BRIEF 19 मार्च, 2026

जल: रोजगार और समृद्धि का स्रोत

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फोटो आभार: विश्व बैंक समूह


संक्षिप्‍त विवरण 

भारत की जनता के कल्याण और देश के विकास के लिए जल सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। जल पर निर्भर क्षेत्र आर्थिक मूल्यवर्धन में लगभग आधा योगदान देते हैं और लगभग 70प्रतिशत कार्यबल को रोजगार प्रदान करते हैं, जिससे जल भारत की अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण के लिए केंद्रीय महत्व रखता है। इन सब से यह स्पष्ट होता है कि जल केवल इस्तेमाल किया जाने वाला एक संसाधन नहीं, बल्कि एक मुख्य आर्थिक संपत्ति है। इसलिए, जल सिर्फ एक साधन नहीं है बल्कि एक बुनियादी आर्थिक पूंजी है—जो रोजगार पैदा करता है, उन्हें संभव बनाता है और उन्हें सुरक्षित रखता है।

विश्व की 18 प्रतिशत आबादी भारत में है, लेकिन जल संसाधन केवल 4 प्रतिशत के बराबर हैं। वर्षा मौसम के हिसाब से बदलती रहती  है; लगभग 70 प्रतिशत वर्षा केवल तीन महीनों में होती है। वर्ष 1970 के बाद बढ़ती जनसंख्या के कारण, प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता आधी हो गई है। लगभग 60 करोड़ लोग जल संकट का सामना कर रहे हैं, जबकि जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़ और सूखे दोनों की आवृत्ति बढ़ रही है।

बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिक वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के कारण दुर्लभ जल संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा तीव्र हो रही है। अनुमान है कि  वर्ष  2050 तक भारत के शहरों में अतिरिक्त 41.6 करोड़ लोग बस जाएंगे, जिससे पहले से ही अत्यधिक दबाव में चल रही नगरपालिका जल प्रणालियों पर भारी दबाव पड़ेगा।

भारत की केंद्र और राज्य सरकारें पेयजल और स्वच्छता की पहुंच बढ़ाने, सिंचाई व्यवस्था को आधुनिक बनाने, जल अवसंरचना को मजबूत करने और जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने के लिए महत्वाकांक्षी कार्यक्रम लागू कर रही हैं। अगला कदम आधारभूत संरचना निर्माण से आगे बढ़कर लोगों को विश्वसनीय सेवाएं प्रदान करना, जल संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग करना और सुदृढ़ शासन एवं वित्तपोषण के माध्यम से जल उपयोगिताओं को अधिक मजबूत बनाना है।


 

विश्व बैंक सहायता

विश्व बैंक समूह (डब्ल्यूबीजी) भारत के जल सुरक्षा में सुधार के प्रयासों का समर्थन कर रहा है क्योंकि देश 2047 तक एक पूर्ण विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में काम कर रहा है।

विश्व बैंक समूह (डब्ल्यूबीजी) और भारत की सहभागिता वर्ष 2026-31 के लिए उसके कंट्री पार्टनरशिप फ्रेमवर्क पर आधारित है और उसकी वैश्विक जल रणनीति, वाटर फॉरवर्ड द्वारा मार्गदर्शित है।

यह रणनीति तीन स्तंभों पर आधारित है - लोगों के लिए जल, भोजन के लिए जल और ग्रह के लिए जल - जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक विश्व भर में 40 करोड़ लोगों के लिए जल सुरक्षा में सुधार करना है।

इस वैश्विक महत्वाकांक्षा को पूरा करने में भारत की केंद्रीय भूमिका है।  विश्व बैंक समूह (डब्ल्यूबीजी) भारत कार्यक्रम वित्त वर्ष 2025-30 के दौरान 10 करोड़ लोगों के लिए जल सुरक्षा बढ़ाएगा, जो वैश्विक लक्ष्य का लगभग 25 प्रतिशत है।


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फोटो आभार: विश्व बैंक समूह


लोगों के लिए जल 

सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता और साफ-सफाई की सार्वभौमिक पहुंच को गति 

भारत ने जल जीवन मिशन, अमृत और स्वच्छ भारत जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को पेयजल और स्वच्छता की बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने के लिए बड़े निवेश किए हैं।

बुनियादी ढांचे के विस्तार ने नींव तो रख दी है, लेकिन अगला कदम यह सुनिश्चित करना है कि नागरिकों को विश्वसनीय जल आपूर्ति और स्वच्छता सेवाएं मिलें । इसे प्राप्त  करने के लिए, सभी स्तरों पर जल एजेंसियों को पेशेवर रूप से प्रबंधित और जवाबदेह बनाने की आवश्यकता होगी (विशेष रूप से बेसिन और राज्य स्तरों पर) और नियामक क्षमता को मजबूत करने की आवश्यकता होगी । 

इंडोनेशिया, कंबोडिया, ब्राजील, चिली और केन्या जैसे देशों ने यह दिखाया है कि प्रदर्शन से जुड़े प्रोत्साहन, अधिनियम और वित्तपोषण से जल सेवाओं में परिवर्तन लाया जा सकता है।

भारत में, विश्व बैंक देश को बुनियादी ढांचे के निर्माण से हटकर ग्रामीण और शहरी दोनों निवासियों को विश्वसनीय, कुशल और ग्राहक-उन्मुख सेवाएं प्रदान करने की दिशा में आगे बढ़ने में मदद कर रहा है, साथ ही संस्थानों को मजबूत करने और उनके प्रदर्शन और जवाबदेही में सुधार करने में भी सहायता कर रहा है।

व्यवसायिक सेवा प्रदाताओं का निर्माण: शिमला में, विश्व बैंक ने हिमाचल प्रदेश सरकार को शहर की जल आपूर्ति के प्रबंधन को सरकारी विभाग से हटाकर एक पेशेवर रूप से संचालित, स्वायत्त संस्थान- शिमला जल प्रबंधन निगम लिमिटेड - को सौंपने में सहायता प्रदान की, जिसमें वित्तीय स्वायत्तता, मीटर आधारित बिलिंग और जवाबदेही पर विशेष ध्यान दिया गया। अब स्वतंत्र प्रयोगशालाओं द्वारा जल की गुणवत्ता की निरंतर निगरानी की जाती है, व्‍यय की गई धनराशि की  प्राप्‍ति (लागत वसूली) में काफी सुधार हुआ है, और आगे के सुधार जारी हैं, जो अन्य भारतीय शहरों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करते हैं।

कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में, विश्व बैंक ने ग्राम-स्तरीय जल आपूर्ति प्रणालियों के मजबूत संचालन और रखरखाव की दिशा में आगे बढ़ने में मदद की । उत्तराखंड के तटीय-शहरी क्षेत्रों में भी इसी तरह के दृष्टिकोण से कम से कम 16 घंटे दबावयुक्त जल आपूर्ति लगभग सभी घरों को प्रतिदिन प्राप्त हुई है।

चौबीसों घंटे जल आपूर्ति की शुरुआत और विस्तार: कर्नाटक राज्य जल आपूर्ति और स्वच्छता क्षेत्र में राज्यव्यापी नीतिगत सुधार कर रहा है। 2005 में, विश्व बैंक के सहयोग से, तीन मध्यम आकार के शहरों ने अनुभवी निजी ऑपरेटरों को यह प्रदर्शित करने के लिए नियुक्त किया कि भारतीय शहरों में चौबीसों घंटे निरंतर, दबावयुक्त जल आपूर्ति संभव है। पिछले डेढ़ दशक में, इन शहरों के प्रदर्शन क्षेत्रों में 2 लाख से अधिक लोगों को चौबीसों घंटे जल आपूर्ति प्राप्त हुई है। ये शहर अब चौबीसों घंटे जल आपूर्ति को पूरे शहर में विस्तारित करने के लिए जल कंपनियों की स्थापना कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में, विश्व बैंक 500 गांवों में चौबीसों घंटे जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए राज्य का समर्थन कर रहा है। इन सब में विश्व बैंक द्वारा वित्तपोषित जल आपूर्ति पहलों का मुख्य ध्यान सतत संचालन और रखरखाव पर है।


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फोटो आभार: विश्व बैंक समूह


भोजन के लिए जल

खाद्य उत्पादन बढ़ाना और किसानों की आजीविका में सुधार 

भारत में कृषि द्वारा 80-90 प्रतिशत जल की खपत होती है - जो चीन या ब्राजील की तुलना में दो से तीन गुना अधिक है।

किसानों के लिए भूजल सामान्यतः सिंचाई का प्रमुख स्रोत बन गया है। हालांकि, भूजल के अस्थिर उपयोग से कई क्षेत्रों में इस बहुमूल्य संसाधन का व्यापक रूप से दोहन हो रहा है।

सतही और भूजल दोनों का समग्र प्रबंधन आवश्यक है। नहरों का उन्नयन, ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर में निवेश और डिजिटल उपकरणों का उपयोग किसानों को प्रति बूंद अधिक फसल प्राप्त करने में मदद कर सकता है। साथ ही, जल निकासी को सीमित करना, रिमोट सेंसिंग के माध्यम से भूजल स्तर की नियमित निगरानी करना और जल संसाधनों के लिए समग्र योजना के आधार पर बजट बनाना आवश्यक है।

विश्व बैंक, केंद्र सरकार के निवेशों के पूरक के रूप में, जलवायु परिवर्तन से सामना करने  में सक्षम कार्यक्रमों के माध्यम से कई राज्यों में भारत के सिंचाई आधुनिकीकरण एजेंडे  का समर्थन कर रहा है।

अंतिम छोर तक सिंचाई सेवाएं प्रदान करना: पश्चिम बंगाल में, विश्व बैंक ने किसानों तक अंतिम छोर तक पानी पहुंचाने में सुधार लाने में मदद की। एक महत्वपूर्ण नवाचार स्वतंत्र निजी सिंचाई सेवा प्रदाताओं को शामिल करना था। जल उपलब्धता, जवाबदेही और परिचालन विश्वसनीयता को बेहतर बनाने के लिए प्रदर्शन-आधारित अनुबंध लागू किए गए।

जल के कुशल उपयोग को बढ़ावा देना: हरियाणा में धान और गेहूँ जैसी जल-गहन फसलें प्रमुख हैं और भूजल के स्तर में कमी एक गंभीर समस्या है। विश्व बैंक द्वारा वित्तपोषित एक प्रस्तावित कार्यक्रम राज्य के सभी महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में सिंचाई प्रदर्शन का व्यवस्थित मापन और मानकीकरण करना है। इससे भारत के सबसे अधिक जल संकटग्रस्त कृषि प्रधान राज्यों में से एक में अधिक मजबूत  जल प्रबंधन की नींव रखने में मदद मिलेगी।

डिजिटल तकनीक और नवाचार का उपयोग: उत्तर प्रदेश चावल और गन्ने का एक प्रमुख उत्पादक राज्य है जहां पानी का उपयोग विश्व के दूसरे देशों से औसत दो से तीन गुना अधिक है। लक्ष्य जलवायु-अनुकूल और जल-कुशल खेती की ओर बढ़ने का है। उत्तर प्रदेश सरकार और माइक्रोसॉफ्ट के सहयोग से, 2030 जल संसाधन समूह (डब्ल्यूआरजी) ने एआई-आधारित पायलट परियोजनाएं शुरू की हैं जो उपग्रह चित्रों, मृदा स्वास्थ्य मापदंडों और वास्तविक समय के मौसम पूर्वानुमानों को एकीकृत करती हैं ताकि किसानों को सिंचाई,उर्वरक प्रयोग और कीट प्रबंधन पर अनुकूलित मार्गदर्शन प्रदान किया जा सके।

जलवायु अनुकूल सिंचाई को बढ़ावा देना: बिहार और हरियाणा में, विश्व बैंक ऐसे नए कार्यक्रमों का समर्थन कर रहा है जो सिंचाई का आधुनिकीकरण करते हैं, इसे जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूल बनाते हैं, जल भंडारण को मजबूत करते हैं, बाढ़ और सूखे के प्रबंधन में सुधार करते हैं, और तेजी से बदलती जलवायु परिस्थितियों में किसानों को सहायता प्रदान करते हैं।


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भारत विश्व के सबसे बड़े बांध पुनर्वास कार्यक्रम को लागू कर रहा है।

भारत में विश्व के सबसे बड़े बांध पुनर्वास कार्यक्रमों में से एक चल रहा है। यह बड़े पैमाने पर ऐसा करने वाले विश्व के पहले देशों में से एक है। 2012 से, विश्व बैंक के सहयोग से, भारत ने अपने 200 बड़े बांधों का उन्नयन किया है। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज और अधिक सटीक हो गई है, सुरक्षा पर जोर दिया गया है और बांध विशेषज्ञों का एक नया समूह तैयार हुआ है।

पृथ्‍वी के लिए जल

बाढ़ और सूखे के जोखिम को कम करना और जल का सतत प्रबंधन

बांध बाढ़ और सूखे के प्रबंधन में सहायक होते हैं। हालांकि, आज भारत के 5,000 बड़े बांधों में से 300 बांध सौ साल से अधिक पुराने हैं और कई बांध 'उच्च जोखिम' श्रेणी में आ चुके हैं। वर्ष 2012 से, विश्व बैंक ने भारत के विशाल बांधों को मजबूत करने के प्रयासों में सहायता प्रदान की है, जिससे भारत ऐसा करने वाला दुनिया के पहले देशों में से एक बन गया है।

  • बांध सुरक्षा एवं प्रबंधन में सुधार: विश्व बैंक ने अत्याधुनिक तकनीक को लागू करके और उच्च सुरक्षा मानकों को अपनाकर भारत को बांध प्रबंधन में सुधार करने में सहायता की है। नए दिशानिर्देश बांध प्रबंधकों को बदलते मौसम चक्र  से सामना करने में मदद कर रहे हैं और उनके ज्ञान को उन्नत किया जा रहा है।
  • ग्रे , ग्रीन और डिजिटल समाधानों के माध्यम से बाढ़ और सूखे के प्रति सहनशीलता बनाना: विश्व बैंक असम, कर्नाटक और बिहार सहित राज्यों को ग्रे और ग्रीन समाधानों के संयोजन के माध्यम से बाढ़ और सूखे से सामना करने की क्षमता को मजबूत करने में सहायता कर रहा है - जिसमें नदी तटबंध और जल निकासी प्रणालियों से लेकर प्रकृति-आधारित बाढ़ प्रबंधन तक शामिल हैं।
  • डिजिटल नवीनीकरण: बेंगलुरु में, विश्व बैंक शहर योजनाकारों को बाढ़ परिदृश्यों का अनुकरण करने और लक्षित एवं प्रभावी शमन उपायों को तैयार करने में सक्षम बना रहा है। ये कार्यक्रम नदी घाटियों के भीतर विभिन्न एजेंसियों और अधिकार क्षेत्रों के बीच समन्वय पर बल देते हैं, क्योंकि बाढ़ और सूखे के जोखिम प्रबंधन के लिए व्यक्तिगत राज्यों या क्षेत्रों से परे एकीकृत कार्रवाई की आवश्यकता होती है।

नदियों का पुनरुद्धार और देशव्यापी जल संसाधन प्रबंधन में सहायता

भारत ने अपनी नदियों के पुनरुद्धार के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए हैं, जिनमें गंगा नदी भी शामिल है, जो अपने विशाल बेसिन में 50 करोड़ से अधिक लोगों का जीवनयापन करती है। देश अब इन कार्यक्रमों को बेसिन-व्यापी ढांचे के अंतर्गत लाकर और एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (आईडब्ल्यूआरएम) के माध्यम से भूमि और जल संसाधनों के प्रबंधन में समन्वय स्थापित करके इन्हें और आगे बढ़ा सकता है।

गंगा शुद्धिकरण और प्रदूषण कम करने के लिए निजी पूंजी का उपयोग: विश्व बैंक भारत की प्रमुख पहल - नमामिगंगे कार्यक्रम - का समर्थन कर रहा है, जिसका उद्देश्य गंगा नदी प्रणाली के स्वास्थ्य को बहाल करना है। यह कार्यक्रम एक व्यापक नदी बेसिन प्रबंधन दृष्टिकोण अपनाता है, जिसमें पर्यावरणीय प्रवाह, जल गुणवत्ता और प्रदूषण कम करने जैसे मुद्दों को एकीकृत रूप से संबोधित किया जाता है। एक महत्वपूर्ण नवाचार प्रदूषण कम करने के लिए निजी पूंजी को आकर्षित करना और यह सुनिश्चित करना है कि जल शोधन संयंत्र सतत रूप से कार्य करें। यह अनुभव भारत को स्वस्थ नदी प्रबंधन का एक मॉडल विकसित करने में मदद कर रहा है जिसे देश की अन्य प्रमुख नदी प्रणालियों पर भी लागू किया जा सकता है।

जल प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय डेटा आधार का निर्माण: भारत का जल प्रबंधन लंबे समय से खंडित, दुर्गम और अक्सर मैन्युअल रूप से एकत्र किए गए डेटा के कारण बाधित रहा है,जिससे नदी घाटियों (river basins) में प्रभावी योजना बनाना या बाढ़ और सूखे के प्रति तेज़ी से प्रतिक्रिया देना कठिन था। विश्व बैंक द्वारा समर्थित राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना (National Hydrology Project) ने एक राष्ट्रव्यापी, स्वचालित और वास्तविक समय (real-time) में जल की निगरानी और सूचना प्रणाली विकसित की है, जो सतही जल, भूजल, जल की गुणवत्ता और मौसम विज्ञान को कवर करती है। इससे बाढ़ पूर्वानुमान,जलाशय संचालन और नदी बेसिन योजना संभव हो पाती है। परिणाम उम्मीदों से कहीं बेहतर रहे हैं: 119,000 से अधिक जल-मौसम विज्ञान निगरानी केंद्र अब राष्ट्रीय मंच से एकीकृत हैं, और 18 से अधिक राज्यों ने राज्य जल सूचना केंद्र स्थापित किए हैं या उन्हें सुदृढ़ कर रहे हैं।



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जीवन में बदलाव: उत्तराखंड अपनी जल आपूर्ति सेवाओं में परिवर्तन ला रहा है

उत्तराखंड के शहरों के बाहरी इलाकों में रहने वाले परिवारों को लंबे समय से पानी जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ता था। आज, उत्तराखंड के 22 अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लगभग 544,000 लोग - यानी 95 प्रतिशत घर - प्रतिदिन 16-24 घंटे स्वच्छ पाइपयुक्त पानी प्राप्त कर रहे हैं। अब महिलाएं काम पर जा सकती हैं और बच्चे समय पर स्कूल पहुंच सकते हैं।

निजी विशेषज्ञता और पूंजी एकत्रित करना 

भारत के जल क्षेत्र को महत्वपूर्ण निवेश की आवश्यकता है। अकेले शहरी जल अवसंरचना के लिए अगले 15 वर्षों में अनुमानित 150 अरब डॉलर की आवश्यकता होगी, साथ ही जल भंडारण, सिंचाई और बाढ़ प्रबंधन में भी बड़े निवेश की आवश्यकता होगी।

यह क्षेत्र अभी भी सरकारी अनुदानों पर काफी हद तक निर्भर है। उपयोगकर्ता शुल्क अक्सर इतने कम होते हैं कि संचालन और रखरखाव का खर्च भी पूरा नहीं हो पाता, जिससे सेवा वितरण बाधित होता है और उपयोगिताओं की वाणिज्यिक वित्तपोषण आकर्षित करने की क्षमता सीमित हो जाती है।

विश्व बैंक समूह भारत सरकार के साथ मिलकर इस क्षेत्र के वित्तपोषण के तरीके में बदलाव लाने के लिए काम कर रहा है। इसके तहत राज्य के लाभार्थी सीमित संसाधनों का लाभ उठाकर निजी निवेश और वाणिज्यिक वित्तपोषण को आकर्षित कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में विश्व बैंक और अंतरराष्‍ट्रीय  वित्त निगम (आईएफसी) राज्य को सुरक्षित रूप से प्रबंधित जल आपूर्ति और स्वच्छता सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने में सहायता कर रहे हैं। इसके लिए निवेश के साथ-साथ वाणिज्यिक प्रबंधन को मजबूत किया जा रहा है। इससे शहरों और शहरी स्थानीय निकायों को निजी पूंजी एकत्रित करने  और बांड वित्तपोषण और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से परिचालन प्रदर्शन में सुधार करने में मदद मिल रही है। यह पहल औद्योगिक और वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए उपचारित अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग को भी बढ़ावा दे रही है, जिससे मीठे पानी के संसाधनों पर दबाव कम हो रहा है और साथ ही राज्य की 30 प्रतिशत पुन: उपयोग की नीति का भी समर्थन हो रहा है।

विश्व बैंक और आईएफसी जल एजेंसियों की वित्तीय स्थिरता को मजबूत करने में भी मदद कर रहे हैं। इसके लिए उपयोगिता खातों को सुरक्षित रखना, पूर्वानुमानित बजट बनाना, शुल्क सुधार, प्रदर्शन-आधारित सार्वजनिक वित्तपोषण और नवोन्मेषी पीपीपी मॉडल की आवश्यकता है। भारत की गहन तकनीकी विशेषज्ञता संचालन, दक्षता और निवेश में निजी भागीदारी बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।


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फोटो आभार: विश्व बैंक समूह


भविष्य

भारत में विकसित और परीक्षण किए जा रहे मॉडल न केवल लाखों भारतीयों के लिए सेवाओं में बदलाव ला रहे हैं, बल्कि ऐसा ज्ञान और अनुभव भी उत्पन्न कर रहे हैं जो विकासशील देशों में जल क्षेत्र सुधार के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। विश्व बैंक समूह भारत के साथ अपनी साझेदारी को और मजबूत करने, कारगर उपायों को बड़े पैमाने पर लागू करने, आवश्यक वित्तपोषण एकत्रित करने और भारत को अपने सभी नागरिकों के लिए जल सुरक्षा प्राप्त करने में सहयोग देने के लिए प्रतिबद्ध है।


कौन से मॉडल कारगर साबित हो रहे हैं?

अपशिष्ट जल और उसके पुन: उपयोग के लिए हाइब्रिड वार्षिकी मॉडल (एचएम):नमामिगंगे कार्यक्रम के तहत, भारत सरकार निर्माण के दौरान पूंजीगत व्यय का 40% और अपशिष्ट मानकों को पूरा करने पर 15 वर्षों में वार्षिकी के रूप में 60% का भुगतान करती है। मथुरा-वृंदावन, वाराणसी और हरिद्वार में पायलट परियोजनाओं को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा और तब से इनका विस्तार पूरे बेसिन में हो चुका है, जिससे निजी इक्विटी और ऋण एकत्रित किए गए हैं और पुन: उपयोग संभव हुआ है (उदाहरण के लिए, इंडियन ऑयल द्वारा मथुरा के औद्योगिक अपशिष्ट जल का अधिग्रहण)।

उपयोगिता दक्षता और सेवा के लिए प्रदर्शन-आधारित अनुबंध (पीबीसी):

• कर्नाटक - ऑपरेटर को शहर भर में 24/7 पानी की आपूर्ति के लिए निरंतरता, गैर-राजस्व जल (एनआरडब्ल्यू) बिलिंग/संग्रह और गुणवत्ता संबंधी लक्ष्यों के आधार पर भुगतान किया जाता है।

• शिमला - गैर-राजस्व जल और ऊर्जा तीव्रता के लिए परिणाम-आधारित कार्यक्रम (पीएफओआर) संवितरण-संबंधित संकेतक (डीएलआई) द्वारा समर्थित प्रदर्शन-आधारित अनुबंध; ऑपरेटर की सक्रियता जारी है और दक्षता में सत्यापित सुधार देखे गए हैं।

• नागपुर के 24x7 पीपीपी और अन्य भारतीय शहरों के पायलट प्रोजेक्ट से प्राप्त अनुभव अनुबंध डिजाइन और जोखिम आवंटन को प्रभावित करते रहते हैं।

जल पुनर्चक्रण और जल चक्र:

 • चेन्नई—45 मिलियन लीटर प्रतिदिन (MLD) क्षमता के दो 'टर्शियरी ट्रीटमेंट रिवर्स ऑस्मोसिस' (TTRO) संयंत्र उद्योगों को पानी की आपूर्ति करते हैं, जिससे घरों के लिए मीठा पानी (freshwater) बच जाता है; चेन्नई मेट्रोपॉलिटन वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड (CMWSSB) 'अप्रत्यक्ष पेयजल पुन: उपयोग' (indirect potable reuse) के लिए दो 10 MLD संयंत्रों का प्रायोगिक परीक्षण (piloting) कर रहा है, जिसे भविष्य में ~240 MLD तक बढ़ाने की योजना है। साथ ही, ऊर्जा की रिकवरी के लिए अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों (WWTPs) को आधुनिक बनाया गया है, जिससे ऊर्जा की ~50% ज़रूरतें पूरी हो रही हैं और लक्ष्य 60-75% जल पुन: उपयोग की ओर बढ़ना है।

• सूरत—शहर के व्यापक अनुकूल और निम्न-कार्बन कार्यक्रम (जिसे भारतीय शहरों के लिए एक अच्छी प्रथा के रूप में प्रलेखित किया गया है) के अंतर्गत उद्योगों को तृतीयक अपशिष्ट जल की बिक्री स्थापित की गई है।


अधिक जानकारी के लिए, हमें फेसबुक और X पर संदेश भेजें या indiainfo@worldbank.org पर हमें लिखें।

 



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भारत में भूजल संरक्षण प्रयासों का नेतृत्व समुदाय कर रहे हैं।

भारत का सबसे बड़ा समुदाय-नेतृत्व वाला भूजल प्रबंधन कार्यक्रम, अटल भूजल योजना, उन 7 भारतीय राज्यों में ग्रामीण आजीविका में सुधार लाने और लचीलापन बनाने में मदद कर रहा है, जहां भूजल की कमी की दर सबसे अधिक है।

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पंजाब में किसानों को बिजली और पानी बचाने के लिए प्रोत्साहित करना

भारत के कृषि प्रधान राज्य पंजाब में, जहां ट्यूबवेल सिंचाई के अंधाधुंध उपयोग के कारण भूजल स्तर में भारी गिरावट आ रही है, विश्व बैंक ने राज्य सरकार को भूजल संरक्षण के लिए एक अभिनव योजना का प्रायोगिक परीक्षण करने में मदद की।

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भारत विश्व के सबसे बड़े बांध पुनर्वास कार्यक्रम को लागू कर रहा है।

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बांधों का पुनर्वास और संकटकालीन तैयारी: भारत की विश्व बैंक समर्थित पहल

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भारत की महिला बांध इंजीनियर

भारत की महिला इंजीनियरें देश के बड़े बांधों के आधुनिकीकरण के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। हालांकि इतनी विशाल मात्रा में पानी का प्रबंधन करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो सकता है, लेकिन ये महिलाएं इस चुनौती को बखूबी निभाती हैं - इन जटिल संरचनाओं का प्रबंधन, संचालन और पुनर्वास आत्मविश्वास और सहजता से करती हैं।

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बिहार की लचीलापन क्षमता: कोसी बेसिन विकास परियोजना के माध्यम से परिवर्तनकारी बाढ़ प्रबंधन

कभी कोसी नदी की वार्षिक बाढ़ से तबाह होने वाला बिहार, विश्व बैंक समर्थित कोसी बेसिन विकास परियोजना के माध्यम से पूरी तरह से बदल गया है, जहां मजबूत तटबंध और सहायक नहरें अब बुनियादी ढांचे की रक्षा करती हैं और समृद्ध नदी तट समुदायों का समर्थन करती हैं।