे हैं। विश्व बैंक के समर्थन से, भारत का राष्ट्रीय बायोफ़ार्मा मिशन इसी लक्ष्य को लेकर चला था। इसने एक समृद्ध यानी फल-फूल रहे बायोफ़ार्मा ईकोसिस्टम को बनाने की बुनियाद रखी है। असली बायोफ़ार्मा ताकत बनने के लिए, इन नवप्रवर्तकों को और अधिक सार्वजनिक और निजी समर्थन की आवश्यकता होगी। लगातार निवेश, प्रगतिशील नियम और मज़बूत ईकोसिस्टम से नवाचार में और सफलता मिल सकती है। निरंतर प्रतिबद्धता के साथ, भारत न केवल अपने लोगों के लिए सफलतापूर्वक काम कर सकता है बल्कि वैश्विक स्तर पर बायो-फ़ार्मास्युटिकल्स में दुनिया का नेतृत्व कर रहे देशों में से एक बन सकता है।

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