मुख्य कहानी15 सितंबर, 2025

तकनीकी शिक्षा ने की भारत के कृषि विश्वविद्यालयों की कायापलट

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विश्व बैंक और आईसीएआर

संक्षिप्त

  • भारत का कृषि क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है जिसने न केवल देश की लगभग आधी आबादी को रोज़गार दिया है बल्कि इसने खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका को सुनिश्चित किया है। फिर भी, इसे जलवायु परिवर्तन, संसाधनों की विपन्नता से लेकर आधुनिक प्रौद्योगिकी की ज़रूरत जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जबकि भारत को कृषि एवं संबंधित क्षेत्रों में क़रीब 10 लाख स्नातकों की आवश्यकता है, लेकिन वर्तमान में इसकी आधी संख्या ही उपलब्ध है।
  • इस अंतराल को भरने के लिए, भारत सरकार और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने विश्व बैंक के साथ मिलकर 2017 में राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (एनएएचईपी) की शुरुआत की। इस पहल ने 74 कृषि विश्वविद्यालयों को मज़बूत बनाया है, जहाँ पाठ्यक्रमों का आधुनिकीकरण किया गया है, डिजिटल और अनुभव आधारित शिक्षा की शुरुआत हुई है, और कार्यक्रमों को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढाला गया है।
  • 2017 से 2022 के बीच कृषि विश्वविद्यालयों में नामांकन में दोगुने से भी ज्यादा वृद्धि हुई। महिला भागीदारी 43.6 प्रतिशत से बढ़कर 45.2 प्रतिशत हो गई, जो लैंगिक समावेशिता की दिशा में हुई प्रगति को दर्शाता है। कुल मिलाकर, इस परियोजना से सीधे तौर पर कुल 8,26,761 शिक्षक और छात्र लाभान्वित हुए हैं जिनमें आधी संख्या महिलाओं (4,21,138) की थी।

भारत का कृषि क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है जिसने न केवल देश की लगभग आधी आबादी को रोज़गार दिया है बल्कि इसने खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका को सुनिश्चित किया है। 1960 के दशक में हुई हरित क्रांति के चलते भारत की कृषि व्यवस्था में व्यापक बदलाव आया, जहां कृषि के आधुनिक तौर-तरीकों और नई तकनीकों के प्रयोग से न केवल कृषि उत्पादकता में इज़ाफ़ा हुआ बल्कि भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता हासिल करने में सफ़ल हुआ।

हालांकि, वर्तमान में यह क्षेत्र कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे कि जलवायु परिवर्तन, संसाधनों की कमी और उन्नत तकनीक की आवश्यकता। भारत को आने वाले समय में कृषि से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए अभी से तैयारी करनी होगी जो कृषि में नवाचार और भविष्य में काम आ सकने वाले कौशल की मांग करती है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत में कृषि शिक्षा क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव की ज़रूरत है ताकि इसे क्षेत्र की बदलती ज़रूरतों के अनुरूप ढाला जा सके। लेकिन लंबे समय से इस क्षेत्र में आधुनिकीकरण की रफ़्तार धीमी रही है और इसके पाठ्यक्रम बाज़ार की बदलती मांगों के अनुरूप नहीं रहे हैं।

इसका परिणाम ये हुआ कि कृषि शिक्षा में स्नातक करने वाले युवाओं में समस्याओं की समाधान क्षमता और तकनीकी कौशल की कमी है जो उनके समक्ष मौजूद जटिल एवं बहुआयामी चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके अलावा, स्नातक स्तर के छात्र, ख़ासकर जो शहरी इलाकों के रहने वाले हैं, कृषि क्षेत्र को अध्ययन के रूप में चुनने से हिचकिचाते हैं क्योंकि उनकी धारणा थी कि यह क्षेत्र श्रम-प्रधान होने के साथ-साथ कम लाभदायक है।

जहां भारत को कृषि एवं संबंधित क्षेत्रों में अनुमानित 10,00,000 स्नातकों की ज़रूरत है, वहां फिलहाल आधे लोग ही उपलब्ध हैं। तमिलनाडु में पशु चिकित्सा की पढ़ाई कर रहे भारतीबन इस बात को स्वीकार करते हुए कहते हैं, “हम में से बहुत कम लोग हैं जिनके पास इतना कौशल है जो कृषि को मज़बूत और कारगर बना सकें।”

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इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने विश्व बैंक के सहयोग से 2017 में राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (एनएएचईपी) की शुरुआत की। इस महत्वाकांक्षी योजना का उद्देश्य देशभर के कृषि विश्वविद्यालयों को आधुनिकीकरण और सुदृढ़ीकरण करना था। जिससे छात्रों में कौशल, ज्ञान और उद्यमशीलता की भावना विकसित की जा सके और वे बदलते समय के साथ क्षेत्र से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर सकें।   इस परियोजना का लक्ष्य कृषि शिक्षा को मज़बूत, प्रासंगिक एवं महत्वाकांक्षी बनाना था ताकि कृषि क्षेत्र को उत्पादक और लाभकारी होने के साथ-साथ जलवायु के अनुकूल भी बनाया जा सके।

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सुधार की शुरुआत

इस परियोजना के तहत आईसीएआर ने देश के 74 कृषि विश्वविद्यालयों को वैश्विक मानकों के अनुरूप पुनर्गठित किया है। यहां पाठ्यक्रमों में व्यापक बदलाव करते हुए पढ़ाई के नए तौर-तरीके अपनाए गए हैं, डिजिटल शिक्षा को जगह दी गई है और भविष्य को ध्यान रखकर कक्षाएं शुरू की गई हैं।

अब ये विश्वविद्यालय बहुविषयक दृष्टिकोण अपना रहे हैं और छात्रों में ऐसे कौशल के विकास पर ज़ोर दे रहे हैं जो इस परिवर्तनशील उद्योग की ज़रूरतों के साथ सामंजस्य बिठा सके।

600 से अधिक नए, बाज़ार-केंद्रित पाठ्यक्रम तैयार किए गए हैं, जिनमें उद्यमशीलता, कृषि-व्यवसाय विश्लेषण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स और प्रिसिजन एग्रीकल्चर जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है। साथ ही, 79 विषयों को इस तरह से नया रूप दिया गया है कि वे छात्रों को एक प्रतिस्पर्धी और आधुनिक दुनिया के लिए तैयार करें।

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प्रयोगशालाओं के माध्यम से छात्रों को दी जा रही शिक्षा

छात्रों को अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में प्रशिक्षित किया जा रहा है, जहां वे जीपीएस, ड्रोन और रिमोट सेंसिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करना सीख रहे हैं। छात्रों को यह प्रशिक्षण निजी क्षेत्र के सहयोग से दिया जा रहा है ताकि छात्रों में रोज़गार के लिए उपयुक्त कौशल का विकास किया जा सके।

25 वर्षीय गायत्री ने कोयंबटूर के तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय से स्नातक किया है जो बड़े गर्व के साथ अपनी शिक्षा के बारे में बात करती हैं, “मैंने ड्रोन तकनीक और उसके कृषि अनुप्रयोगों के बारे में सीखा। साथ ही, मुझे यह भी पता चला कि ड्रोन को कैसे चलाया जाता है और कैसे उसका इस्तेमाल कीटनाशक और उर्वरक छिड़काव में किया जा सकता है।” आज गायत्री बतौर विशेषज्ञ ड्रोन तकनीक के प्रशिक्षक के रूप में काम कर रही हैं, लेकिन उनका सपना है कि एक दिन वह खुद उद्यमी बनें। आत्मविश्वास से भरी गायत्री कहती हैं, “मैं ड्रोन उद्योग में अपना व्यवसाय शुरू करना चाहती हूं।”

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कई विश्वविद्यालयों ने वर्चुअल कक्षाओं की भी स्थापना की है, ताकि पारंपरिक शिक्षा को ऑनलाइन शिक्षा से जोड़ा जा सके। ऑनलाइन शिक्षा कम लागत में अधिक से अधिक लोगों को शिक्षित करने का एक सशक्त माध्यम है। इसके कारण दूरदराज़ इलाकों के छात्रों को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों से शिक्षा हासिल करने का मौका मिला है। ऑनलाइन वे ऐसे आयोजनों का हिस्सा बन पाते हैं जहां वे सामान्य परिस्थितियों में कभी हिस्सा नहीं ले पाते।

असम के एक ग्रामीण क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाली 23 वर्षीय छात्रा कविता बताती हैं कि कैसे दूरस्थ शिक्षा ने उन्हें नए कौशल सीखने में मदद की। वह कहती हैं, “अब मैं सैटेलाइट तस्वीरों को समझ सकती हूं और घर बैठे ही ड्रोन चला सकती हूं। इससे किसानों को खाद एवं जल संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद मिलती है, जिससे संसाधनों की बचत भी होती है और फ़सलों की सुरक्षा भी।” कविता असम में कृषि के भविष्य को लेकर आशावान हैं जिसे लेकर उनका कहना है कि यहां एक नई हरित क्रांति की संभावनाएं मौजूद हैं।

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तमिलनाडु में वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेज़ यूनिवर्सिटी के छात्र भारतीबन का मानना है कि तकनीकी प्रगति ने पशु विज्ञान के क्षेत्र में अवसरों को बढ़ावा दिया है। वह कहते हैं, “डिजिटल सिमुलेशन मॉडल्स की मदद से मैं पशु-चिकित्सा से जुड़े ऐसे तकनीकी अभ्यास कर पाता हूं जो पहले छात्रों की पहुंच से बाहर थे। इन अनुभवों से मुझे इतना आत्मविश्वास मिला है कि मैं उन वास्तविक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम  हूं जिससे हमारे किसान जूझ रहे हैं।”

विश्वविद्यालयों ने छात्रों को विकास के नए मंच प्रदान किए हैं, जहां उन्हें विदेश में इंटर्नशिप करने का मौका मिल रहा है। तमिलनाडु के तंजावुर ज़िले के रहने वाले प्रगदीश बायोटेक्नोलॉजी से एमएससी कर रहे हैं और उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूकैसल में अपनी इंटर्नशिप पूरी की है। वह कहते हैं, “मुझे हमेशा से वैज्ञानिक शोध और नवाचार में दिलचस्पी रही है ताकि प्रौद्योगिकी के बेहतर उपयोग से छोटे और सीमांत किसानों को लाभ पहुंचाया जा सके।” प्रगदीश की तरह अन्य छात्रों को भी जापान, इज़राइल, सऊदी अरब, जर्मनी जैसे देशों में प्रशिक्षण कार्यक्रमों और इंटर्नशिप में हिस्सा लेने का मौका मिला है।

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सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन विश्वविद्यालयों ने छात्रों के मन में कृषि को लेकर उनके दृष्टिकोण में बदलाव किया है। उत्तराखंड के पंतनगर में जीबी पंत कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की स्नातक वर्तिका गुप्ता कहती हैं, “अब मुझे समझ में आया है कि कृषि सिर्फ फ़सल और पशुपालन तक सीमित नहीं है। इसका संबंध खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और सतत जीवनशैली से जुड़ी चुनौतियों से भी है।”

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स्टार्ट-अप संस्कृति का विकास

इस परियोजना ने विश्वविद्यालयों को इन्क्यूबेटर स्थापित करने में भी मदद की है, ताकि छात्रों में उद्यमशीलता की भावना को बढ़ावा दिया जा सके। इन इन्क्यूबेटरों की मदद से छात्रों ने 120 से अधिक कृषि स्टार्टअप शुरू किए हैं, जिनसे कृषि क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा मिला है, रोज़गार के नए अवसर पैदा हुए हैं और कई नवाचारपूर्ण समाधान सामने आए हैं।

उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु के त्रिची शहर में रमेश और उनके दोस्तों ने मिलकर एक फ़र्म की शुरुआत की, जो सीधे किसानों से कृषि उत्पाद ख़रीद कर उनकी ग्रेडिंग के बाद 25 से अधिक संस्थानों को उनकी आपूर्ति करती है। यह फ़र्म 100 से अधिक किसानों से सीधा जुड़ी हुई है। रमेश कहते हैं, “मुझे गर्व है कि एडापड्डी गांव में कृषि उद्यम की शुरुआत करने वाले हम पहले लोग हैं। हमने पांच कृषि स्नातकों को नौकरी दी है और 20 अन्य लोगों को रोजगार भी मुहैया कराया है।” रमेश के एग्री-बिज़नेस वेंचर का वार्षिक कारोबार 2.5 करोड़ रुपये है। उनका लक्ष्य पूरे तमिलनाडु में अपने उत्पादों की आपूर्ति करना है ताकि वह अपने वार्षिक कारोबार को बढ़ाकर 30 करोड़ रुपये कर सकें। वह अन्य कृषि स्नातकों को भी अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

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परिवर्तन की लहर

यह परिवर्तन पहले ही स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। असम, उड़ीसा और कर्नाटक में हाल ही में किए गए आईसीएआर–विश्व बैंक सर्वेक्षण में पाया गया कि 75 से 94 प्रतिशत छात्र अब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई), मशीन लर्निंग, जीआईएस और अन्य डिजिटल उपकरणों को आधुनिक कृषि के लिए मूलभूत कौशल मानते हैं।

विश्व बैंक के वरिष्ठ अर्थशास्त्री बेकज़ोद शम्सिएव और वरिष्ठ कृषि व्यापार विशेषज्ञ फ़रबोद यूसुफ़ी, जो इस परियोजना का नेतृत्व कर रहे हैं, बताते हैं, “छात्र अब बीमारी की शुरुआती पहचान, रिमोट सेंसिंग एग्रीकल्चर और आपूर्ति श्रृंखला को पारदर्शी बनाने के लिए एआई जैसी तकनीकों का व्यावहारिक इस्तेमाल कर रहे हैं।” वे यह देखकर प्रसन्न हैं कि “व्यावहारिक एवं तकनीकी शिक्षा के माध्यम से न केवल छात्रों को अत्याधुनिक कौशल सीखने का मौका मिला है, बल्कि यह भारत में कृषि शिक्षा में बुनियादी परिवर्तन लेकर आया है। इससे आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था की ज़रूरतों के मुताबिक कृषि क्षेत्र को और गतिशील एवं प्रासंगिक बनाने में योगदान दे रही है।"

सदाबहार क्रांति की ओर बढ़ते कदम

एनएएचईपी के राष्ट्रीय निदेशक और पूर्व डीडीजी (कृषि शिक्षा) आर. सी. अग्रवाल कहते हैं, “इस परियोजना ने भारत में कृषि शिक्षा के लिए एक नया मानक स्थापित किया है, जिससे इस क्षेत्र को युवाओं के लिए और अधिक प्रासंगिक, कौशल-प्रधान एवं आकर्षक बनाया है। आधुनिक कौशल से लैस नई पीढ़ी नवाचार को बढ़ावा दे रही है और भारत की आर्थिक वृद्धि तथा सतत विकास लक्ष्यों में योगदान दे रही है।”

जैसे-जैसे भारत तकनीक की बदलने वाली शक्ति का उपयोग कर रहा है और डिजिटल, खाद्य-सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे कविता, भारथीबन, गायत्री, रमेश और कई अन्य छात्र देश में एक नई कृषि क्रांति की नींव तैयार कर रहे हैं।

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प्रभाव

  • 2017 से 2022 के बीच कृषि विश्वविद्यालयों में नामांकन में दोगुने से भी ज्यादा वृद्धि हुई, जो 2017 में 25,000 से बढ़कर 2022 में 54,000 हो गया।
  • महिला छात्रों की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की गई जो 43.6 प्रतिशत से बढ़कर 45.2 प्रतिशत हो गई है। इससे कृषि शिक्षा में बढ़ती समावेशिता को दर्शाता है।
  • समय पर पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। 2017 के लिए यह आंकड़ा 77.6 प्रतिशत था जो 2024 में 96.1 प्रतिशत हो गया है। महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा सर्वाधिक (96.2 प्रतिशत) है।
  • स्नातक के बाद रोज़गार हासिल करने वाले छात्रों की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की गई है, जो 2017 में 42 प्रतिशत की दर से बढ़कर 2024 में 67 प्रतिशत हो गई है। महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 71.1 प्रतिशत है।
  • कृषि विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने वालों छात्रों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। 2017 में प्रवेश के लिए न्यूनतम 26 प्रतिशत की आवश्यकता होती थी, जो 2024 में बढ़कर 41.8 प्रतिशत हो गई।
  • कृषि विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की गुणवत्ता एवं क्षमता में भी बढ़ोतरी हुई है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने बीते सालों में कितने शोध अनुदान हासिल किए हैं। जहां 2017-18 में ये संख्या सिर्फ़ 28 थी, जो 2023-24 में बढ़कर 444 हो गई।
  • इस परियोजना से 826,761 लोगों को प्रत्यक्ष लाभ हुआ है जिसमें शिक्षक और छात्र दोनों शामिल हैं और इनमें लगभग आधी संख्या महिलाओं (421,138) की है।

मिलिए गायत्री टी. से, जो टीएनएयू, कोयंबटूर की बीएससी (ऑनर्स) कृषि छात्रा हैं, जिनका करियर एनएएचईपी द्वारा समर्थित ड्रोन पायलट प्रशिक्षण कार्यक्रम की बदौलत उड़ान भर पाया।

मिलिए सलेम के कृषि गाँव के रमेश से, जिन्होंने एनएएचईपी के तहत अपनी पढ़ाई के दौरान अपने जुनून को एक सफल कृषि व्यवसाय में बदल दिया।

मिलिए कश्मीर के खालिद से, जिनका औषधीय पौधों से बने कैंसर-रोधी स्वास्थ्य पूरक विकसित करने वाला स्टार्टअप एनएएचईपी द्वारा समर्थित है।

 

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