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मुख्य कहानी

कन्ट्री प्रोग्राम स्ट्रेटेजी (सीपीएस) सलाह, नागरिक सामाजिक संगठनों के साथ: रायपुर, छत्तीसगढ - मई 23, 2012

14 सितम्बर, 2012

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प्रतिक्रिया और सलाह को निम्न ईमेल पते पर भेजा जा सकता है: consultationsindia@worldbank-org

स्थानः रायपुर, छत्तीसगढ

दिनांकः 23 मई, 2012

प्रतिभागीः सूची

चर्चा के प्रमुख बिन्दुः

प्रतिभागियों ने राज्य संबंधी कुछ जटिल मुद्दों को लेकर बात की. इसमें शामिल थी कृषि की दयनीय दशा और वनों पर आधारित जनता,प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और उद्योगों को जल की आपूर्ति, भूमि का नामांतर्ण और शिक्षा की सुविधाएं, साथ ही सरकारी कार्यक्रमों संबंधी अमलीकरण और अन्य परिस्थितियां

प्रतिभागियों ने ये भी बताया कि कुछ माओ दबाव वाले क्षेत्र जैसे दक्षिण बस्तर आदि में एनजीओ सीएसओ को काम करने में परेशानी होती है. ये भी देखा गया है कि इस प्रकार के संगठनों की कमान स्थानीय लोगों के हाथों में थी और इसका प्रभाव कल्याण व विकास के कामों पर विपरीत ही पडा.

प्रतिभागियों ने ये महसूस किया कि विश्व बैंक राज्यों को निम्न प्रकार के क्षेत्रों में मदद कर सकती हैः

कृषि से संबंधित ढांचागत विकास जैसे भन्डारण, ग्रामीण सडकें, कम लागत पर सिंचाई, धन संबंधी सुविधाएं, मार्केटिंग में मदद आदि.

सरकारी योजनाओं को लेकर जागरुकता अभियान और धन संबंधी स्थितियों में सुधार व पारदर्शिता.
सरकारी कार्यक्रमों का विकास में योगदान जिसमें सेवा प्रदान करना शामिल है

चर्चा का विस्तार

माओ प्रभावित क्षेत्रों में काम करने संबंधी चुनौतियां

यह चर्चा उस प्रतिभागी की बात से शुरु हुई जिसमे ये पूछा कि क्या विश्व बैंक के पास खास तौर पर माओ प्रभावित क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ संबंधी कोई योजना है, चूंकि बैंक निचले और निर्जन स्थानों के लिए काम करना चाहता है. उस प्रतिभागी ने बताया कि इस प्रकार के क्षेत्रों में काम करने वाले एनजीओ (छत्तीसगढ में बस्तर और दन्तेवाडा) को समस्याओं का सामना करना होता है, खासकर नवीन नियम जो जन सुरक्षा से संबंधित होते हैं.

इसी बिन्दु को अन्य प्रतिभागी ने भी विस्तार से बताया और उदाहरण भी दिये कि किस प्रकार से अधिकारियों द्वारा माओ प्रभाविक क्षेत्रों में काम करने वाले एनजीओ को सहनुभूतिपूर्ण तरीके से देखा जाता है. ये भी बताया गया कि वे अभियान जिनमें जनजातियों के अधिकार और क्षमता विकास संबंधी कार्य किये जाने थे, अथवा वे व्यक्ति जिन्हे उनके वन संबंधी जनजातीय वैधानिक अधिकार नही मिले हैं, उनके संबंध में किये जाने वाले कामों को ठंडी प्रतिक्रिया मिली है. प्रतिभागियों को अनेक बार शोषण और पूछताछ का सामना करना पडा है और अनेक बार कानूनी एजेन्सियों के समक्ष उपस्थित रहना पडा है. गरीब जनजातियों के अधिकारों को लेकर वन विभाग का रवैया सहानुभूतिपूर्ण नही रहा है. ये भी बताया गया कि विश्व बैंक द्वारा राज्य के इन प्रयासों में मदद की गई लेकिन प्रतिभागियों को ये महसूस होता है कि राज्य सरकार द्वारा जो नीतियां अपनाई गई, उनमें खराबी है और वे कृषक विरोधी है जिससे यहां पर ईंधन के लिए जत्रोफा उगाने पर जोर दिया जाता है और खाद्यान्न और नकदी फसलों पर नही.

कृषि और जनजीवन सुरक्षा को लेकर मुद्दे

ये बताया गया कि राज्य में तीन ईको झोन्स हैं, उत्तरी झोन जिसमें जंगल है और यह खनिज से भरपूर है (यह राज्य का 21 प्रतिशत क्षेत्र है) यह छत्तीसगढ पठार जो वन संपदा से भरपूर है और पारंपरिक रुप से कृषि प्रधान है, साथ ही यहां पर पावर प्लान्ट्स की स्थिति उत्तम है (52 प्रतिशत ) और बस्तर क्षेत्र जहां पर 50 प्रतिशत जंगल है और ये क्रांति क्षेत्र के अंतर्गत आता है.

अनेक प्रतिभागियों ने इस बात पर जोर दिया कि खाद्य सुरक्षा, सिंचाई की सुविधाओं में कमी और उत्पादकता की कमी, ये प्रमुख मुद्दे हैं जिनपर मदद की आवश्यकता है, खासकर वे कृषक जिनके पास जमीनों की बहुतायत है, वे मानसून कृषि पर निर्भर हैं.

एक प्रतिभागी ने बताया कि प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति उत्तम होने से राज्य को वनों पर निर्भर जनता की सुरक्षा हेतु उपाय करने चाहिये. औद्योगिकीकरण के विकास के चलते खेती और जल उद्योग की जमीनों को बदला जा रहा है. इसके आगे कृषि क्षेत्र पर खराब भन्डारण सुविधाओं और सडक मार्ग से जुडाव की कमी की मार पड रही है और यही कारण है कि कई स्थानों पर फसल पडे पडे ही खराब हो जाती है.

एक प्रतिभागी ने बताया कि अनेक बार जनता की सुनवाई और रैलियों में विरोध किये जाने के बावजूद सरकार द्वारा तय विकास प्रकल्पों पर काम किया जा रहा है. उदाहरण के लिए 40 पावर प्लांट जंजगीर जिले में आ रहे हैं. इस प्रकार से अनेक कृषकों को उनकी जमीनों से हाथ धोना पडा और उन्हे पैसों में मुआवजा तो मिला लेकिन सही रोजगार नही मिला. पुनर्वास को और अधिक सही तरीके से और अर्थपूर्ण बनाया जाना चाहिये. इसके साथ ही नवीन बांध भी जंजगीर क्षेत्र में आ रहा है जो महानदी और हासदेव नदियों पर है और इसका प्रमुख लक्ष्य पावर प्लान्ट्स को जल आपूर्ति करना है (कृषि नही) लेकिन इससे वर्षा के समय में बाढ आने का खतरा है जिससे आस पास के कृषि क्षेत्रों के प्रभावित होने की स्थिति बन सकती है.

विश्व बैंक कहां और कैसे काम कर सकती है.

इस प्रश्न पर कि विश्व बैंक कहां सहभाग कर सकती है, एक प्रतिभागी ने सुझाया कि राज्य को कृषि और वनों पर ध्यान देने की जरुरत है, खासकर छोटे वन उत्पादों पर. यहां पर इससे संबंधित प्रकल्पों पर ध्यान देने की जरुरत है जिससे वन संबंधी उत्पादों का उत्पादन बढेगा और इन्हे बाजार से भी जोड जा सकेगा.

कृषि के लिए ढांचा

यह एक सामान्य समझ है कि जिन राज्यों में सरकारी योजनाओं संबंधी उपयोग या अमलीकरण की स्थिति कमजोर है, विकास के क्षेत्र में उनकी स्थिति चिंताजनक है. इस बारे में एक सलाह प्रदान की गई है कि जिस प्रकार से रोजगार गारंती कार्यक्रम जैसे नरेगा का इस्तेमाल निजी संपत्तियों का उपयोग करने के लिए किया जा सकता है. एक प्रतिभागी द्वारा ये भी बताया गया कि इस प्रकार के कार्यक्रमों में भुगतान समय पर नही होता और बहुत ज्यादा देर से होता है साथ ही इन्हे सुलझाने में बहुत ज्यादा प्रयास करने होते हैं. इस बात पर भी आम सहमति दिखाई दी कि छत्तीसगढ क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम है और आधारभूत सुविधाएं जैसे पानी, सडक और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है. लेकिन अधिकांश वक्ताओं ने यहां के कृषि और वन क्षेत्र का समर्थन किया और इसके लिए भोजन सुरक्षा और राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग करने पर जोर दिया. यहां एक सलाह दी गई कि विश्व बैंक द्वारा ढांचागत विकास में योगदान दिया जा सकता है और यहां पर कृषि संबंधी और पिछडे क्षेत्रों में कृषि आधारित ढांचागत विकास में योगदान दिया जाए.

स्थानीय सरकार के मुद्दे और महिला सशक्तिकरण

स्थानीय सरकारी स्थिति संबंधी प्रश्नों पर अनेक प्रतिभागियों ने कहा कि पंचायती राज संस्थानों में क्षमता विकास की जरुरत है और यही कारण है कि अनेक क्षेत्रों में उपलब्ध धन का भी उपयोग नही हो पा रहा है. यहां तक कि ग्राम सभा स्तर पर बनाए जाने वाली विकास योजनाओं को जिला अधिकारियों द्वारा रद्द कर दिया जाता है क्योंकि उनमें तकनीकी त्रुटियां होती है. निचले स्तर की नौकरशाही को भी प्रशिक्षण की आवश्यक्ता है. पंचायती राज संस्थानों में महिलाओं का प्रतिभाग बढा है लेकिन स्वतंत्र होकर महिलाओं का पंचायतों में अपना स्थान बनाना अभी भी स्वीकार्य नही है. एक प्रतिभागी ने बताया कि सामान्य लोगों में आज भी ग्राम सभा के महत्व को लेकर जागरुकता अभाव है और स्थानीय ग्राम सभा की बैठकों में भी उपस्थिति भी काफी कम होती है. इसका अर्थ ये है कि पीआरआई के आधारभूत प्रकार को सही तरीके से नियोजित नही किया गया है.

लिंगभेद और आवाज उठाने के मुद्दे पर, अधिकांश द्वारा ये महसूस किया गया कि एनजीओ काफी सफल है और उनके द्वारा लोगों और अधिकारियों के मत लिये जाते हैं लेकिन उनका प्रभाव सीमित है. एक प्रतिभागी ने एक रोचक प्रकार के बारे में बतायाः अधिकांश गरीब और पिछडी जाति की महोलाओं को डायन माना जाता है और ये स्थानीय समुदाय में अंधविश्वासों के कारण होता है, साथ ही उन्हे उनकी सुरक्षा कर पाने वाले अधिकारियों से भी काफी कम सुरक्षा मिल पाती है. यही कारण है कि ग्राम स्तर पर महिला सशक्तिकरण को वास्तव में लागू करने के लिए काफी बडे स्तर पर काम करने की आवश्यकता है. दूसरा मुद्दा इसमें अप्रतिनिधित्व और बिना किसी संगठनात्मक स्वरुप से सामने आया, कि एटीएम पर सुरक्षा डूटी देने वाले कर्मियों को उनके ठेकेदारों से शोषित होना पडता है.

दूसरा बिन्दु उठाया गया, वह था विकेन्द्रित नियोजन में आधारभूत आधिकारिक आंकडों को प्राथमिक तौर पर उपलब्ध नही होना जैसे जनसंख्या और स्थान संबंधी. इस कारण से किसी भी प्रकार के विकासात्मक प्रकल्प को लागू करने में परेशानी होती है. इसके साथ ही सरकार द्वारा कोई जागरुकता प्रदान नही की गई है जिससे वर्तमान पंचायती राज कानून और जटिल मुद्दो जैसे जनजातीय वनाधिकार 2006 आदि के अंतर्गत कोई जागरुकता अभियान नही चलाया जा रहा है. ये निरंतर आधार पर आवश्यक है, सिर्फ एक या दो वषोर्ं तक नही. अनेक प्रतिभागियों ने ये भी महसूस किया कि ये प्रमुख क्षेत्र हैं जहां पर विश्व बैंक ध्यान देकर तकनीकी मदद और विशेष सहयोग कर सकती है.

शिक्षा और स्वास्थ संबंधी मुद्दे

एक प्रतिभागी का कहना था कि गलत नीतियों और उनके अमल के कारण निम्न स्तरीय शिक्षा की स्थिति बन रही है. सर्वेक्षणों में ये पाया गया है कि ग्रामीण स्कूलों में बच्चे स्कूलों में सिर्फ मध्यान्ह भोजन के लिए जाते हैं. कक्षा 5 तक अपने आप उत्तीर्ण होकर अगली कक्षा में जाने की योजना से विद्यार्थियों का मन पढाई से दूर हो जाता है. यही कमजोरी आगे चलकर माध्यमिक और हायर सेकन्डरी स्तर पर सामने आती है. स्वास्थ्य और पोषण संबंधी समस्याएं भी सामने लाई गई जिसमें आंतरिक क्षेत्रों में स्थित गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं और दवाईयां आदि नही मिल पाती है. एक अन्य प्रतिभागी ने बताया कि शारीरिक रुप से विकलांग लोगों को सरकारी नीतियों का लाभ नही मिल पाता है और उन्हे रोजगार और प्रशिक्षण के सही अवसर नही मिलते. एक तथ्य पर एकमत पाया गया कि बैंक द्वारा सरकारी योजनाओं संबंधी जागरण का काम किया जा सकता है और विविध स्तरो पर क्षमता विकास का काम किया जा सकता है. सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमों संबंधी ध्यान देना और उनका आकलन भी आवश्यक है.

विश्व बैंक की प्रतिक्रिया

विश्व बैंक द्वारा इस संबंध में प्रतिक्रिया दी गई है कि वे आंतरिक और निर्जन क्षेत्रों में काम करने के इच्छुक है भले ही वे क्षेत्र माओ प्रभावित हो. विश्व बैंक, जो एक विकास एजेन्सी है, उनके द्वारा पजले विकासात्मक कार्य किये जाएंगे. यहां पर ये भी बताया गया कि समुदाय का सहभाग, ग्राम स्तर पर प्रशिक्षण, रिमोट मॉनिटरिंग सिस्टम और स्थानीय रोजगार के अवसर संबंधी कुछ प्रकल्पों के लिए बैंक द्वारा सुविधाएं प्रदान की जाएंगी. ये भी बताया गया कि स्थानीय समुदाय को नियोजन की स्थिति में स्वयं शामिल होना होगा और किसी भी प्रस्तावित बैंक प्रकल्प में उनके प्रयास भी शामिल होंगे जिससे अमलीकरण किया जा सके. तथ्यात्मक रुप से देखें तो बैंक के पास पहले से अपने विकासात्मक प्रकल्पों को लेकर सिद्धांत हैं, जिनमें से अधिकांश को बडे पैमाने पर लागू किया गया है.

आगे ये भी कहा गया कि छत्तीसगढ विश्व बैंक के लिए एक महत्वपूर्ण शहर है. बैंक राज्य सरकार के साथ इस प्रकार के प्रकल्पों के लिए सहभागिता करेगी और इनके आकलन के लिए सबसे प्रभावी उपायों को स्थापित करेगी.


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