भारत का कृषि क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है जिसने न केवल देश की लगभग आधी आबादी को रोज़गार दिया है बल्कि इसने खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका को सुनिश्चित किया है। 1960 के दशक में हुई हरित क्रांति के चलते भारत की कृषि व्यवस्था में व्यापक बदलाव आया, जहां कृषि के आधुनिक तौर-तरीकों और नई तकनीकों के प्रयोग से न केवल कृषि उत्पादकता में इज़ाफ़ा हुआ बल्कि भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता हासिल करने में सफ़ल हुआ।
हालांकि, वर्तमान में यह क्षेत्र कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे कि जलवायु परिवर्तन, संसाधनों की कमी और उन्नत तकनीक की आवश्यकता। भारत को आने वाले समय में कृषि से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए अभी से तैयारी करनी होगी जो कृषि में नवाचार और भविष्य में काम आ सकने वाले कौशल की मांग करती है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत में कृषि शिक्षा क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव की ज़रूरत है ताकि इसे क्षेत्र की बदलती ज़रूरतों के अनुरूप ढाला जा सके। लेकिन लंबे समय से इस क्षेत्र में आधुनिकीकरण की रफ़्तार धीमी रही है और इसके पाठ्यक्रम बाज़ार की बदलती मांगों के अनुरूप नहीं रहे हैं।
इसका परिणाम ये हुआ कि कृषि शिक्षा में स्नातक करने वाले युवाओं में समस्याओं की समाधान क्षमता और तकनीकी कौशल की कमी है जो उनके समक्ष मौजूद जटिल एवं बहुआयामी चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके अलावा, स्नातक स्तर के छात्र, ख़ासकर जो शहरी इलाकों के रहने वाले हैं, कृषि क्षेत्र को अध्ययन के रूप में चुनने से हिचकिचाते हैं क्योंकि उनकी धारणा थी कि यह क्षेत्र श्रम-प्रधान होने के साथ-साथ कम लाभदायक है।
जहां भारत को कृषि एवं संबंधित क्षेत्रों में अनुमानित 10,00,000 स्नातकों की ज़रूरत है, वहां फिलहाल आधे लोग ही उपलब्ध हैं। तमिलनाडु में पशु चिकित्सा की पढ़ाई कर रहे भारतीबन इस बात को स्वीकार करते हुए कहते हैं, “हम में से बहुत कम लोग हैं जिनके पास इतना कौशल है जो कृषि को मज़बूत और कारगर बना सकें।”