अनुसंधान को लैब से बाजार तक ले जाना
मिशन की प्रमुख प्राथमिकताओं में से एक - उद्योग और शैक्षिक संस्थानों के बीच साझेदारी को मज़बूत करना था।
विश्व बैंक परियोजना के वरिष्ठ स्वास्थ्य विशेषज्ञ दिनेश नायर और वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं टास्क टीम लीडर अमाडू डेम कहते हैं, “नवाचार अलग-थलग रह कर फलीभूत नहीं हो सकता।” वो कहते हैं, “परिवर्तनकारी सरकार-समर्थित सफलताएँ तब मिलती हैं जब सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के संस्थान, विशेषज्ञता और संसाधनों को साझा करने के लिए सहयोग करते हैं।” मिशन ने वैज्ञानिक सलाहकार समूहों की स्थापना की है। इनमें विश्वविद्यालयों, शोधकर्ताओं, व्यवसायों और सरकारी एजेंसियों ने ज्ञान साझा करने के लिए सहयोग किया और ऐसे शोध को अनुमोदित किया जो सार्वजनिक आवश्यकताओं को पूरा करता है।
एनबीएम के मिशन डायरेक्टर डॉक्टर राज के. शिरुमल्ला ने कहा, “वैश्विक स्तर पर, बहुत सारी नवाचार गतिविधियां स्टार्ट-अप्स में होती हैं। लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो रहा था क्योंकि फंडिंग और सहायक ईकोसिस्टम की कमी थी। स्टार्टअप्स को वित्तीय, तकनीकी सलाह, नियामक मार्गदर्शन और आवश्यक मूलभूत ढांचे के रूप में पोषण और समर्थन की आवश्यकता होती है।”
इसलिए मिशन ने ऐसे ईकोसिस्टम के निर्माण के लिए बुनियादी ढांचे की व्यवस्था की और अब यह इस क्षेत्र के लिए देश का सबसे बड़ा प्रारंभिक चरण का फंडिंग स्रोत बन चुका है। भारत में वर्ष 2014 से, लगभग दस हज़ार बायो-आधारित शोध स्टार्टअप्स बने हैं, जिनमें से अनेक को मिशन से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से फ़ायदा हुआ है।
BIRAC ने लगभग 100 ऐसे इनक्यूबेशन केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों ने साझा लैब सुविधाएँ प्रदान की हैं जहां छोटी बायोटेक कंपनियां और स्टार्टअप्स अपने प्रयोगों को सस्ते में और आसानी से संचालित कर सकते हैं। यदि ये न होता तो नई नई स्थापित की गई कंपनियों के लिए ऐसा करना बहुत महंगा पड़ता है। इनके साथ-साथ एनबीएम के समर्थन से स्थापित 25 विशेष शोध, प्रोटोटाइपिंग और पायलट स्केल बायो-मैन्युफैक्चरिंग सुविधाओं ने भी इस काम में मदद की है। स्टार्टअप्स ने विशेषज्ञ मार्गदर्शन, वित्तपोषण और नेटवर्किंग के अवसरों से भी लाभ उठाया है। यह सब ऐसे वातावरण में हुआ जो नवाचार को बढ़ावा देने और वैज्ञानिक खोजों को बाज़ार के लिए तैयार उत्पादों में बदलने के लिए बनाया गया है।
इनमें से कुछ सुविधाएँ पुणे के वेंचर सेंटर, बेंगलुरु के सी-कैम्प, विशाखापत्तनम के एएमटीजेड, आईआईटी कानपुर और पुणे के आईआरशा में उपलब्ध हैं।
जब अर्जुन अरुणाचलम इलेक्ट्रिकल इंजीनरिंग में डॉक्टरेट पूरी करने और एमआरआई फिज़िसिस्ट के रूप में विशेषज्ञता हासिल करके बाद भारत लौटे, तो उन्हें अपने उद्यम को शुरु करने के लिए टाटा ट्रस्ट से प्रारंभिक वित्तीय सहायता मिली। लेकिन वह मानते हैं कि मिशन से प्राप्त 12.4 करोड़ रुपये ही थे जिन्होंने उन्हें अपने विचार को अवधारणा से उत्पादन तक ले जाने में सक्षम बनाया।